Xप्लेन: व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में भारत का नाम क्यों? ट्रांसशिपमेंट विवाद से Bharat-अमेरिका व्यापार पर क्या पड़ेगा असर
नई दिल्ली: अमेरिका और Bharat के व्यापारिक रिश्तों के बीच एक नई चुनौती सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की हालिया रिपोर्ट में भारत समेत 40 से अधिक देशों का जिक्र करते हुए चीन के सामान को अमेरिकी टैरिफ से बचाने के लिए तीसरे देशों के रास्ते भेजे जाने यानी ट्रांसशिपमेंट की समस्या उठाई गई है। 13 अगस्त 2026 को जारी The Great Transshipment Scam: Rise, Scope, and Costs नाम की रिपोर्ट में अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया कि चीन से आने वाले कुछ सामान को पहले ऐसे देशों में भेजा जाता है जहां अमेरिका की टैरिफ दरें अपेक्षाकृत कम हैं और फिर वहां से अमेरिकी बाजार में भेजा जाता है।
हालांकि, रिपोर्ट में भारत का नाम आने का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने किसी भारतीय कंपनी या भारतीय सरकार पर सीधे तौर पर टैरिफ चोरी का आरोप साबित कर दिया है। रिपोर्ट का व्यापक दावा उन देशों के नेटवर्क से जुड़ा है जिनके जरिए चीनी उत्पादों की वास्तविक उत्पत्ति छिपाकर अमेरिकी बाजार तक पहुंचने की आशंका जताई गई है।
क्या है ट्रांसशिपमेंट?
ट्रांसशिपमेंट सामान्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार का हिस्सा है। इसका अर्थ है कि किसी सामान को उसकी अंतिम मंजिल तक पहुंचने से पहले किसी तीसरे देश के जरिए भेजा जाए। यह प्रक्रिया अपने आप में गैरकानूनी नहीं है।
समस्या तब पैदा होती है जब किसी उत्पाद के वास्तविक मूल देश को जानबूझकर गलत तरीके से दिखाया जाए। अमेरिकी रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में चीनी सामान को तीसरे देशों में भेजकर उसकी पैकेजिंग बदली जाती है, नए लेबल लगाए जाते हैं, दस्तावेजों में बदलाव किया जाता है या मामूली स्तर की प्रोसेसिंग के बाद उसे उस तीसरे देश का उत्पाद बताकर अमेरिका भेजा जाता है।
अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि इससे चीन पर लगाए गए ऊंचे टैरिफ का उद्देश्य कमजोर पड़ता है। रिपोर्ट में इस व्यवस्था को एक व्यापक “शैडो ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क” के रूप में पेश किया गया है।
2018 के टैरिफ के बाद बढ़ी चिंता
व्हाइट हाउस की रिपोर्ट के अनुसार, चीन पर 2018 में लगाए गए अमेरिकी Section 301 tariffs के बाद इस तरह के व्यापार मार्गों को बढ़ावा मिला। सीधे चीन से अमेरिका आने वाले कुछ सामान पर ऊंचे शुल्क लगने के कारण कंपनियों के लिए कम टैरिफ वाले तीसरे देशों के जरिए सामान भेजने का आर्थिक प्रोत्साहन बढ़ा।
रिपोर्ट में ट्रांसशिपमेंट से जुड़े व्यापार के अलग-अलग अनुमान भी दिए गए हैं। इनमें करीब 40 अरब डॉलर से लेकर 303 अरब डॉलर तक के आंकड़े शामिल हैं। अमेरिकी प्रशासन ने इन अनुमानों के आधार पर बताया है कि समस्या का आकार काफी बड़ा हो सकता है, हालांकि अलग-अलग अनुमानों की गणना अलग-अलग तरीकों से की गई है और उन्हें सीधे एक-दूसरे से तुलना नहीं किया जा सकता।
Bharat का नाम क्यों आया?
