US-यूरोपीय संघ EU टैरिफ युद्ध: भारत को मिलेगा बड़ा लाभ
नई दिल्ली: अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के बीच चल रहे टैरिफ युद्ध ने वैश्विक व्यापार पर बड़ा असर डाला है। हालांकि, इस स्थिति से भारत के लिए अवसर पैदा हो सकते हैं, खासकर भारतीय निर्यातक और निवेशक इसके सीधे लाभार्थी बन सकते हैं। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती कड़वाहट ने यूरोपीय संघ के देशों को भारत जैसे स्थिर व्यापार साझेदारों की ओर आकर्षित किया है। इससे भारत-ईयू प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को भी मजबूती मिलने की संभावना है।
US-EU टैरिफ विवाद का कारण
17 जनवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड और फिनलैंड से आयातित वस्तुओं पर 10% टैरिफ की घोषणा की। यह कदम उन देशों द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी प्रस्ताव का विरोध करने के बाद उठाया गया। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यह टैरिफ केवल तब तक लागू रहेगा जब तक अमेरिका अपने ‘ग्रीनलैंड खरीद’ सौदे को पूरा नहीं कर लेता। 1 जून से यह टैरिफ बढ़कर 25% हो जाएगा।
इस टैरिफ युद्ध का नतीजा केवल अमेरिका और यूरोप के बीच ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापारिक भू-राजनीति पर भी पड़ रहा है। यूरोपीय निर्यातक अब उन स्थिर साझेदारों की तलाश में हैं जो अमेरिका की आर्थिक नीतियों से प्रभावित नहीं हों, और इस मामले में भारत उनके लिए सबसे उपयुक्त विकल्प बन सकता है।
India-EU व्यापार में अवसर
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच टैरिफ विवाद के कारण भारत सहित अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंध और मजबूत हो सकते हैं। यूरोपीय संघ अब भारत जैसे स्थिर और भरोसेमंद साझेदार के साथ अपने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित है।
रेडीमेड कपड़ों के निर्यातक टीटी लिमिटेड के प्रबंध निदेशक संजय जैन ने कहा, “यूरोपीय संघ इस समझौते के परिचालन पक्ष को जल्द पूरा करना चाहेगा। इसका सीधा फायदा भारत को मिलेगा और व्यापारिक अनुमोदन प्रक्रिया में तेजी आएगी।”
इसके अलावा, भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को ‘Mother of All Deals’ कहा जा रहा है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भरोसा दिलाया है कि यह समझौता पारस्परिक रूप से लाभकारी होगा और भारत अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा।
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भारत के निर्यात आंकड़े
भारत का निर्यात पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ रहा है। जनवरी-नवंबर 2025 के दौरान अमेरिका को भारत का निर्यात 73.76 अरब डॉलर से बढ़कर 85.51 अरब डॉलर हो गया, यानी 16% की वृद्धि। वहीं, चीन को भारत का निर्यात भी 15% बढ़कर 16.03 अरब डॉलर हुआ।
हालांकि दिसंबर 2025 में भारत का अमेरिका को निर्यात सालाना आधार पर 1.8% घटकर 6.88 अरब डॉलर रह गया। इसके विपरीत, चीन को अमेरिका का निर्यात 67% बढ़कर 2.04 अरब डॉलर हुआ। इन आंकड़ों से पता चलता है कि वैश्विक व्यापार में अस्थिरता के बावजूद भारत ने अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी-चीन व्यापारिक तनाव और अमेरिका-ईयू टैरिफ युद्ध ने भारत को वैश्विक स्थिरता का प्रतीक बना दिया है। कई यूरोपीय कंपनियां अब भारत के साथ लंबी अवधि के व्यापारिक समझौते करने के लिए उत्सुक हैं।
FTA के अंतिम चरण में भारत-ईयू वार्ता
भारत और यूरोपीय संघ 27 जनवरी 2026 को प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिए शिखर सम्मेलन आयोजित करेंगे। इस दौरान वार्ता के अंतिम चरण में पहुंचने की संभावना है और समझौते के समापन की घोषणा की उम्मीद है। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन 25 से 27 जनवरी तक भारत के दौरे पर रहेंगे।
इस दौरे के दौरान दोनों नेता 26 जनवरी को दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि भी होंगे। यह अवसर भारत-ईयू संबंधों को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।
भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका-ईयू टैरिफ युद्ध ने वैश्विक व्यापार में अस्थिरता बढ़ाई है, लेकिन भारत जैसे स्थिर साझेदार के लिए अवसर पैदा किए हैं। अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव के बावजूद भारत ने निर्यात बढ़ाकर वैश्विक आर्थिक महत्व बनाए रखा है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स (FIEO) के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा, “अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच टैरिफ युद्ध शुरू होने पर अन्य देशों के व्यापार को लाभ मिलेगा, और भारत इसके लिए तैयार है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने अपनी नीतियों और स्थिर व्यापारिक माहौल के कारण यूरोप के लिए भरोसेमंद विकल्प बनकर वैश्विक व्यापारिक अवसरों का अधिकतम लाभ उठाने का मौका पा लिया है।
निष्कर्ष
US -EU टैरिफ विवाद और ग्रीनलैंड को लेकर खींचतान ने भारत को वैश्विक व्यापार का नया अवसर प्रदान किया है। भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता (FTA) के अंतिम चरण में होने से न केवल भारत के निर्यात में वृद्धि होगी, बल्कि यूरोपीय देशों के साथ स्थिर और दीर्घकालिक व्यापारिक संबंध भी मजबूत होंगे।
इस स्थिति में भारत का स्थिर और भरोसेमंद व्यापारिक विकल्प होना उसे वैश्विक आर्थिक मंच पर और सशक्त बनाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत का निर्यात और वैश्विक व्यापारिक प्रभाव और बढ़ सकता है।
