उत्तम तप धर्म के रूप में मनाया दसल,क्षण पर्व का सातवां दिन
झुमरीतिलैया (कोडरमा)। जैन धर्म के प्रमुख पर्व दसलक्षण पर्यूषण के सातवें दिन श्रद्धालुओं ने ‘उत्तम तप धर्म’ के रूप में पर्व मनाया। इस अवसर पर जैन मुनि श्री 108 सुयश सागर गुरुदेव ने साधर्मी बंधुओं को धर्म और ज्ञान का संदेश देते हुए तप धर्म का महत्व बताया।
मुनि श्री सुयश सागर जी ने कहा कि इच्छाओं का त्याग करना ही तप धर्म है। शांति के साथ दुखों को सहन करना सबसे बड़ा तप है। तप के बिना आत्मा की शुद्धि संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि जीवन में उसी के सामने झुकना चाहिए, जिसके जीवन में तप हो। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जमीन के नीचे दबने वाली मिट्टी भी आग में तपने के बाद मूर्ति का आकार लेकर पूजनीय बन जाती है।
उन्होंने कहा कि तप विशुद्धि और वाणी संयम के साथ किया जाना चाहिए। मोक्ष मार्ग की प्राप्ति के लिए अंत:करण को स्वच्छ रखते हुए संयमपूर्वक तप करना आवश्यक है। ऐसा तप ही कर्मों की निर्जरा का साधन बनता है। यदि अंतरंग में शांति रूपी तप धारण नहीं किया जाए तो बाहरी तपस्या भी सार्थक नहीं होती।
मुनि श्री ने कहा कि नियम और संयम से जीवन जब श्रृंगारित होता है, तभी व्यक्ति तप के मार्ग पर आगे बढ़ता है। आत्मा में अनंत शक्ति विद्यमान है, जिसे तप के माध्यम से निखारा जा सकता है। उन्होंने कहा कि विश्व में जैन धर्म की पहचान तप, त्याग और तपस्या से है। जैन दर्शन व्यक्ति को भगवान बनने की दिशा दिखाता है। भेद विज्ञान के माध्यम से आत्मस्वरूप की पहचान होती है।
उन्होंने कहा कि मंगल ग्रह में मंगल नहीं, बल्कि जीवन में मंगल खोजने की आवश्यकता है। कर्मों के क्षय को दूर कर सिद्धत्व की ऊंचाई प्राप्त करना ही जैन दर्शन का उद्देश्य है। जीवन को परखकर और तराशकर बेहतर बनाना ही तप है। उन्होंने श्रद्धालुओं से ऐसा जीवन जीने का आह्वान किया, जिससे किसी को ठेस न पहुंचे।
मुनि श्री ने कहा कि शरीर को भी धर्म के मार्ग पर तपाना पड़ता है। तप के माध्यम से व्यक्ति भक्त से भगवान बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला धर्म है और जीवन में सुख-शांति पाने के लिए इच्छाओं को सीमित करना जरूरी है। तप में कष्ट नहीं, बल्कि आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।
विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम हुए
प्रात:काल गुरुदेव सुयश सागर जी के मुखारविंद से बड़ा मंदिर की मूल वेदी पर भगवान पारसनाथ की प्रथम कलश एवं शांतिधारा का सौभाग्य दिलीप मुन्ना जैन बाकलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ।
मुनि सुब्रतनाथ भगवान का श्री विहार कर प्रथम कलश एवं शांतिधारा का सौभाग्य राकेश आदित्य जैन छाबड़ा परिवार तथा दूसरी ओर से अशोक, विनोद, अर्हम और कथान्स जैन अजमेरा को मिला।
पंडाल परिसर में भगवान महावीर स्वामी के श्री विहार एवं प्रथम अभिषेक का सौभाग्य अनिल रौनक जैन कासलीवाल परिवार एवं प्रमोद खुशबू जैन पांडया परिवार को प्राप्त हुआ।
भगवान महावीर स्वामी की महा शांतिधारा का सौभाग्य विमल, संजय, अजय जैन बढ़जातया परिवार एवं शशि रीता जैन सेठी परिवार को मिला।
नया मंदिर, पानी टंकी रोड में भगवान महावीर की शांतिधारा का सौभाग्य सुनील, रोशन, अतिशय जैन छाबड़ा परिवार एवं निर्मल, दिनेश, नरेश जैन झाझंरी परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं भगवान आदिनाथ की शांतिधारा का सौभाग्य सुरेश, शैलेश, सौरभ जैन लूहारिया परिवार को मिला।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने लिया भाग
रात्रि में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान ‘णमोकार मंत्र सजाओ फ्रेम प्रतियोगिता’ का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
यह जानकारी जैन समाज के मीडिया प्रभारी राजकुमार जैन अजमेरा एवं नवीन जैन ने दी।