Bharat पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन में अपनी भूमिका लगातार मजबूत कर रहा है। मेक इन इंडिया, प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI और चीन से सप्लाई चेन को अलग करने की वैश्विक रणनीति के कारण कई कंपनियों ने भारत में उत्पादन बढ़ाया है।
इसी वजह से भारत उन देशों में शामिल है जिनके जरिए वैश्विक सप्लाई चेन में चीन से जुड़े उत्पाद या कंपोनेंट आगे भेजे जा सकते हैं। अमेरिकी रिपोर्ट में भारत का उल्लेख इसी व्यापक ट्रांसशिपमेंट चिंता के संदर्भ में किया गया है। रिपोर्ट में किसी विशेष भारतीय कंपनी, फैक्ट्री या किसी खास शिपमेंट को टैरिफ चोरी का दोषी ठहराने वाला शिपमेंट-स्तरीय प्रमाण सामने नहीं रखा गया है।
इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। किसी भारतीय उत्पाद में चीनी कच्चा माल या पार्ट्स का इस्तेमाल होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह उत्पाद चीनी मूल का है। आज की वैश्विक सप्लाई चेन में एक उत्पाद के निर्माण में कई देशों के कच्चे माल और कंपोनेंट शामिल हो सकते हैं।
Bharat के एक्सपोर्टर्स पर क्या असर होगा?
रिपोर्ट सामने आने के बाद सबसे बड़ा संभावित असर कस्टम जांच और नियमों के अनुपालन पर पड़ सकता है। अमेरिकी अधिकारी यह सुनिश्चित करने के लिए ‘Rules of Origin’ की जांच सख्त कर सकते हैं कि किसी उत्पाद का वास्तविक निर्माण और पर्याप्त प्रोसेसिंग किस देश में हुई है।
ऐसी स्थिति में भारतीय निर्यातकों को अपने उत्पाद की उत्पत्ति साबित करने के लिए अधिक दस्तावेज और सप्लाई चेन रिकॉर्ड उपलब्ध कराने पड़ सकते हैं। खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, इंजीनियरिंग सामान, सोलर उपकरण, स्टील और अन्य ऐसे क्षेत्रों पर ज्यादा निगरानी हो सकती है जहां चीन से आने वाले कंपोनेंट का इस्तेमाल होता है।
अमेरिका ने ट्रांसशिपमेंट रोकने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी व्यवस्था का इस्तेमाल करने की भी घोषणा की है। इसका उद्देश्य सामान के रूट, घोषित मूल देश और उत्पाद में इस्तेमाल हुए कंपोनेंट से जुड़े डेटा में असामान्य पैटर्न पहचानना है।
क्या भारत पर सीधे कार्रवाई का खतरा है?
फिलहाल भारत का नाम रिपोर्ट में आने को सीधे तौर पर किसी भारतीय कंपनी के खिलाफ कार्रवाई का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन अगर अमेरिकी कस्टम अधिकारियों को किसी खास शिपमेंट में गलत मूल देश घोषित करने या जानबूझकर टैरिफ से बचने के सबूत मिलते हैं, तो उस शिपमेंट पर अतिरिक्त शुल्क, जांच या अन्य व्यापारिक कार्रवाई हो सकती है।
इसलिए भारतीय निर्यातकों के लिए सही दस्तावेज, पारदर्शी सप्लाई चेन और मूल देश से जुड़े नियमों का पालन पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
Bharat को अपने Rules of Origin certification, कस्टम वेरिफिकेशन और एक्सपोर्ट डॉक्यूमेंटेशन को मजबूत करना होगा। कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके पास कच्चे माल की खरीद, निर्माण प्रक्रिया, वैल्यू एडिशन और अंतिम उत्पाद से जुड़े पर्याप्त रिकॉर्ड मौजूद हों।
ऐसा करने से भारतीय कंपनियां अमेरिकी बाजार में किसी गलतफहमी या अतिरिक्त जांच की स्थिति में अपने उत्पाद की वास्तविक उत्पत्ति साबित कर सकेंगी। साथ ही भारत की एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन के रूप में छवि भी मजबूत रहेगी।
Bharat-अमेरिका रिश्तों पर कितना असर?
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दों पर बातचीत महत्वपूर्ण है। इसलिए ट्रांसशिपमेंट को लेकर अमेरिकी जांच से कुछ भारतीय निर्यातकों के लिए अनुपालन संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक इसे भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापक संकट के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। अमेरिका चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों की तलाश कर रहा है और भारत इस रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इसलिए आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी जांच कितनी व्यापक होती है और क्या भारतीय कंपनियों के खिलाफ वास्तविक टैरिफ उल्लंघन के मामले सामने आते हैं। फिलहाल भारत के लिए सबसे जरूरी कदम यही है कि वह अपनी सप्लाई चेन को पारदर्शी बनाए और अमेरिकी बाजार में निर्यात करने वाली कंपनियों को मूल देश से जुड़े नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करे।
