ऋषभोदय, दिल्ली में दिगम्बर जैनाचार्य परम पूज्य महा-सुनिराज श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा में जीवन को सुखी, संतुलित और शांत बनाने के 6 महत्वपूर्ण सूत्र बताए। मैत्री भाव से लेकर क्षमा और अर्थशास्त्र तक आचार्य श्री की गुरु वाणी में मिले प्रेरक संदेश।
विशुद्ध सागर जी महाराज प्रवचन: ऋषभोदय दिल्ली से गुरु वाणी में मिले जीवन के 6 अनमोल सूत्र
रिपोर्टर – राजेश जैन दद्दू
स्थान – ऋषभोदय, दिल्ली
दिनांक – 05 सितंबर 2026 | विशुद्ध देशना लाइव दिल्ली | सुबह 10:49 बजे
विशुद्ध सागर जी महाराज प्रवचन में शनिवार को ऋषभोदय, दिल्ली में विराजित दिगम्बर जैनाचार्य परम पूज्य महा-सुनिराज श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन, साधना, श्रद्धा, मैत्री, क्षमा और अर्थशास्त्र से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिए। आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में परिस्थितियों को बदलने से पहले मनःस्थिति को व्यवस्थित करना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं को स्पर्धा के स्थान पर श्रद्धा, क्रोध के स्थान पर क्षमा और प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव रखने की प्रेरणा दी।
विषय सूची
- बोध पूर्वक ही शोध सम्भव है
- स्पर्धा मत करो, श्रद्धा रखो
- परिस्थिति ठीक न हो, तो मनःस्थिति सुधारो
- दुनिया का मित्र – मैत्री भाव
- जैन मुनियों के कमण्डल से सीखो अर्थशास्त्र
- क्षमा – चिंता मारी
1. बोध पूर्वक ही शोध सम्भव है
आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा, “बोध पूर्वक ही शोध सम्भव है।” बोध, बोधि से शोध और शोध से ही समाधि और समाधि से ही सिद्धि, शाश्वत-सुख सम्भव है।
उन्होंने कहा कि बोध और शोध का जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। संयमी-साधक बोध से शोध और शोध से समाधि की साधना में पुरुषार्थ करते हैं। जीवन को सही दिशा देने के लिए व्यक्ति में बोध का होना आवश्यक है।
2. स्पर्धा मत करो, श्रद्धा रखो
विशुद्ध सागर जी महाराज प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को पुरुषार्थ पूर्वक अपनी योग्यता वर्धमान करना चाहिए और अपने इष्टों के प्रति श्रद्धा रखना चाहिए, परन्तु अपने ज्येष्ठों से प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहिए।
स्वस्थ मानसिकता से ही कार्य करना श्रेष्ठ है। ज्येष्ठों के अनुभव से हमें बहुत-कुछ प्राप्त होता है, इसलिए कार्य करने के पूर्व बड़ों से सलाह अवश्य लेना चाहिए। बड़ों की सीख जीवन में सच्ची राह दिखाती है।
3. परिस्थिति ठीक न हो, तो मनःस्थिति सुधारो
आचार्य श्री ने जीवन की विपरीत परिस्थितियों पर अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि जब परिस्थितियाँ विपरीत हों, तो धैर्य रखें और अधीर न हों। समय दे दें, समस्या का समाधान हो जाएगा।
विपरीत परिस्थिति होने पर भी अपनी मनःस्थिति को संभाल कर रखें। जो संकटों में अपनी मनःस्थिति को व्यवस्थित रखता है, उसकी परिस्थितियाँ भी यथा-समय ठीक हो जाती हैं।
आचार्य श्री ने कहा, “परिस्थितियाँ ठीक करने पर विचार मत करो, अपनी मनःस्थिति को ठीक करो।”
उन्होंने कहा कि जगत की वस्तु-व्यवस्था व्यवस्थित है, उसे कोई अव्यवस्थित नहीं कर सकता है। सूर्य का उदय पूर्व दिशा से होता है, उसे कोई नहीं रोक सकता है। सोच की शुचिता ही पवित्रता प्रदान करती है।
4. दुनिया का मित्र – मैत्री भाव
विशुद्ध सागर जी महाराज प्रवचन में मैत्री भावना का महत्व समझाते हुए आचार्य श्री ने कहा कि दुनिया को सुखी करने वाला कोई सूत्र है, उसका नाम मैत्री-भाव है। अपने द्वारा किसी को कष्ट न हो, यही मैत्री-भाव है।
विश्व-कल्याण की भावना ही मैत्री भाव है। जो मैत्री-भावना से पूर्ण होता है, वह न स्वयं कष्ट में जीता है और न किसी अन्य को कष्ट देता है। मैत्री भावना अहिंसा-धर्म की पहचान है। मैत्री प्राणि-मात्र के प्रति होती है।
उन्होंने कहा कि ममता में, प्रेम में पक्षपात हो सकता है, परन्तु मैत्री-भावना में पक्षपात नहीं होता है। मैत्री भाव शत्रु-मित्र से परे होता है। जो मैत्री-भाव से युक्त होता है, उसे उपसर्ग-कर्ता पर भी क्रोध नहीं आता है। “अघवान में भगवान दिखे, यही जैन धर्म की मैत्री-भावना है।”
5. जैन मुनियों के कमण्डल से सीखो अर्थशास्त्र
आचार्य श्री ने अर्थशास्त्र को बेहद सरल उदाहरण से समझाते हुए कहा कि दिगम्बर जैन मुनि शारीरिक-शुद्धि हेतु काष्ठ का कमण्डल रखते हैं। उसमें बड़े मुख से पानी भरते हैं और छोटी टोंटी से पानी का प्रयोग करते हैं।
एक सच्चा अर्थशास्त्री समय आने पर हजार की वस्तु भी ग्यारह सौ में खरीद लेता है, परन्तु आवश्यकता न होने पर हजार की वस्तु पांच सौ में नहीं खरीदता है।
उन्होंने कहा, “आय अधिक, व्यय कम” यही सच्चे अर्थशास्त्री की पहचान है। संतुलित-जीवन ही श्रेष्ठ है।
6. क्षमा – चिंता मारी
धर्मसभा में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने क्षमा का अत्यंत सरल और प्रभावशाली उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा, “जैसे दूध में उबाल आने पर माँ पानी का छींटा मार देती है, वैसे ही क्रोध का उबाल आने पर क्षमा का छींटा मार दो।”
आचार्य श्री की यह गुरु वाणी जीवन में क्रोध को नियंत्रित करने और क्षमा को अपनाने का संदेश देती है। क्षमा व्यक्ति के भीतर शांति और मैत्री की भावना को मजबूत करती है।
ऋषभोदय, दिल्ली से हुई इस विशुद्ध सागर जी महाराज प्रवचन की धर्मसभा में आचार्य श्री ने बोध से लेकर शोध, समाधि, श्रद्धा, मनःस्थिति, मैत्री भाव, संतुलित अर्थव्यवस्था और क्षमा तक जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं पर मार्गदर्शन दिया।
