Women’s Day Special: रानी कमलापति से कुदसिया बेगम, सिकंदर बेगम और सुल्तान जहां बेगम तक भोपाल में महिला शासन का इतिहास 107 वर्षों की गौरवशाली विरासत को दर्शाता है।
Women’s Day Special: भोपाल में महिला शासन का इतिहास
भोपाल का इतिहास महिलाओं की शक्ति, साहस और नेतृत्व का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। मध्य भारत के इस ऐतिहासिक शहर में भोपाल में महिला शासन का इतिहास केवल परंपरा नहीं बल्कि प्रेरणा की कहानी है। रानी कमलापति से लेकर कुदसिया बेगम, सिकंदर बेगम, शाहजहां बेगम और सुल्तान जहां बेगम तक, यहां महिलाओं ने शासन, प्रशासन और सामाजिक विकास में अद्वितीय योगदान दिया।
राजा भोज और गौंड शासन का दौर
नवाबी इतिहास के जानकार रिजवान अंसारी के अनुसार भोपाल के बड़ा तालाब का निर्माण परमार वंश के राजा भोज ने कराया था। उनके बाद इस क्षेत्र में गौंड शासन स्थापित हुआ।यह समय मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल के दौरान लगभग 1645 का था।उस समय राजा संग्राम शाह की गौंडवाना हुकूमत थी। उनके अधीन तीन महत्वपूर्ण किले थे —
- गिन्नोरगढ़ (सीहोर)
- चौकीगढ़ (बाड़ी)
- भूपालगढ़ (भोपाल)
बाद में स्थानीय शासकों ने संग्राम शाह के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इससे नाराज होकर संग्राम शाह ने मुगल बादशाह शाहजहां से मदद मांगी।1645 में मुगल सेना यहां भेजी गई और इन किलों पर अधिकार कर लिया गया। बाद में संधि के बाद इन्हें स्थानीय शासकों को वापस सौंप दिया गया।
रानी कमलापति और भूपालगढ़ किला
कमला पार्क के पास स्थित भूपालगढ़ किला उसी दौर की ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है। यहां गौंड राजा भूपाल शाह निवास करते थे।माना जाता है कि उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम भोपाल पड़ा।बाद में इस किले का जीर्णोद्धार निजाम शाह और उनकी पत्नी गौंड रानी कमलापति ने कराया। उन्होंने इसे अपने निवास के रूप में विकसित किया।बड़ा तालाब के किनारे स्थित सात मंजिला रानी कमलापति महल आज भी उस दौर की स्थापत्य कला का शानदार उदाहरण है।इतिहास में रानी कमलापति को 18वीं शताब्दी में भोपाल और गिन्नौरगढ़ की अंतिम गौंड हिंदू शासक माना जाता है।उनकी वीरता और स्वाभिमान के सम्मान में वर्ष 2021 में भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति रेलवे स्टेशन रखा गया।
गौंड शासन और रानी दुर्गवती की वीरता
पुरातत्वविद् पूजा सक्सेना के अनुसार गौंड राजा संग्राम शाह के शासनकाल में पूरे क्षेत्र में 52 गढ़ हुआ करते थे।इनमें भोपाल और गिन्नौरगढ़ भी शामिल थे।बाद में गौंड रानी दुर्गवती ने रायसेन किले पर विजय प्राप्त कर अपनी वीरता का परिचय दिया। यह दौर मध्य भारत में गौंड शासन की शक्ति और प्रभाव का प्रतीक माना जाता है।
नवाबी दौर की शुरुआत
गौंड शासन के बाद भोपाल में नवाबी दौर की शुरुआत हुई।नवाब दोस्त मोहम्मद खान ने इस शहर को बसाया और 1723 से 1949 तक यहां नवाबों का शासन रहा।लेकिन इस दौर की सबसे खास बात यह रही कि यहां महिलाओं की भूमिका बेहद प्रभावशाली रही।
मां जी ममोला की प्रशासनिक भूमिका
