ट्रंप की एक चाल से कांप उठा Pakistan, क्या ईरान युद्ध खोलेगा टूटने का रास्ता?
ईरान पर अमेरिका के संभावित सैन्य हमले की चर्चाओं के बीच Pakistan में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सक्रिय होते ही ईरान को लेकर उनकी आक्रामक रणनीति ने पूरे पश्चिम एशिया के साथ-साथ दक्षिण एशिया में भी हलचल तेज कर दी है। इस स्थिति में Pakistan सबसे ज्यादा असहज नजर आ रहा है। सवाल उठता है कि आखिर ईरान पर हमले की आशंका से Pakistan इतना डरा हुआ क्यों है और क्या उसे अपने टूटने का खतरा सता रहा है?
ईरान-Pakistan की जटिल रिश्तेदारी
ईरान और Pakistan के संबंध केवल पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धार्मिक, जातीय और सामरिक स्तर पर भी बेहद संवेदनशील हैं। Pakistan में एक बड़ी शिया आबादी रहती है, जो ईरान को धार्मिक रूप से अपना संरक्षक मानती है। यदि अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो इसका सीधा असर Pakistan के भीतर सांप्रदायिक संतुलन पर पड़ सकता है। शिया-सुन्नी तनाव बढ़ने की आशंका से पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान पहले से ही चिंतित है।
बलूचिस्तान: Pakistan की सबसे कमजोर कड़ी
Pakistan की चिंता का सबसे बड़ा कारण उसका अशांत बलूचिस्तान प्रांत है। ईरान और Pakistan दोनों ही देशों में बलूच समुदाय फैला हुआ है। यदि ईरान पर हमला होता है और वहां अस्थिरता बढ़ती है, तो इसका प्रभाव सीमा पार बलूच क्षेत्रों तक पहुंचेगा। Pakistan पहले से ही बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन, आतंकी गतिविधियों और सैन्य संघर्षों से जूझ रहा है। ऐसे में ईरान संकट इस आग में घी डाल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान कमजोर होता है या वहां गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो बलूच राष्ट्रवाद को नई ऊर्जा मिल सकती है, जिससे Pakistan के क्षेत्रीय विघटन का खतरा बढ़ जाएगा।
अमेरिका के दबाव में फंसा पाकिस्तान
पाकिस्तान की विदेश नीति लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच झूलती रही है। एक ओर वह आर्थिक मदद और सैन्य सहयोग के लिए अमेरिका पर निर्भर है, तो दूसरी ओर चीन के साथ CPEC जैसे बड़े प्रोजेक्ट में बंधा हुआ है। ईरान पर संभावित अमेरिकी हमले के मामले में पाकिस्तान खुलकर किसी का पक्ष नहीं ले पा रहा। यदि Pakistan अमेरिका का समर्थन करता है, तो ईरान नाराज हो सकता है, जिससे सीमा सुरक्षा और ऊर्जा परियोजनाओं पर असर पड़ेगा। वहीं, अगर वह ईरान के पक्ष में खड़ा होता है, तो अमेरिका की नाराजगी उसे आर्थिक और कूटनीतिक रूप से महंगी पड़ सकती है।
आंतरिक अस्थिरता और आर्थिक संकट
पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। ऐसे समय में किसी भी क्षेत्रीय युद्ध का असर उसकी कमजोर अर्थव्यवस्था पर सीधा पड़ेगा। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, व्यापार मार्गों में रुकावट और विदेशी निवेश का पलायन पाकिस्तान को और गहरे संकट में धकेल सकता है। इसके अलावा, यदि ईरान-अमेरिका संघर्ष बढ़ता है, तो पाकिस्तान में शरणार्थियों की नई लहर आ सकती है, जैसा अफगानिस्तान के मामले में हुआ था। यह स्थिति पहले से कमजोर प्रशासनिक ढांचे पर अतिरिक्त बोझ डालेगी।
सेना और सत्ता प्रतिष्ठान की चिंता
पाकिस्तान सेना हमेशा से देश की एकता की गारंटर बनने का दावा करती रही है, लेकिन मौजूदा हालात में सेना भी दबाव में है। एक तरफ आतंकवाद विरोधी अभियानों का बोझ है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दखल और जन असंतोष। ईरान पर हमला होने की स्थिति में सीमा सुरक्षा और आंतरिक कानून-व्यवस्था को संभालना सेना के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय तक चला कोई क्षेत्रीय संघर्ष पाकिस्तान की सैन्य और आर्थिक क्षमता को कमजोर कर सकता है, जिससे देश के भीतर अलगाववादी ताकतें और मजबूत होंगी।
क्या Pakistan के टूटने का है खतरा?
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान तत्काल टूट जाएगा, लेकिन ईरान संकट ने उसकी कमजोर नसों को जरूर उजागर कर दिया है। बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध जैसे क्षेत्रों में पहले से मौजूद असंतोष अगर बाहरी घटनाओं से और भड़कता है, तो पाकिस्तान की एकता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। पाकिस्तान इस समय एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां एक गलत कूटनीतिक कदम उसे अंदर से हिला सकता है। ट्रंप के ईरान अटैक प्लान ने पाकिस्तान को यह एहसास दिला दिया है कि क्षेत्रीय युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि देशों के भीतर भी तबाही मचाते हैं।
