23 सितंबर 1917 को वडोदरा की संकल्प भूमि से जुड़े डॉ. भीमराव आंबेडकर के ऐतिहासिक संकल्प को संकल्प दिवस के रूप में याद किया जाता है। देवास में मिशन महाराजा बली सेना ने उनके सामाजिक समानता के संदेश को स्मरण किया।
23 सितंबर ‘संकल्प दिवस’: वडोदरा की संकल्प भूमि से डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लिया था अस्पृश्यता मिटाने का संकल्प
बड़ौदा में भेदभाव के अनुभवों के बाद सामाजिक समानता के संघर्ष को मिली नई दिशा, मिशन महाराजा बली सेना ने किया बाबा साहब के विचारों पर चलने का आह्वान
विशेष संवाददाता फूलचंद मालवीय, स्वराज वाणी समाचार, देवास।
देवास। 23 सितंबर का दिन डॉ. भीमराव आंबेडकर के सामाजिक संघर्ष से जुड़े महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रसंग के रूप में याद किया जाता है। 23 सितंबर 1917 को वडोदरा में स्थित उस स्थान से जुड़ी स्मृति को आज ‘संकल्प भूमि’ के नाम से जाना जाता है, जहां डॉ. आंबेडकर द्वारा अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए जीवन समर्पित करने का संकल्प लेने का उल्लेख मिलता है।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण ने भी वर्ष 2022 में वडोदरा स्थित संकल्प भूमि के वटवृक्ष परिसर को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित करने की सिफारिश करते हुए इसे डॉ. आंबेडकर द्वारा 23 सितंबर 1917 को अस्पृश्यता समाप्त करने का संकल्प लेने से जुड़ा स्थल बताया था।
बड़ौदा में भेदभाव का करना पड़ा था सामना
डॉ. आंबेडकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद बड़ौदा रियासत की सेवा के लिए पहुंचे थे। महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ द्वारा उनकी उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति दी गई थी और शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें रियासत की सेवा करनी थी।
बड़ौदा पहुंचने के बाद डॉ. आंबेडकर को जातिगत भेदभाव के कारण रहने के लिए जगह तलाशने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनके आत्मकथात्मक विवरण Waiting for a Visa में पारसी सराय में रहने और पहचान सामने आने के बाद वहां से जगह खाली करने के लिए कहे जाने का उल्लेख मिलता है। बाद में उन्होंने बंबई लौटने का निर्णय लिया।
कमाठी बाग से जुड़ी है ऐतिहासिक स्मृति
बड़ौदा छोड़ने से पहले ट्रेन के इंतजार के दौरान डॉ. आंबेडकर ने कई घंटे कमाठी बाग में बिताए थे। यही स्थान आगे चलकर उनके सामाजिक संघर्ष की स्मृति से जुड़ गया। आज इससे संबंधित स्थल को ‘संकल्प भूमि’ के रूप में जाना जाता है।
इस प्रसंग को डॉ. आंबेडकर के जीवन में जातिगत भेदभाव के विरुद्ध उनके संघर्ष को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। उन्होंने आगे चलकर सामाजिक समानता, शिक्षा, अधिकारों और अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए व्यापक आंदोलन किए।
सामाजिक समानता के लिए जीवनभर किया संघर्ष
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपने सार्वजनिक जीवन में सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के विरुद्ध लगातार आवाज उठाई। उन्होंने शिक्षा, संगठन और संवैधानिक अधिकारों के माध्यम से वंचित वर्गों के सामाजिक एवं राजनीतिक सशक्तिकरण पर जोर दिया।
भारत के संविधान निर्माण में भी डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समानता और भेदभाव के निषेध से संबंधित संवैधानिक प्रावधान उनके सामाजिक न्याय संबंधी व्यापक विचारों से जुड़े रहे।
राहुल बाबू सिंह मालवीय ने किया एकजुटता का आह्वान
संकल्प दिवस के अवसर पर मिशन महाराजा बली सेना प्रमुख राहुल बाबू सिंह मालवीय ‘नवरंग साहब’ ने डॉ. आंबेडकर को स्मरण करते हुए कहा कि उनके संघर्ष ने देश के करोड़ों शोषित, पीड़ित और वंचित लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने समाज के लोगों से अंधविश्वास, पाखंड, जातिगत भेदभाव और अन्याय के विरुद्ध संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने तथा सामाजिक समानता और आपसी सम्मान को मजबूत करने का आह्वान किया।
राहुल बाबू सिंह मालवीय ने कहा कि संकल्प दिवस पर डॉ. आंबेडकर के सामाजिक समानता के संकल्प को स्मरण करते हुए शिक्षा, अधिकार, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय के लिए मिलकर कार्य करने का संकल्प लिया जाना चाहिए।
