नो-टायर्ड नो-रिटायर्ड: भागवत और मोदी नहीं छोड़ेंगे पद, काशी-मथुरा पर बड़ा बयान
नई दिल्ली, 30 अगस्त 2025।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित समारोह में बड़ा बयान दिया। उन्होंने साफ कहा कि न तो वे खुद रिटायर हो रहे हैं और न ही किसी को रिटायर होने के लिए कह रहे हैं। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर उठ रहे कयासों पर भी विराम लगा दिया।
भागवत ने कहा कि संघ या भाजपा में 75 साल की उम्र पूरी होने पर रिटायरमेंट का कोई नियम नहीं है और आगे भी ऐसा कोई नियम लागू नहीं होगा। उन्होंने कहा कि जब तक संघ चाहेगा वे सक्रिय रहेंगे और 80 साल की उम्र में भी शाखा लगाते रहेंगे।
मोदी और 75 साल का विवाद
पिछले दिनों भागवत के एक बयान को लेकर यह चर्चा तेज हो गई थी कि 75 साल की उम्र होने पर नेता पद छोड़ दें। इसी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़कर देखा गया क्योंकि वे सितंबर 2025 में 75 वर्ष के हो जाएंगे।
लेकिन अब भागवत ने स्पष्ट किया कि उनका बयान सिर्फ मोरोपंत पिंगले के मजाकिया अंदाज का हवाला था, न कि मोदी या किसी अन्य नेता पर निशाना।
संघ और बीजेपी रिश्तों पर तंज
कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि संघ और बीजेपी के बीच कोई झगड़ा नहीं है, मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनभेद नहीं।
हालांकि उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव में हो रही देरी को लेकर अप्रत्यक्ष तंज कसा। भागवत ने कहा –
“अगर हम तय करते तो इतना समय लगता क्या? टेक योर टाइम… हमें कुछ कहना नहीं है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान संघ और बीजेपी के बीच चल रही रणनीतिक तनातनी की ओर इशारा करता है।
काशी-मथुरा आंदोलन पर भागवत का रुख
मोहन भागवत ने कहा कि संघ राम मंदिर आंदोलन का हिस्सा था, लेकिन आगे किसी आंदोलन में शामिल नहीं होगा।
काशी और मथुरा पर उन्होंने कहा –
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यह आस्था का विषय है।
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संघ संगठनात्मक रूप से इसमें नहीं जाएगा।
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लेकिन स्वयंसेवक हिंदू होने के नाते इसमें शामिल हो सकते हैं।
भागवत ने साथ ही यह सलाह भी दी कि “हर जगह मंदिर और शिवलिंग तलाशने की जरूरत नहीं है।”
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह बयान एक ओर हिंदुओं को संकेत है तो दूसरी ओर सरकार पर Places of Worship Act पर दबाव बनाने का संदेश भी है।
भाषा और धर्म पर बयान
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भागवत ने कहा कि हर भारतीय को कम से कम तीन भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए – मातृभाषा, राज्यभाषा और राष्ट्रभाषा।
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अंग्रेजी सीखने पर कोई रोक नहीं होनी चाहिए क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह काम आती है।
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हिंदू-मुस्लिम रिश्तों पर उन्होंने कहा कि इस्लाम भारत में आया और आगे भी रहेगा। विश्वास बनने के बाद ही संघर्ष खत्म होगा।
विश्लेषण: क्यों भागवत का बयान अहम?
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संघ का शताब्दी वर्ष चल रहा है, ऐसे में भागवत का पद छोड़ना संभव नहीं।
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नरेंद्र मोदी पार्टी की ब्रांड वैल्यू हैं, इसलिए 75 साल की उम्र में भी उन्हें हटाने का सवाल नहीं उठता।
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काशी-मथुरा पर दिया गया बयान आने वाले समय में बड़े राजनीतिक विमर्श की शुरुआत कर सकता है।
निष्कर्ष
मोहन भागवत का “नो-टायर्ड, नो-रिटायर्ड” बयान साफ संकेत है कि न वे खुद पीछे हटेंगे और न ही मोदी जैसे नेताओं के लिए कोई आयु सीमा लागू होगी। काशी-मथुरा पर उन्होंने संतुलित लेकिन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। यह बयान न सिर्फ संघ और बीजेपी के रिश्तों को प्रभावित करेगा बल्कि आने वाले चुनावी समीकरणों को भी।
