Ujjain-Jaora ग्रीनफील्ड फोरलेन: हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित
संवाददाता : प्रमोद कुमार जैन
नागदा। Ujjain-Jaora ग्रीनफील्ड फोरलेन सड़क परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों द्वारा दायर तीन याचिकाओं पर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। जस्टिस संदीप एन. भट्ट की कोर्ट में करीब 20 मिनट तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अब किसानों और सरकार दोनों की निगाहें हाईकोर्ट के निर्णय पर टिकी हुई हैं। मामला जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में नियमों के पालन और किसानों की आपत्तियों पर उचित सुनवाई से जुड़ा है।
यह ग्रीनफील्ड कॉरिडोर परियोजना उज्जैन से जावरा के बीच प्रस्तावित है। राज्य सरकार की ओर से इसे वर्ष 2028 में उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण परियोजना बताया जा रहा है। परियोजना के तहत कई गांवों की जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है। उज्जैन जिले के सोडंग सहित आसपास के अन्य गांवों के किसान इस कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी प्रावधानों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया।
कलेक्टर के अधिकार को लेकर उठाया सवाल
किसानों की ओर से हाईकोर्ट में पैरवी कर रहे अभिभाषक विशाल चौहान के अनुसार, जमीन अधिग्रहण से जुड़ी कार्रवाई में सबसे महत्वपूर्ण आपत्ति यह है कि दावे और आपत्तियों की सुनवाई निर्धारित अधिकारी द्वारा नहीं की गई। किसानों का कहना है कि नियमों के अनुसार इस प्रक्रिया में आपत्तियों की सुनवाई कलेक्टर के स्तर पर होना आवश्यक थी, लेकिन मामले में सुनवाई एसडीओ द्वारा की गई और अंतिम आदेश कलेक्टर की ओर से पारित किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि इस तरह की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। किसानों का कहना है कि अधिग्रहण जैसी गंभीर कार्रवाई में संबंधित भू-स्वामियों को अपनी आपत्तियां रखने और उन पर सक्षम अधिकारी द्वारा न्यायोचित निर्णय पाने का अधिकार है। यदि यह प्रक्रिया ही निर्धारित नियमों के अनुसार नहीं अपनाई गई है तो अधिग्रहण की कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसानों की ओर से अदालत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों के साथ-साथ जमीन अधिग्रहण से संबंधित कानूनी प्रावधानों का भी हवाला दिया गया। उनका तर्क था कि दावे-आपत्तियों की सुनवाई और उन पर निर्णय लेने का अधिकार जिस अधिकारी को कानून ने दिया है, उसी अधिकारी द्वारा उसका पालन किया जाना चाहिए। किसी अन्य अधिकारी द्वारा सुनवाई किए जाने की स्थिति में पूरी प्रक्रिया पर कानूनी सवाल खड़े हो सकते हैं।
किसानों ने सड़क का वैकल्पिक रास्ता सुझाया
जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों की दूसरी प्रमुख आपत्ति प्रस्तावित सड़क के मार्ग को लेकर है। किसानों का कहना है कि जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है, उनके पास से पहले से ही सरकारी सड़क मौजूद है। यदि प्रस्तावित ग्रीनफील्ड सड़क के मार्ग में मामूली बदलाव किया जाए और उसे मौजूदा सरकारी सड़क की दिशा से जोड़ा जाए तो किसानों की निजी जमीनों के अधिग्रहण की आवश्यकता काफी हद तक समाप्त हो सकती है।
किसानों का आरोप है कि उन्होंने अपनी आपत्तियों के दौरान इस वैकल्पिक मार्ग का सुझाव भी दिया था, लेकिन उनकी आपत्ति पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। उनका कहना है कि यदि सरकारी जमीन या पहले से मौजूद सड़क का उपयोग करके परियोजना का मार्ग निर्धारित किया जा सकता है तो निजी कृषि भूमि का अधिग्रहण क्यों किया जा रहा है, इस सवाल का जवाब संबंधित अधिकारियों से मिलना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह भी कहा गया कि किसानों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर न तो उचित सुनवाई की गई और न ही उनके सुझावों को स्वीकार या अस्वीकार करने के संबंध में कोई स्पष्ट और न्यायोचित आदेश पारित किया गया। ऐसे में किसानों ने अधिग्रहण की कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
सरकार ने याचिकाओं को बताया औचित्यहीन
मंगलवार को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने किसानों की याचिकाओं का विरोध किया। सरकार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि यह परियोजना वर्ष 2028 में होने वाले सिंहस्थ को ध्यान में रखते हुए तैयार की जा रही है। उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों में सिंहस्थ के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए बेहतर और तेज सड़क संपर्क आवश्यक है।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि उज्जैन-जावरा ग्रीनफील्ड कॉरिडोर एक बड़ा सार्वजनिक महत्व का प्रोजेक्ट है। ऐसी परियोजनाओं को बार-बार कानूनी अड़चनों में उलझाने से इनके क्रियान्वयन में देरी हो सकती है। सरकार ने अदालत से याचिकाओं को औचित्यहीन मानते हुए खारिज करने का आग्रह किया।
