विविध भारती के 69 वर्ष: गीत-संगीत और यादों से पीढ़ियों को जोड़ती आकाशवाणी की आवाज
लेख: डॉ. सुरेन्द्र मीणा
नई दिल्ली। आकाशवाणी की विविध भारती सेवा ने 3 अक्टूबर 2026 को अपनी स्थापना के 69 वर्ष पूरे कर लिए। 3 अक्टूबर 1957 को शुरू हुई इस सेवा ने फिल्मी गीतों, रेडियो नाटकों और आत्मीय प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रोताओं के जीवन में विशेष स्थान बनाया। बदलते मनोरंजन माध्यमों के बीच इसकी वर्षगांठ भारतीय रेडियो की उस यात्रा को याद करने का अवसर है, जिसमें आवाज और संगीत ने अलग-अलग पीढ़ियों को एक साझा अनुभव दिया।
3 अक्टूबर 1957 को हुई थी शुरुआत
स्वतंत्रता के बाद भारत में रेडियो सूचना और जनसंपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा था। श्रोताओं की मनोरंजन संबंधी जरूरतों और फिल्मी संगीत की बढ़ती लोकप्रियता के बीच विविध भारती की शुरुआत हुई। प्रसार भारती के अनुसार, इस सेवा की परिकल्पना रेडियो सीलोन की लोकप्रियता से मिलने वाली प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखकर की गई थी।
विविध भारती ने गीत-संगीत को अपनी पहचान का प्रमुख हिस्सा बनाया। इसके साथ नाटक, बातचीत और अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों ने रेडियो सुनने के अनुभव को व्यापक बनाया। श्रोताओं के लिए यह दैनिक कामकाज के बीच साथ निभाने वाली परिचित आवाज बन गई।
विविध कार्यक्रमों से बनी अलग पहचान
विविध भारती की पहचान उसके कार्यक्रमों की विविधता में दिखाई देती है। फिल्मी संगीत पसंद करने वाले श्रोताओं से लेकर नाटक और कलाकारों की बातचीत सुनने वालों तक, इसके कार्यक्रमों ने अलग-अलग रुचियों को स्थान दिया।
‘जयमाला’, ‘हवा महल’, ‘संगीत सरिता’, ‘भूले-बिसरे गीत’, ‘चित्रलोक’, ‘छायागीत’ और ‘इनसे मिलिए’ जैसे कार्यक्रम इसकी लोकप्रिय प्रस्तुतियों में शामिल रहे हैं। प्रसार भारती इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी श्रोताओं के दैनिक जीवन से जुड़े कार्यक्रमों के रूप में उल्लेखित करता है।
‘हवा महल’ में आवाज से बनते दृश्य
रेडियो की विशेषता है कि वह दृश्य दिखाए बिना कहानी को जीवंत कर सकता है। ‘हवा महल’ जैसी प्रस्तुतियों में संवाद, ध्वनि प्रभाव और पात्रों की आवाजें श्रोता के मन में घटनाओं की तस्वीर बनाती हैं।
हास्य और नाटकीय प्रसंगों के साथ सुनने वाला अपनी कल्पना से पात्रों और परिस्थितियों को आकार देता है। यही अनुभव रेडियो नाटक को विशिष्ट बनाता है। घर या कार्यस्थल पर बैठे श्रोता आवाजों के माध्यम से कहानी की दुनिया में प्रवेश करते हैं।
‘जयमाला’ से जुड़ी सैनिकों की भावनाएं
‘जयमाला’ ने सैनिक श्रोताओं के लिए गीत-संगीत की आत्मीय दुनिया बनाई। दूर तैनात जवानों के लिए परिचित गीत घर और परिवार की स्मृतियों से जुड़ने का माध्यम रहे।
इस तरह के कार्यक्रम रेडियो की भावनात्मक पहुंच को सामने लाते हैं। एक गीत अलग-अलग स्थानों पर मौजूद लोगों को समान अनुभूति दे सकता है। विविध भारती के बारे में लिखते हुए सैनिकों और उनके परिवारों से जुड़े इस पहलू का विशेष महत्व है।
गीतमाला और अमीन सयानी की याद
भारतीय रेडियो की चर्चा अमीन सयानी और ‘बिनाका गीतमाला’ की स्मृतियों के बिना अधूरी लगती है। हालांकि, इस कार्यक्रम की शुरुआती लोकप्रियता रेडियो सीलोन से जुड़ी थी। इसे विविध भारती की शुरुआत से प्रसारित कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। रेडियो सीलोन के फिल्मी संगीत और अमीन सयानी की प्रस्तुति ने भारतीय श्रोताओं की सुनने की आदतों को व्यापक रूप से प्रभावित किया।
