छत्तीसगढ़ के 25वें स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री का उल्लासपूर्ण स्वागत – ब्रह्माकुमारी संस्थान के शांत शिखर भवन का उद्घाटन
रायपुर (छत्तीसगढ़) – राज्य के 25वें स्थापना दिवस के अवसर पर आज एक अत्यंत विशेष कार्यक्रम हुआ, जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवा रायपुर के सेक्टर-20 में स्थित ब्रह्माकुमारी संस्थान के नवनिर्मित भवन शांति शिखर (Shanti Shikhar) का उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्हें खुमड़ी और शॉल पहनाकर गरिमापूर्ण स्वागत किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन राज्योत्सव के पहले दिन हुआ है, जिसमे छत्तीसगढ़ की 25-वर्षीय यात्रा का जश्न मनाया जा रहा है।
राज्योत्सव और स्थापना-दिवस का महत्व
छत्तीसगढ़ ने आज अपनी स्थापना की 25वीं वर्षगांठ पूरी की है। इस वर्ष झारखंड व उत्तराखंड सहित कई राज्यों ने भी 25 वर्ष पूरे किए। प्रधानमंत्री ने कहा कि “राज्य के विकास से देश का विकास” — यही मंत्र समस्त अभियान का मूल है।
शांति शिखर का उद्घाटन
शांति शिखर भवन का निर्माण लगभग सात वर्षों में पूरा हुआ है। जब इस भवन का शिलान्यास 15 जनवरी 2018 को हुआ था, तब इसे तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशिका राजयोगिनी बीके कमला जी के मार्गदर्शन में आरंभ किया गया था। इस भवन के लिए जोधपुर से पिंक स्टोन मंगवाया गया था और जोधपुरी कारीगरों ने राजस्थानी शैली में इसे तैयार किया। मद्धिम मिट्टी की स्थिति के कारण, गहरी खुदाई करके स्लैब लगाया गया और सभी कॉलम खड़े किए गए। इसके बाद इसमें विशिष्ट वास्तुकला और तकनीकी सुविधाएँ जोड़ी गईं।
प्रधानमंत्री का संबोधन: आध्यात्म, आचरण एवं राष्ट्रनिर्माण
प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर खुशी जताई कि उनका ब्रह्माकुमारी संस्थान से जुड़ाव रहा है। उन्होंने कहा, “मैं अतिथि नहीं हूँ, मैं आप ही का हूँ।” उन्होंने ब्रह्माकुमारी द्वारा किए जा रहे ‘सेवा अधिक, शब्द कम’ के दृष्टिकोण को विशेष रूप से सराहा।
उन्होंने कहा कि “आचारण ही सबसे बड़ा धर्म है, आचरण ही सबसे बड़ा तप है और आचरण ही सबसे बड़ा ज्ञान है” — यह उक्त ब्रह्माकुमारी संस्था की आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत है।
ब्रह्माकुमारी संस्था और राष्ट्रीय परिवर्तन
प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि ब्रह्माकुमारी जैसी संस्था विकसित भारत की यात्रा में बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है। उन्होंने उल्लेख किया कि उन्होंने कई वर्षों से आप लोगों के प्रयासों को देखा है, जहाँ शब्दों से अधिक सेवा दिखाई देती है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत का आध्यात्मिक मूल विचार वैश्विक शांति की अवधारणा से गहरा जुड़ा हुआ है:
“हम वो हैं, जो जीव में शिव को देखते हैं, हम वो हैं, जो स्व में सर्वस्व को देखते हैं। हमारे यहाँ हर धार्मिक अनुष्ठान … वो उद्घोष है- ‘विश्व का कल्याण हो, प्राणियों में सद्भावना हो’
यह विचार वास्तव में ब्रह्माकुमारी संस्थान के ‘ओम शांति’ उद्घोष में दिखाई देता है: ‘ओम’ ब्रह्म से और ‘शांति’ विश्व शांति के मार्ग से जुड़ा हुआ।
आयोजन की विशेषताएँ और शिल्प-वास्तु
शांति शिखर भवन लगभग 25 एकड़ भूमि पर विस्तारित है। इसमें ध्यान–हॉल, इको-फ्रेंडली डॉर्मिटरी, सौर-ऊर्जा आधारित बुनियादी सुविधाएं आदि शामिल हैं।
भवन निर्माण में राजस्थानी पिंक स्टोन का प्रयोग हुआ है, जो जोधपुर से ट्रकों द्वारा मंगाई गई थी। मिट्टी की स्थिति के कारण स्लैब गहराई तक लगाना पड़ा—इसमें सात वर्षों का समय लगा।
स्वागत समारोह और सांस्कृतिक विशिष्टताएँ
कार्यक्रम के दौरान जब प्रधानमंत्री पहुंचे, तो उन्हें खुमड़ी और शॉल पहनाकर स्वागत किया गया। इस प्रकार का स्वागत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखता है। इस स्वागत ने समारोह की गरिमा और आध्यात्मिकता दोनों को एक साथ जोर दिया।
छत्तीसगढ़ विकास की दिशा में आगे
प्रधानमंत्री ने कहा कि “विकसित भारत की इस अहम यात्रा में ब्रह्माकुमारी जैसी संस्था की बहुत बड़ी भूमिका है।” इसके साथ ही उन्होंने छत्तीसगढ़ के विकास को पूरे देश के विकास से जोड़ा।
यह उद्घाटन छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत हुआ, जहां अनेक विकास परियोजनाओं तथा आध्यात्मिक संस्थाओं को मुख्य स्थान मिला।
भविष्य की दिशा और वैश्विक शांति
प्रधानमंत्री ने आशा जताई कि शांति शिखर न केवल एक भवन बनेगा बल्कि यह एक गतिशील आंदोलन बनेगा जो देश और वैश्विक स्तर पर शांति, सेवा और आध्यात्मिक जागृति को आगे ले जाएगा। उन्होंने कहा कि यह केंद्र आने वाले समय में “विश्व शांति” के प्रयासों का प्रमुख केंद्र होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने, जब भी वैश्विक संकट या आपदा आई है, एक भरोसेमंद साथी के रूप में आगे बढ़कर मदद की है। इसी को उन्होंने ‘First Responder’ की भूमिका की संज्ञा दी।
निष्कर्ष
इस प्रकार, आज के इस विशेष अवसर पर — छत्तीसगढ़ के 25वें स्थापना दिवस के दिन — ब्रह्माकुमारी संस्थान के नवनिर्मित शांति शिखर भवन का उद्घाटन सिर्फ एक भवन का खुलना नहीं था, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक विरासत, सेवा-भाव, राज्य और देश के विकास की एक समन्वित तस्वीर प्रस्तुत कर रहा था।
प्रधानमंत्री का यह उद्घाटन समारोह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि किस प्रकार आध्यात्मिक संस्थाएँ समाज-निर्माण में योगदान दे सकती हैं, और किस प्रकार राज्य एवं केंद्र सरकारें इस दिशा में सहभागिता कर रही हैं।
भविष्य में इस प्रकार के आयोजन और स्थलों का महत्व और बढ़ने की संभावना है — जहाँ विकास, आध्यात्म और सामाजिक समरसता एक साथ सामने आती है। आज का यह दिन इसलिए ‘बहुत विशेष’ रहा — जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा — और इसने छत्तीसगढ़ के लिए एक नया अध्याय खोला है।
