विनय से सभी कर्मों का क्षय विषय पर पूज्या सुमनप्रभाजी म.सा. ने थांदला में सम्यक्त्व, विनय और साधना का गहन महत्व बताया। अणुश्री की मासिक पुण्यतिथि पर तप, जप और वर्षितप आराधकों का पारणा भी हुआ।
थांदला नगर में जिनवाणी का दिव्य वातावरण
साध्वीवृंद के मंगल प्रवेश के बाद प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु जिनवाणी का रसपान कर भावविभोर हो रहे हैं।पूज्या श्री सुमनप्रभाजी म.सा. सम्यक्त्व के 67 बोलों का आगम सम्मत प्रमाणों के आधार पर महत्व प्रतिपादित कर रही हैं।धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालु आध्यात्मिक ज्ञान और आत्मकल्याण के मार्ग से जुड़ रहे हैं।
सम्यक्त्व में विनय का विशेष महत्व
विनय से सभी कर्मों का क्षय विषय को स्पष्ट करते हुए पूज्याश्री ने बताया कि सम्यक्त्व में तीसरा बोल 10 प्रकार के संयम का वर्णन करता है।इनमें —
- अरिहंत
- सिद्ध
- आचार्य
- उपाध्याय
- स्थवीर
- कुल
- गण
- चतुर्विध संघ
- साधर्मिक
- क्रियावान
की भक्ति एवं विनय का विशेष महत्व बताया गया है।
वीतराग भक्ति ही सच्चा विनय
पूज्या श्री ने अत्यंत सरल उदाहरण देते हुए कहा कि यदि व्यक्ति का मन रूपी कलश गंदे नाले में गिरता है तो उसमें गंदगी समा जाती है, जबकि अमृत में डालने पर अमृत भर जाता है।इसी प्रकार यदि मन सरागी देवों की भक्ति में लगेगा तो उसमें राग का पोषण होगा, जबकि वीतरागी एवं वीतराग वाणी की भक्ति व्यक्ति को स्वयं वीतरागी बना देती है।उन्होंने कहा कि साधकों को विवेकपूर्वक हर किसी के आगे झुकने के बजाय वीतराग की भक्ति करनी चाहिए, यही वास्तविक विनय है।
चार प्रकार के लौकिक विनय का वर्णन
पूज्याश्री ने संसार में विनय की प्रमुखता समझाते हुए कहा कि लोक व्यवहार में मनुष्य एक-दूसरे का विनय करता ही है।उन्होंने चार प्रकार के लौकिक विनय बताए —
लोकोपचार विनय
लोक व्यवहार निभाने के लिए किया जाने वाला विनय।
अर्थ विनय
स्वार्थ सिद्धि के लिए किया जाने वाला विनय।
काम विनय
इन्द्रिय एवं कामवासना की पूर्ति हेतु किया जाने वाला विनय।
भय विनय
हानि या भय से बचने के लिए किया जाने वाला विनय।पूज्याश्री ने कहा कि ये चारों प्रकार के विनय भव परंपरा को बढ़ाने वाले होते हैं।
आध्यात्मिक विनय से होता है कर्मों का क्षय
विनय से सभी कर्मों का क्षय विषय को आगे बढ़ाते हुए पूज्याश्री ने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बताए गए 10 प्रकार के विनय अष्ट कर्मों के क्षय में सहायक बनते हैं।यह विनय व्यक्ति की भव परंपरा को कम करने वाला होता है और आत्मा को मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
पूज्या खामेमिश्रीजी ने बताया साधना का महत्व
इस दौरान मधुर व्याख्यानी पूज्या श्री खामेमिश्रीजी ने उपस्थित परिषद को वैराग्य वर्धक उपदेश दिए।उन्होंने कहा कि दुःख दो प्रकार के होते हैं —
- संसार का दुःख
- साधना का दुःख
उन्होंने कहा कि वास्तव में ज्ञानियों की दृष्टि में दुःख संसार में ही है, लेकिन अज्ञानी इसे समझ नहीं पाता।मनुष्य संसार के अनेक दुःख सहन कर लेता है, लेकिन साधना के अल्प दुःख को सहन नहीं कर पाता।उन्होंने कहा कि संसार के दुःख अंततः दुःख ही देते हैं, जबकि साधना का अल्प कष्ट महान निर्जरा का कारण बनता है।
अणुश्री की मासिक पुण्यतिथि श्रद्धा के साथ मनाई गई
जन-जन की आस्था के केंद्र जिन शासन के महान प्रभावशाली जैनाचार्य पूज्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. की पावन मासिक पुण्यतिथि यहाँ विराजित पूज्या श्री सुमनप्रभाजी म.सा. आदि ठाणा-4 एवं बुद्धपुत्र प्रवर्तक श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा. की आज्ञानुवर्ती सरलमना महासती पूज्या श्री निखिलशीलाजी म.सा. आदि ठाणा-4 के पावन सानिध्य में मनाई गई।इस अवसर पर तप, जप एवं विशेष अनुष्ठान आयोजित किए गए।
नवकार महामंत्र जाप और वर्षितप आराधकों का पारणा
संघ प्रवक्ता पवन नाहर ने जानकारी देते हुए बताया कि प्रातः 8 से 9 बजे तक नवकार महामंत्र के जाप आयोजित हुए।जिसका लाभ सुश्राविका श्रीमती सरोज नगीनलाल शाहजी, सुधा रमेशचंद्र शाहजी एवं सुश्री कविता लालचन्द्र बोथरा ने लिया।वहीं जिन शासन में चल रहे 92 वर्षितप आराधकों के पारणे का लाभ सिंगापुर निवासी कमल जैन परिवार ने लिया।
समाजजनों ने लिया प्रभावना का लाभ
इस अवसर पर प्रकाशचंद्र घोड़ावत, अशोक मोदी, चंद्रकांत घोड़ावत, संजय लोढ़ा, गोपाल घोड़ावत, जितेंद्र घोड़ावत, धर्मेश मोदी, संदीप लोढ़ा एवं चिराग घोड़ावत आदि ने प्रभावना का लाभ लेते हुए सभी वर्षितप आराधकों की सेवा की।उल्लेखनीय है कि श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया, सचिव हितेश शाहजी एवं कोषाध्यक्ष रजनीकांत शाहजी के कुशल नेतृत्व में नगर में चल रहे ऐतिहासिक 92 वर्षितप आराधकों के पारणों का लाभ थांदला वर्षितप आराधकों के परिवारों के साथ उनके नाते-रिश्तेदार भी लेकर तप अनुमोदना का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।