उनकी आवाज और आत्मीय संबोधन ने उद्घोषणा को अलग पहचान दी। गीतों के साथ जुड़ी बातचीत ने श्रोताओं को संगीत सुनने के अलावा उसके बारे में जानने और चर्चा करने का अवसर भी दिया।
उद्घोषकों की आवाज में अपनापन
विविध भारती के साथ श्रोताओं का जुड़ाव बनाने में उद्घोषकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यूनुस खान और ममता सिंह जैसे प्रस्तोताओं की आवाजों का उल्लेख करते हुए लेखक उनकी सहज भाषा, स्पष्ट प्रस्तुति और अपनापन याद करते हैं।
रेडियो प्रस्तुति में शब्दों का चयन, बोलने की गति और आवाज का उतार-चढ़ाव महत्वपूर्ण होता है। दृश्य के अभाव में इन्हीं तत्वों के माध्यम से श्रोता का ध्यान बनाए रखना पड़ता है। परिचित उद्घोषक की आवाज कई बार कार्यक्रम के साथ निजी जुड़ाव का आधार बन जाती है।
परिवारों का साझा मनोरंजन था रेडियो
रेडियो के दौर में कार्यक्रम सुनना अक्सर सामूहिक अनुभव होता था। घर में काम करते लोग, दुकान पर बैठे सदस्य और विश्राम करते बुजुर्ग एक ही प्रसारण सुन सकते थे। किसी पसंदीदा गीत या कार्यक्रम के समय परिवार के सदस्यों का साथ बैठना मनोरंजन को बातचीत का अवसर भी बनाता था।
आज मोबाइल पर हर व्यक्ति अपनी पसंद की सामग्री चुन सकता है। ऐसे समय में रेडियो की स्मृतियां उस साझा अनुभव की याद दिलाती हैं, जिसमें गीतों और कार्यक्रमों पर परिवार के भीतर चर्चा होती थी।
पुराने गीतों में सुरक्षित निजी स्मृतियां
किसी गीत का संबंध केवल उसकी धुन या शब्दों से नहीं होता। वह बचपन, कॉलेज, मित्रता, परिवार या किसी विशेष अवसर की याद से जुड़ सकता है। वर्षों बाद वही गीत सुनने पर उससे संबंधित समय और लोग स्मृति में लौट आते हैं।
विविध भारती के प्रति भावनात्मक लगाव को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। श्रोता गीत के साथ उसे पहली बार सुनने का स्थान, रेडियो की आवाज और अपने जीवन का कोई प्रसंग भी याद करते हैं।
भाषा और प्रस्तुति सीखने का माध्यम
रेडियो सुनना भाषा से परिचित होने का अवसर भी देता है। स्पष्ट उच्चारण, सहज वाक्य और संयमित प्रस्तुति सुनने वाले को संवाद की शैली समझने में मदद कर सकते हैं।
लेखक के अनुसार, विविध भारती की प्रस्तुतियों ने अनेक श्रोताओं के लिए भाषा की अनौपचारिक पाठशाला जैसा काम किया। उद्घोषकों की बातचीत सुनते हुए शब्दों के प्रयोग और अभिव्यक्ति के तरीकों से परिचय होता था। इस योगदान को मनोरंजन के साथ जुड़ी सांस्कृतिक भूमिका के रूप में देखा जा सकता है।
नई तकनीक से बढ़े सुनने के विकल्प
टेलीविजन, निजी एफएम और इंटरनेट के आने से रेडियो के सामने नए विकल्प और चुनौतियां आईं। विविध भारती की सामग्री भी पारंपरिक रेडियो सेट से आगे दूसरे माध्यमों तक पहुंची। प्रसार भारती के अनुसार, 5 अक्टूबर 2008 से इसके कार्यक्रम डीटीएच पर उपलब्ध कराए गए।
तकनीक बदलने के साथ सुनने के उपकरण बदल सकते हैं, लेकिन आवाज के माध्यम से बनने वाला संबंध बना रहता है। रेडियो की विशेषता यह भी है कि श्रोता अन्य काम करते हुए कार्यक्रम सुन सकता है।
नई पीढ़ी के लिए सांस्कृतिक विरासत
नई पीढ़ी के लिए विविध भारती पुराने फिल्म संगीत और रेडियो प्रस्तुति की परंपरा से परिचित होने का माध्यम है। इसके गीत और कार्यक्रम उस समय की मनोरंजन संस्कृति को समझने का अवसर देते हैं, जब सुनना परिवार और समुदाय का साझा अनुभव था।
69 वर्षों की यात्रा पर विविध भारती की चर्चा उसके इतिहास के साथ श्रोताओं की निजी स्मृतियों की चर्चा भी है। इसके परिचित स्वर याद दिलाते हैं कि प्रभावी संवाद में तकनीक के साथ सहज भाषा, संवेदनशील प्रस्तुति और अपनापन भी महत्वपूर्ण हैं।
