‘अमेरिका फर्स्ट’ या ‘अमेरिका अकेला’? एक खतरनाक नीति
हार्वर्ड कैनेडी स्कूल में एक कार्यक्रम के दौरान दिए गए अपने बयान में, जीना रायमोंडो ने ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर सीधा हमला बोला। उन्होंने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति को वास्तव में ‘अमेरिका अलोन’ (America Alone) यानी ‘अकेला अमेरिका’ की नीति करार दिया। उनका तर्क है कि यह नीति अमेरिका को उसके सबसे करीबी सहयोगियों और मित्र राष्ट्रों से अलग-थलग कर रही है।
रायमोंडो ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम भारत के मामले में बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने हमारे सभी सहयोगियों को नाराज कर दिया है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ एक बात है, लेकिन ‘अमेरिका अलोन’ बेहद खतरनाक नीति है।” यह बयान केवल एक आलोचना नहीं, बल्कि अमेरिकी विदेश नीति के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
क्यों महत्वपूर्ण हैं भारत-अमेरिका संबंध?
भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी पिछले कुछ दशकों में लगातार मजबूत हुई है। भारत न केवल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में भी इसकी एक अहम भूमिका है। दोनों देश व्यापार, रक्षा, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में मजबूत सहयोग करते आए हैं।
ऐसे में, अमेरिका द्वारा भारत जैसे रणनीतिक साझेदार के साथ तनाव बढ़ाना, अमेरिकी हितों के लिए भी हानिकारक हो सकता है। रायमोंडो के अनुसार, ट्रंप की नीतियों से अमेरिका का वैश्विक प्रभाव घट रहा है और यह देश को कमजोर बना रहा है।
सहयोगियों को नाराज करने का जोखिम
रायमोंडो ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी कमजोरी उसके अपने सहयोगियों से बिगड़ते संबंध हैं। उन्होंने कहा, “ट्रंप प्रशासन की जिन 20 सबसे बड़ी आलोचनाओं में, मैं सबसे ऊपर जिसे रखती हूं, वो एक है हमारे सभी सहयोगियों को नाराज करना। जो अमेरिका, यूरोप और जापान का अच्छा दोस्त या साझेदार नहीं है, वह एक कमजोर अमेरिका है।”
यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक मामलों में अमेरिका की ताकत उसके गठबंधनों और सहयोगियों के नेटवर्क में निहित है। जब ये गठबंधन कमजोर होते हैं, तो अमेरिका की वैश्विक स्थिति पर सीधा असर पड़ता है।
चीन का बढ़ता प्रभाव और अमेरिका की निष्क्रियता
पूर्व वाणिज्य सचिव ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया – चीन का बढ़ता वैश्विक प्रभाव। उन्होंने चेतावनी दी कि जब अमेरिका अपने सहयोगियों से दूरी बना रहा है, तब चीन सक्रिय रूप से दुनिया भर में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
रायमोंडो ने कहा, “चीन यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और साउथ-ईस्ट एशिया में एक्टिव है, जबकि हम अपने ही सहयोगियों से दूर जा रहे हैं.” यह बात अमेरिकी विदेश नीति के लिए एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करती है। अमेरिका के पीछे हटने से उत्पन्न होने वाली शक्ति का शून्य चीन तेजी से भर रहा है, जो दीर्घकाल में अमेरिकी हितों के लिए ठीक नहीं है।
‘सब कुछ अमेरिका में बनाओ’ – क्या यह यथार्थवादी है?
ट्रंप प्रशासन के ‘सब कुछ अमेरिका में ही बनाओ’ के विचार का भी रायमोंडो ने जोरदार विरोध किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में इतनी मजदूर शक्ति नहीं है कि देश की सारी जरूरतों का उत्पादन वहीं किया जा सके। आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था अंतर्संबंधित आपूर्ति श्रृंखलाओं पर चलती है, और इससे अलग होना व्यावहारिक नहीं है।
उनके अनुसार, अमेरिका की असली ताकत उसकी नवाचार क्षमता और वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करने में निहित है, न कि खुद को अलग-थलग करने में। भारत जैसे देशों के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्ते अमेरिकी व्यवसायों और अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार तनाव: वर्तमान संदर्भ
जीना रायमोंडो का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ा है। हाल के महीनों में डिजिटल कर (डिजिटल सर्विस टैक्स), मेडिकल डिवाइस की कीमतों और व्यापार घाटे जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आए हैं।
ऐसे में, रायमोंडो की चेतावनी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि ट्रंप प्रशासन भारत के साथ व्यापार युद्ध जैसी स्थिति पैदा करता है, तो इसके दूरगामी नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं। न केवल अमेरिकी कंपनियों को भारत जैसे बड़े बाजार में नुकसान उठाना पड़ेगा, बल्कि इससे चीन को रणनीतिक फायदा मिल सकता है।
निष्कर्ष: सहयोग ही एकमात्र रास्ता
अमेरिका की पूर्व वाणिज्य सचिव जीना रायमोंडो के बयान से स्पष्ट संदेश मिलता है कि वैश्विक मामलों में एकतरफावाद और संरक्षणवाद का रास्ता खतरनाक है। भारत के साथ संबंधों को मजबूत करना अमेरिका के रणनीतिक और आर्थिक हित में है।
उन्होंने अमेरिकी कूटनीति में नए सिरे से बदलाव की अपील करते हुए कहा, “मुझे नहीं लगता कि यूरोप या साउथ-ईस्ट एशिया के ज्यादातर हिस्सों के साथ मजबूत रिश्तों के बिना हम प्रभावी हो सकते हैं. मेरी इच्छा है कि यूरोप के साथ हमारे व्यापारिक रिश्ते और भी मजबूत हों. मुझे लगता है कि हम भारत के साथ एक बड़ी गलती कर रहे हैं.”
एक बात स्पष्ट है कि आज की जटिल वैश्विक चुनौतियों, खासकर चीन के उदय का मुकाबला करने के लिए, अमेरिका को भारत जैसे लोकतांत्रिक सहयोगियों के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। ‘अमेरिका अलोन’ की नीति न केवल अमेरिका को अकेला करेगी, बल्कि दुनिया भर में उसके प्रभाव को भी कमजोर करेगी। भारत के प्रति ट्रंप प्रशासन का वर्तमान रुख अमेरिकी हितों के लिए एक स्व-घाती कदम साबित हो सकता है।

