मनरेगा का नाम बदलने पर सोनिया गांधी का हमला, बोलीं—‘नौकरशाही नियमों का सेट बनकर रह गया नया कानून’
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की जगह विकसित भारत रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) – VB-G RAM G बिल, 2025 लागू किए जाने को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह विधेयक कानून बन गया है, जिसके साथ ही करीब दो दशक पुराना मनरेगा अधिनियम एक नए कानूनी ढांचे से बदल दिया गया है।
इस फैसले पर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में लिखे अपने लेख में सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि नया कानून काम के संवैधानिक अधिकार, विकेंद्रीकरण और ग्रामीण मज़दूरों की मोलभाव की ताकत को कमजोर करता है।
“बिना चर्चा और सलाह के खत्म किया गया मनरेगा”
सोनिया गांधी ने लिखा कि मोदी सरकार ने बिना किसी व्यापक चर्चा, परामर्श या संसदीय प्रक्रियाओं का सम्मान किए बिना MGNREGA को खत्म करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी का नाम हटाना केवल शुरुआत थी, जबकि असल में पूरे उस ढांचे को खत्म कर दिया गया है, जिसकी वजह से यह योजना प्रभावी रही।
उनके अनुसार, मनरेगा दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में से एक रही है, जिसका सबसे अधिक अध्ययन और मूल्यांकन किया गया है। लेकिन नए कानून में कानूनी गारंटी के मूल विचार को ही समाप्त कर दिया गया है और इसे “नौकरशाही नियमों के एक सेट” में बदल दिया गया है।
सरकार बनाम दावा: 125 दिन की रोजगार गारंटी
केंद्र सरकार का दावा है कि नए कानून के तहत ग्रामीण परिवारों के लिए वार्षिक रोजगार गारंटी को 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है, और यह विकसित भारत 2047 के विज़न से जुड़ा हुआ है।
हालांकि सोनिया गांधी ने इस दावे को भ्रामक बताया। उन्होंने लिखा कि वास्तव में पूरे साल की रोजगार गारंटी को कमजोर कर दिया गया है। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे खेती के पीक सीज़न के दौरान 60 ऐसे दिन तय करें, जब कोई काम नहीं दिया जाएगा।
उनका कहना है कि मनरेगा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसने ग्रामीण भारत में भूमिहीन और गरीब मज़दूरों की मोलभाव करने की ताकत बढ़ाई, जिससे खेती की मज़दूरी में इज़ाफा हुआ। नए कानून के तहत यह ताकत स्पष्ट रूप से कम हो जाएगी और मजदूरी पर दबाव पड़ेगा।
“राज्यों पर डाला जा रहा आर्थिक बोझ”
सोनिया गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि नए कानून में खर्च का बड़ा हिस्सा राज्यों पर डाल दिया गया है। इससे राज्य सरकारें इस योजना के तहत काम देने से हतोत्साहित होंगी।
उन्होंने कहा कि पहले से ही वित्तीय दबाव झेल रहे राज्यों की हालत और खराब हो जाएगी, जिससे ग्रामीण रोजगार पर सीधा असर पड़ेगा। उनके मुताबिक, यह कदम सहकारी संघवाद की भावना के भी खिलाफ है।
विकेंद्रीकरण खत्म करने का आरोप
अपने लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि मोदी सरकार ने मनरेगा के विकेंद्रीकृत स्वरूप को भी खत्म कर दिया है। 73वें संविधान संशोधन के तहत ग्राम सभा को काम की योजना बनाने और उसे लागू करने की अहम भूमिका दी गई थी।
लेकिन नए कानून में इस व्यवस्था को हटाकर PM गतिशक्ति नेशनल मास्टर प्लान जैसे टॉप-डाउन मॉडल को लागू किया जा रहा है। सोनिया गांधी के अनुसार, इससे स्थानीय जरूरतों की बजाय केंद्र सरकार की प्राथमिकताएं हावी होंगी और यह पूरी तरह केंद्रीकरण का उदाहरण है।

“125 दिन का दावा झूठा है”
सोनिया गांधी ने लिखा कि मोदी सरकार का यह दावा गलत है कि रोजगार गारंटी को 125 दिन किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार के इरादों को समझने के लिए मनरेगा को कमजोर करने का पिछले दस वर्षों का रिकॉर्ड ही काफी है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इसकी शुरुआत संसद में योजना का मज़ाक उड़ाने से हुई और फिर बजट में बढ़ोतरी न करने, अधिकार-आधारित ढांचे को कमजोर करने वाली तकनीक लागू करने और मजदूरी भुगतान में देरी जैसी नीतियों के जरिए इसे धीरे-धीरे खत्म किया गया।
“यह सिर्फ मनरेगा नहीं, अधिकारों पर व्यापक हमला”
सोनिया गांधी ने मनरेगा में बदलाव को सरकार द्वारा संविधान और अधिकार-आधारित नीतियों पर हो रहे व्यापक हमले से जोड़ा। उन्होंने कहा कि वोट देने के अधिकार से लेकर सूचना के अधिकार, शिक्षा का अधिकार, वन अधिकार अधिनियम, भूमि अधिग्रहण कानून और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण जैसे कई कानूनों को कमजोर किया गया है।
उन्होंने यह भी आशंका जताई कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 अगला निशाना हो सकता है।
“मनरेगा का खत्म होना सामूहिक नैतिक विफलता”
लेख के अंतिम हिस्से में सोनिया गांधी ने कहा कि MGNREGA ने महात्मा गांधी के सर्वोदय के विचार को साकार किया और काम के संवैधानिक अधिकार को ज़मीन पर उतारा। उनका कहना है कि इस कानून का खत्म होना देश की सामूहिक नैतिक विफलता है, जिसके दूरगामी आर्थिक और मानवीय परिणाम होंगे।
उन्होंने अपील की कि अब पहले से कहीं अधिक जरूरी है कि देशवासी एकजुट होकर उन अधिकारों की रक्षा करें, जो समाज के सबसे कमजोर वर्गों की सुरक्षा करते हैं।
