स्वतंत्रता का 80वां वर्ष: जैन दर्शन की राष्ट्रचेतना में छिपी है भारत की आत्मा
संपादकीय | डॉ. जयेंद्र जैन ‘निप्पू चंदेरी’
चंदेरी। 15 अगस्त 2026 को भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। स्वतंत्रता के इस महत्वपूर्ण अवसर पर जब पूरा देश तिरंगे को नमन कर रहा है, तब उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण करना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सुख, संपत्ति, यौवन और प्राण तक न्यौछावर कर दिए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जैन समाज का योगदान भी राष्ट्रचेतना की ऐसी महत्वपूर्ण धारा है, जिसे इतिहास के व्यापक विमर्श में और अधिक प्रमुखता से सामने लाने की आवश्यकता है।
आत्मकल्याण के साथ लोकमंगल का दर्शन
जैन दर्शन को केवल संन्यास या आत्मकल्याण तक सीमित करके देखना उसके व्यापक स्वरूप को समझने में बाधा बन सकता है। जैन परंपरा में भगवान ऋषभदेव अर्थात आदिनाथ को प्रथम तीर्थंकर के साथ मानव समाज के प्रथम लोकशिक्षक के रूप में भी स्मरण किया जाता है। परंपरागत मान्यताओं में उन्होंने मानव जीवन की व्यवस्था और विभिन्न कलाओं का ज्ञान दिया, जिसमें ‘असि’ विद्या का भी उल्लेख मिलता है।
‘असि’ को केवल शस्त्र के अर्थ में देखना उचित नहीं होगा। इसे तत्कालीन परिस्थितियों में आत्मरक्षा, अनुशासन और लोकव्यवस्था से जुड़ी विद्या के रूप में भी समझा जा सकता है। जैन परंपरा की विशेषता यह रही कि शक्ति के साथ संयम को भी सर्वोच्च महत्व दिया गया। यही विचार आगे भगवान महावीर की शिक्षाओं में आत्मविजय और अहिंसा के सिद्धांत के रूप में विकसित हुआ।
‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ में राष्ट्रकल्याण की भावना

जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” जीवों के परस्पर सहयोग और उपकार का संदेश देता है। यह विचार केवल आध्यात्मिक चिंतन नहीं, बल्कि व्यापक लोकमंगल की भावना को भी सामने रखता है। व्यक्ति परिवार से, परिवार समाज से और समाज राष्ट्र से जुड़ा है। इसलिए राष्ट्र के कल्याण को भी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा माना जा सकता है।
जैन धार्मिक परंपरा में होने वाला शांतिपाठ भी इसी भावना को दर्शाता है। पूजा-अर्चना के बाद देश, राष्ट्र, नगर और शासन में शांति की मंगलकामना की जाती है—“देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः, करोतु शान्तिं भगवान् जिनेन्द्रः।” इसके साथ प्रजा के कल्याण, धर्मपरायण शासन, समय पर वर्षा तथा रोग और दुर्भिक्ष से मुक्ति की कामना की जाती है।
अमरचंद बांठिया का राष्ट्र के लिए बलिदान
जैन समाज की राष्ट्रचेतना का ऐतिहासिक उदाहरण 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अमर शहीद अमरचंद बांठिया के जीवन में दिखाई देता है। ग्वालियर के राजकोष से जुड़े महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए उन्होंने क्रांतिकारियों की सहायता की। अंग्रेजी सत्ता ने उन्हें इसका दंड दिया और 22 जून 1858 को ग्वालियर में उन्हें फांसी दी गई।
अमरचंद बांठिया का जीवन जैन दर्शन के अपरिग्रह को राष्ट्रधर्म से जोड़ता है। संपत्ति और निजी हितों के प्रति मोह का त्याग केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र के लिए अपने सर्वस्व को समर्पित करने की भावना भी है। उनका बलिदान यह संदेश देता है कि व्यक्तिगत संपत्ति से बड़ा राष्ट्र और जीवन से बड़ा कर्तव्य हो सकता है।
अन्य जैन बलिदानियों की गौरवगाथा
1857 की क्रांति में लाला हुकुमचंद जैन और फकीरचंद जैन जैसे बलिदानियों के नाम भी श्रद्धा के साथ लिए जाते हैं। उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी।
जैन दर्शन आत्मा को शरीर से अलग और शाश्वत मानता है। जब यह विचार जीवन का विश्वास बन जाता है, तब मृत्यु का भय भी मनुष्य को सत्य और कर्तव्य के मार्ग से विचलित नहीं कर पाता। स्वतंत्रता संग्राम के अनेक बलिदानियों के जीवन में इसी प्रकार का साहस दिखाई देता है।
जैन महिलाओं ने भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जैन ऐतिहासिक स्रोतों में सरला देवी साराभाई का उल्लेख गांधीजी के दांडी आंदोलन में महिला नेतृत्व के संदर्भ में मिलता है। इसी तरह आजाद हिंद फौज की महिला शाखा रानी झांसी रेजीमेंट के संदर्भ में जैन स्रोतों में रमा देवी और लीलावती जैसी महिलाओं का उल्लेख किया जाता है।
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र के लिए संघर्ष में जैन महिलाओं ने भी साहस और समर्पण का परिचय दिया। जैन दर्शन में आत्मा को पुरुष या स्त्री के भेद से परे माना गया है। यही विचार राष्ट्रधर्म के आह्वान पर महिलाओं को भी समान रूप से आगे आने की प्रेरणा देता है।
नई पीढ़ी तक पहुंचना चाहिए यह इतिहास
स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में यह आवश्यक है कि युवा पीढ़ी आजादी के इतिहास को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखे। स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान को समझना राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करता है।
जैन दर्शन की अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और परस्पर सहयोग की भावना आज भी समाज और राष्ट्र के लिए प्रासंगिक है। स्वतंत्रता संग्राम में जैन समाज के योगदान को याद करना भारतीय इतिहास की उस विविधतापूर्ण परंपरा को सम्मान देना है, जिसमें विभिन्न समुदायों ने मिलकर स्वतंत्र भारत की नींव रखी।
