चुनौतियों को मात देकर 10 वर्षीय Avya Ruhal ने तैराकी में रचा इतिहास, स्टेट चैंपियनशिप में जीते सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल
माता-पिता की व्यस्तता और दूरी के बावजूद मेहनत से हासिल की बड़ी उपलब्धि
मंडलेश्वर। स्वराज वाणी जिला ब्यूरो संवाददाता गौतम साल्वे।
कठिन परिस्थितियां अक्सर इंसान की क्षमता और दृढ़ संकल्प की परीक्षा लेती हैं, लेकिन मजबूत इरादों के सामने चुनौतियां भी छोटी साबित हो जाती हैं। इसका प्रेरणादायक उदाहरण इंदौर की 10 वर्षीय नन्हीं तैराक Avya Ruhal ने पेश किया है। सीमित पारिवारिक समय और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद आव्या ने अपनी मेहनत, लगन और अनुशासन के दम पर तैराकी के क्षेत्र में शानदार उपलब्धि हासिल की है।
शिशुकुंज इंटरनेशनल स्कूल इंदौर की कक्षा 6 की छात्रा आव्या रुहल ने हाल ही में आयोजित मध्य प्रदेश स्टेट एक्वेटिक चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए रिले स्पर्धा में रजत पदक और व्यक्तिगत स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर प्रदेश स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
माता-पिता की जिम्मेदारियों के बीच जारी रखा अभ्यास
आव्या रुहल खरगोन की अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शकुंतला रुहल और देवास में पदस्थ सीडीपीओ संदीप रुहल की बेटी हैं। दोनों माता-पिता अपनी शासकीय जिम्मेदारियों के कारण व्यस्त रहते हैं।
मां की पुलिस सेवा के कारण उनकी पदस्थापना इंदौर से करीब 150 किलोमीटर दूर खरगोन में है, जबकि पिता भी अपने विभागीय दायित्वों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में आव्या इंदौर में रहकर अपनी पढ़ाई और तैराकी का नियमित अभ्यास करती हैं।
कई बार प्रतियोगिताओं की तैयारी के दौरान उन्हें माता-पिता का प्रत्यक्ष सहयोग और समय सीमित रूप से मिल पाता है, लेकिन आव्या ने कभी अपनी मेहनत और लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उन्होंने कठिन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया और लगातार अभ्यास करते हुए सफलता की राह बनाई।
शिशुकुंज स्विमिंग एकेडमी के मार्गदर्शन में मिली सफलता
आव्या की इस उपलब्धि में शिशुकुंज स्विमिंग एकेडमी के निदेशक मनोज दवे और मुख्य कोच विकास जोशी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके मार्गदर्शन में आव्या ने तैराकी की तकनीक, अनुशासन और प्रतियोगी तैयारी पर लगातार काम किया।
कोचिंग और कड़ी मेहनत के चलते आव्या ने कम उम्र में ही राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई है।

पांच वर्ष की उम्र से शुरू किया था तैराकी का सफर
आव्या ने महज 5 वर्ष की उम्र में तैराकी सीखना शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने लगातार मेहनत करते हुए इंदौर की विभिन्न इंटर-स्कूल तैराकी प्रतियोगिताओं में कई स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक अपने नाम किए।
उनकी मेहनत और प्रतिभा का परिणाम यह रहा कि उन्होंने वर्ष 2025 में भुवनेश्वर, ओडिशा में आयोजित सीबीएसई नेशनल एक्वेटिक चैंपियनशिप में भी हिस्सा लिया और अंडर-11 रिले स्पर्धा में पदक जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
छोटी उम्र में बड़ी उपलब्धि
आव्या रुहल की सफलता केवल पदक जीतने की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की प्रेरणादायक मिसाल है। छोटी उम्र में ही उन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और उसे पाने के लिए लगातार प्रयास किए जाएं तो किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है।
माता-पिता की व्यस्त शासकीय जिम्मेदारियों और सीमित समय के बावजूद आव्या ने अपने अभ्यास में कभी कमी नहीं आने दी। उन्होंने अनुशासन, मेहनत और अपने कोच के मार्गदर्शन को अपनाते हुए तैराकी के क्षेत्र में लगातार सफलता हासिल की।
आव्या की उपलब्धि उन सभी बच्चों के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी या परिस्थितियों की कठिनाइयों के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सफलता पाने के लिए केवल सुविधाएं ही नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति, मेहनत और लक्ष्य के प्रति समर्पण भी जरूरी होता है।
आव्या ने अपनी प्रतिभा से साबित किया है कि मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर छोटी उम्र में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।
परिवार और कोच का मिला विश्वास
आव्या की उपलब्धि पर उनके परिवार, कोच और विद्यालय में खुशी का माहौल है। माता-पिता ने बेटी की मेहनत और उपलब्धि पर गर्व व्यक्त किया है। वहीं कोच मनोज दवे और विकास जोशी ने कहा कि आव्या में सीखने की क्षमता और आगे बढ़ने का जुनून है, जो उसे भविष्य में और बड़ी उपलब्धियां दिला सकता है।
आव्या की यह सफलता दिखाती है कि यदि बच्चों को सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। कम उम्र में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धियां हासिल कर आव्या ने मध्य प्रदेश के खेल जगत में एक नई उम्मीद जगाई है।