मां जी ममोला नवाब दोस्त मोहम्मद खान के बेटे नवाब यार मोहम्मद खां की गैर मुस्लिम पत्नी थीं।इसके बावजूद उन्हें इतना सम्मान प्राप्त था कि लोग उनका नाम लेने के बजाय उन्हें “मां जी” कहकर संबोधित करते थे।उन्होंने तीन नवाबों के शासनकाल में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं —
- नवाब यार मोहम्मद
- फैज मोहम्मद
- हयात मोहम्मद
हयात मोहम्मद को नवाब बनवाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
भोपाल में महिलाओं का 107 वर्ष का शासन
भोपाल के इतिहास का सबसे अनोखा अध्याय वह है जब लगभग 107 वर्षों तक महिलाओं ने रियासत की बागडोर संभाली।
1819 से 1926 के बीच चार महिला शासकों ने भोपाल पर शासन किया —
- कुदसिया बेगम
- सिकंदर बेगम
- शाहजहां बेगम
- सुल्तान जहां बेगम
यह काल भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
कुदसिया बेगम का साहस
भोपाल की पहली महिला शासक नवाब कुदसिया बेगम थीं।उनका शासनकाल 1819 से 1837 तक रहा।उन्होंने अपने दामाद जहांगीर मोहम्मद के खिलाफ आष्टा में युद्ध लड़ा और विजय प्राप्त की।
सिकंदर बेगम का मजबूत प्रशासन
दूसरी महिला शासक सिकंदर बेगम का शासनकाल 1860 से 1868 तक रहा।उन्हें मजबूत प्रशासन और भोपाल की सेना को संगठित एवं शक्तिशाली बनाने के लिए जाना जाता है।
शाहजहां बेगम की स्थापत्य विरासत
तीसरी महिला शासक शाहजहां बेगम का शासनकाल 1844 से 1901 तक रहा।उनके दौर में भोपाल में कई महत्वपूर्ण निर्माण हुए —
- शाहजहानाबाद सिटी
- ताजमहल पैलेस
- ताजुल मसाजिद
- तीन तालाबों की जल संरचना
सुल्तान जहां बेगम और आधुनिक विकास
भोपाल की अंतिम महिला शासक सुल्तान जहां बेगम थीं।वे 1901 से 1926 तक रियासत की शासक रहीं।उन्होंने महिलाओं की आजादी, आधुनिक शिक्षा और नगर प्रशासन के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।वे दुनिया की पहली महिला थीं जिन्हें किसी विश्वविद्यालय का चुना हुआ चांसलर बनने का सम्मान मिला।1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के बाद उन्हें उसका पहला चांसलर बनाया गया।
रानी शालमली और शिक्षा का संरक्षण
इतिहासकार डॉ. आलोक गुप्ता बताते हैं कि रानी कमलापति से पहले रानी शालमली का भी उल्लेख मिलता है।चौक बाजार में उनके द्वारा बनाए गए सभा मंडप में लगभग 500 बच्चे शिक्षा प्राप्त करते थे।
आजादी आंदोलन में महिलाओं का योगदान
जब भोपाल रियासत के भारत में विलय का आंदोलन चला तब महिलाओं ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई।
इस आंदोलन में प्रमुख नाम थे —
- मोहनी देवी
- शांती देवी
- बसंती देवी
- रुकमणी देवी
नवाब की पुलिस इन्हें शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर छोड़ देती थी। इसके बावजूद ये महिलाएं पैदल चलकर वापस लौटती थीं और आंदोलन जारी रखती थीं।
महिला नेतृत्व की अनोखी विरासत
रानी कमलापति की वीरता, मां जी ममोला की प्रशासनिक कुशलता और भोपाल की बेगमों के प्रगतिशील शासन ने मिलकर इस शहर को एक विशिष्ट पहचान दी है।इसी कारण भोपाल में महिला शासन का इतिहास भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व की सबसे प्रेरक विरासतों में से एक माना जाता है।

