Nitish Kumar Political Journey: 20 साल बाद भी बिहार की सत्ता का पर्याय हैं नीतीश कुमार — जानें 2005 से 2025 तक का पूरा सियासी इतिहास
नीतीश कुमार: 20 साल बाद भी बिहार की सत्ता का दूसरा नाम — आखिर कैसे कायम रखी अपनी पकड़?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की बंपर जीत के बाद एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शपथ ले ली है। नई गठित सरकार में कुल 27 मंत्रियों को जगह मिली है, जिनमें मुख्यमंत्री के साथ डिप्टी CM सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा शामिल हैं।
इसके साथ ही नीतीश कुमार का राजकीय कार्यकाल 20 साल बाद भी जारी है। 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से वे या तो किंग रहे हैं या किंगमेकर — और यही उनका राजनीतिक प्रभाव उन्हें देश के सबसे लंबे समय तक सक्रिय सत्ता नेतृत्वकर्ताओं की सूची में खड़ा करता है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है—
आखिर 2005 से 2025 तक बिहार में क्या हुआ? कैसे सीटें और वोट प्रतिशत ऊपर-नीचे होते रहे, पर सत्ता नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही?
आइए नीतीश कुमार के पूरे राजनीतिक सफर, गठबंधन की राजनीति और सत्ता के समीकरणों को विस्तार से समझते हैं।
कौन हैं नीतीश कुमार? 1951 में जन्मे एक सामान्य परिवार से बिहार के सबसे प्रभावशाली नेता तक का सफर
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जन्म 1951 में नालंदा जिले के कल्याण बीघा गांव में हुआ था। उनके पिता स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे, इसलिए घर में राजनीतिक वातावरण था। युवावस्था से ही वे राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे।
सियासत में उनका सफर लगभग उसी दौर में शुरू हुआ, जब लालू प्रसाद यादव भी राजनीति में तेजी से उभर रहे थे। दोनों ने कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में समाजवादी राजनीति का पाठ सीखा और बाद में बिहार की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया।
सियासत में नीतीश कुमार की शुरुआती एंट्री — 1977 से 1985 तक संघर्ष और आत्मविश्वास
1977 का दौर देश की राजनीति में बड़ा मोड़ था। आपातकाल समाप्त होने के बाद कांग्रेस के खिलाफ लहर थी और जनता पार्टी उभार पर थी। इसी चुनाव में नीतीश कुमार ने हरनौत विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ा, लेकिन वे एक निर्दलीय उम्मीदवार से हार गए।
यह उनकी राजनीतिक जिंदगी का बेहद निराशाजनक पल था और कुछ समय के लिए उन्होंने राजनीति छोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन साथियों ने हिम्मत दी और 1985 में उन्होंने फिर हरनौत सीट से लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़ा और पहली जीत हासिल की।
1989–1994: राष्ट्रीय राजनीति में कदम और फिर ‘समता पार्टी’ का गठन
1989 में नीतीश कुमार बाढ़ लोकसभा सीट से जीते और वी.पी. सिंह सरकार में कृषि मंत्री बने। 1991 में भी उन्होंने लोकसभा चुनाव जीता।
लेकिन 1994 में जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर उन्होंने समता पार्टी की स्थापना की।
यही पार्टी बाद में जदयू (JDU) बनने वाली थी, जिसने बिहार की राजनीति को पूरी तरह नया स्वरूप दिया।
1990 का दशक: ‘लालू राज’ और नीतीश का उभार — पिछड़ों से लेकर EBC तक मजबूत पकड़
1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव का दबदबा पूरे बिहार पर था। वे दो बार मुख्यमंत्री बने, फिर चारा घोटाले के चलते उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया।
यह वह दौर था जब उनका ‘MY समीकरण — मुस्लिम + यादव’ बेहतरीन तरीके से काम कर रहा था।
इसी बीच नीतीश कुमार ने
कुर्मी-कुशवाहा वोट
अति-पिछड़ा वर्ग (EBC)
महादलित
महिला वोट बैंक