सरकार का पक्ष था कि परियोजना व्यापक जनहित में है और इसका उद्देश्य केवल किसी एक क्षेत्र या वर्ग को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि उज्जैन तथा आसपास के क्षेत्रों में सड़क संपर्क को बेहतर बनाना है। सिंहस्थ जैसे बड़े धार्मिक आयोजन के मद्देनजर इस सड़क को महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना के रूप में देखा जा रहा है।
किसानों की ओर से कानूनी प्रावधानों पर जोर
सरकार की दलीलों के जवाब में किसानों की ओर से कहा गया कि जनहित की परियोजना होने मात्र से जमीन अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसानों की ओर से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के विभिन्न आदेशों का हवाला देते हुए कहा गया कि विकास परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण करते समय भी प्रभावित भू-स्वामियों को कानून में दिए गए अधिकारों का संरक्षण मिलना जरूरी है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि किसानों द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियों की सुनवाई सक्षम अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए थी। इसके अलावा, यदि किसी किसान ने अधिग्रहण के बजाय वैकल्पिक मार्ग का सुझाव दिया है तो उस पर विचार करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। केवल औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कर लेना पर्याप्त नहीं है; उस पर कारणयुक्त और न्यायोचित आदेश पारित किया जाना आवश्यक है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत के आदेश के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि जमीन अधिग्रहण की वर्तमान कार्रवाई जारी रहेगी या किसानों को राहत मिल सकती है।
कुछ क्षेत्रों में निर्माण कार्य शुरू
एक ओर जहां तीन गांवों से जुड़े किसानों की याचिकाओं पर हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर परियोजना के अन्य हिस्सों में निर्माण कार्य शुरू हो गया है। चौकी जुर्नादा क्षेत्र में प्रस्तावित सड़क के लिए बेस तैयार किए जाने की जानकारी सामने आई है। बारिश के कारण फिलहाल निर्माण कार्य की गति प्रभावित है, लेकिन मौसम साफ होते ही यहां काम में तेजी आने की संभावना है।
परियोजना के निर्माण कार्य शुरू होने के कारण प्रभावित किसानों की चिंता भी बढ़ गई है। उनका कहना है कि यदि अधिग्रहण को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है तो अंतिम निर्णय आने तक प्रभावित भूमि पर निर्माण गतिविधियों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। दूसरी ओर, परियोजना से जुड़े पक्षों का मानना है कि बड़े स्तर की सड़क परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए निर्माण गतिविधियों को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ाना जरूरी है।
चार गुना मुआवजे के दावे पर भी सवाल
जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों की एक और बड़ी शिकायत मुआवजे की राशि से संबंधित है। किसानों का कहना है कि सरकार की ओर से उन्हें अधिग्रहित जमीन के बदले चार गुना मुआवजा दिए जाने की घोषणा की गई थी, लेकिन वास्तविक भुगतान उन्हें केवल दोगुने मुआवजे के रूप में किया गया है।
मुआवजे की राशि को लेकर किसानों में असंतोष है। उनका कहना है कि खेती की जमीन केवल संपत्ति नहीं बल्कि उनकी आजीविका का आधार है। ऐसे में जमीन जाने के बाद उन्हें ऐसा मुआवजा मिलना चाहिए जिससे वे अपने भविष्य की आर्थिक जरूरतों को पूरा कर सकें। किसानों का यह भी कहना है कि सड़क परियोजना का लाभ आम जनता को मिलेगा, लेकिन उसकी कीमत प्रभावित किसानों को अपनी जमीन देकर चुकानी पड़ रही है।
अब किसानों की उम्मीद हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हुई है। अदालत के समक्ष मुख्य रूप से यह सवाल है कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी नियमों का पालन हुआ या नहीं और किसानों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर सक्षम स्तर पर उचित सुनवाई की गई या नहीं। साथ ही, परियोजना के व्यापक जनहित और सिंहस्थ की तैयारियों से जुड़े सरकार के तर्क भी अदालत के समक्ष रखे गए हैं।
हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद ही उज्जैन-जावरा ग्रीनफील्ड फोरलेन परियोजना के प्रभावित किसानों और प्रशासन के बीच चल रहे विवाद की दिशा स्पष्ट होगी। फिलहाल निर्माण कार्य कुछ क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है, जबकि तीन गांवों के किसानों से जुड़े मामले में न्यायालय का निर्णय आना बाकी है। ऐसे में अदालत का आगामी आदेश परियोजना की जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया के साथ-साथ प्रभावित किसानों के अधिकारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