पर लगातार काम किया।
नीतीश का यही सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल आगे चलकर बिहार चुनावों में गेमचेंजर बना।
2000 के चुनाव: पहली बार सत्ता के करीब पहुंचे नीतीश कुमार
साल 2000 में बिहार विधानसभा चुनाव हुआ था, जब तक झारखंड अलग नहीं हुआ था। इस चुनाव में:
- राजद ने 124 सीटें जीतीं
- भाजपा को 67 सीटें मिलीं
- समता पार्टी ने 34 सीटें लीं
- कांग्रेस 23 सीटों पर जीती
हालांकि राजद सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत दूर था। नीतीश कुमार पहली बार सत्ता के बिल्कुल करीब आए। यह वह चुनाव था जहां बिहार की जनता को यह संकेत मिला कि नीतीश एक विकल्प हैं।
2005: बिहार में ‘परिवर्तन की राजनीति’ — नीतीश कुमार का स्वर्णकाल शुरू
2005 के चुनाव ने बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी।
फरवरी और फिर नवंबर में दो बार चुनाव हुए।
नवंबर में एनडीए के नेतृत्व में जदयू–भाजपा गठबंधन ने जीत हासिल की और नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने।
यहीं से बिहार की राजनीति में एक नई शुरुआत हुई—
सड़क, बिजली, शिक्षा
कानून-व्यवस्था में सुधार
महिला सशक्तिकरण
शराबबंदी
पंचायत चुनावों में EBC + महिलाओं को आरक्षण
इस मॉडल ने नीतीश कुमार को राष्ट्रीय स्तर का नेता बना दिया।
2005 से 2025: 20 साल का सफर — नीतीश कुमार हर समीकरण में ‘किंग या किंगमेकर’
इस लंबे सफर में बिहार की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन एक चीज स्थिर रही—
नीतीश कुमार सत्ता की धुरी बने रहे।
इस दौरान प्रमुख घटनाएं:
2010:
एनडीए ने रिकॉर्ड जीत दर्ज की।
नीतीश सरकार की विकास और सामाजिक सुधारों की छवि मजबूत हुई।
2013:
उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ दिया, क्योंकि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया गया था।
2015:
महागठबंधन— जदयू + राजद + कांग्रेस
नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने।
2017:
भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद उन्होंने अचानक राजद से नाता तोड़कर फिर भाजपा के साथ सरकार बना ली — “पलटी” शब्द यहीं से आया।
2020:
जदयू की सीटें कम आईं लेकिन भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखा — वे फिर ‘किंगमेकर’ साबित हुए।
2022–2024:
जदयू ने फिर NDA छोड़ा, महागठबंधन में गए, फिर वापस NDA में लौट आए।
2025:
एनडीए ने मजबूत जीत दर्ज की और नीतीश कुमार ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
कम सीटें, कम वोट— फिर भी कैसे सत्ता में बने रहे नीतीश कुमार?
नीतीश कुमार का असली कौशल है—
गठबंधन गणित + सामाजिक इंजीनियरिंग + प्रशासनिक छवि
वे जानते हैं कि किस समय किसके साथ खड़ा होना है।
बिहार की राजनीति में नेतृत्व अक्सर जातीय आधार पर चलता है, लेकिन नीतीश कुमार ने—
EBC
महिलाओं
महादलित
अल्पसंख्यकों
में ऐसी पैठ बनाई कि उनकी स्वीकार्यता हर ब्लॉक में देखने को मिलती है।
यही कारण है कि कम सीटें होने पर भी वे मुख्यमंत्री पद पर बने रहते हैं।
2025 की कैबिनेट शपथ— नीतीश कुमार का एक और कार्यकाल शुरू
243 सदस्यीय विधानसभा में 27 मंत्रियों को शामिल किया गया.
इसमें:
-
CM नीतीश कुमार
-
डिप्टी CM सम्राट चौधरी
-
डिप्टी CM विजय सिन्हा
-
24 कैबिनेट मंत्री
शामिल हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि पार्टी और गठबंधन दोनों ही नीतीश मॉडल को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
निष्कर्ष: नीतीश का 20 साल का सफर एक संदेश देता है— बिहार की राजनीति उनकी धुरी पर ही चलती है
वे ‘सत्ता के खिलाड़ी’ हैं।
वे वोट बैंक की नब्ज पकड़ने में माहिर हैं।
विकास और सामाजिक सुधारों की छवि उनकी ताकत है।
कोई गठबंधन उनकी उपयोगिता को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

