ईरान से तेल कारोबार पर अमेरिका का बड़ा एक्शन, भारत स्थित 4 कंपनियों पर प्रतिबंध; जानिए क्या हैं आरोप
ट्रंप प्रशासन ने ईरानी पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों से जुड़े कथित लेनदेन को लेकर भारत स्थित चार कंपनियों को प्रतिबंध सूची में डाला, भारतीय नागरिक भी कार्रवाई के दायरे में
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत से जुड़ी कुछ कंपनियों पर भी दिखाई दे रहा है। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल कारोबार से कथित तौर पर जुड़े लेनदेन को लेकर भारत स्थित चार कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। अमेरिका का आरोप है कि ये कंपनियां ईरान से पेट्रोलियम या पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद, बिक्री, परिवहन अथवा मार्केटिंग से जुड़े महत्वपूर्ण लेनदेन में शामिल रही हैं।
अमेरिका की यह कार्रवाई ऐसे समय सामने आई है, जब वॉशिंगटन ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के उद्देश्य से ‘ऑपरेशन इकॉनमिक आउटकास्ट’ की घोषणा की है। इसके बाद ईरान से जुड़े कारोबार में शामिल विभिन्न संस्थाओं, व्यक्तियों और अन्य नेटवर्क पर कार्रवाई तेज की गई है।
भारत स्थित इन चार कंपनियों पर कार्रवाई
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में भारत स्थित पोर्टईज पार्टनर्स एलएलपी, सदाशिव ओवरसीज लिमिटेड, पीपी सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड और प्रकृतिस इन्फ्रा इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।
अमेरिकी पक्ष का आरोप है कि इन कंपनियों ने ईरान से जुड़े पेट्रोलियम या पेट्रोकेमिकल उत्पादों के लेनदेन में भूमिका निभाई। पोर्टईज पार्टनर्स एलएलपी को कस्टम ड्यूटी ब्रोकर बताया गया है। इसके साझेदार इंदरीसमिया अशरफमिया शेख और हरीश रामचंद्र रंगी भी कार्रवाई के दायरे में बताए गए हैं।
इसके अलावा पीपी सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक प्रशांत गर्ग पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक शेख, रंगी और गर्ग भारतीय नागरिक हैं।
करोड़ों डॉलर के पेट्रोलियम उत्पादों के आयात का दावा
रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया गया है कि सदाशिव ओवरसीज लिमिटेड ने लगभग 6.9 करोड़ डॉलर मूल्य के ईरानी मूल के पेट्रोलियम उत्पादों का आयात किया। वहीं पीपी सॉफ्टटेक और प्रकृतिस इन्फ्रा द्वारा लगभग 2.5-2.5 करोड़ डॉलर मूल्य के पेट्रोलियम उत्पादों के आयात का दावा किया गया है।
अमेरिका का कहना है कि ईरानी तेल और पेट्रोकेमिकल कारोबार से होने वाली आय को सीमित करना उसकी मौजूदा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी उद्देश्य से ऐसे कारोबारी नेटवर्क और संस्थाओं की पहचान की जा रही है, जिन पर ईरानी उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भूमिका निभाने का आरोप है।
हालांकि ये आरोप और प्रतिबंध अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई का हिस्सा हैं। संबंधित भारतीय कंपनियों या व्यक्तियों का विस्तृत पक्ष सामने आने पर स्थिति के अन्य पहलू भी स्पष्ट हो सकते हैं।
क्यों लगाया गया कंपनियों पर प्रतिबंध?
अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार प्रतिबंध उन संस्थाओं पर लगाए गए हैं, जिन पर ईरान से पेट्रोलियम या पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद, अधिग्रहण, बिक्री, परिवहन अथवा मार्केटिंग से जुड़े महत्वपूर्ण लेनदेन में जानबूझकर शामिल होने का आरोप है।
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट के मुताबिक ईरानी सरकार को आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने वाले कथित नेटवर्क के खिलाफ व्यापक स्तर पर कार्रवाई की जा रही है। इसके तहत केवल कंपनियां ही नहीं, बल्कि संबंधित व्यक्तियों और जहाजों को भी निशाना बनाया जा रहा है।
अमेरिका की कोशिश ईरान के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से होने वाली आमदनी को सीमित करने की है। खासकर तेल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र ईरान के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने के महत्वपूर्ण माध्यम माने जाते हैं।
‘ऑपरेशन इकॉनमिक आउटकास्ट’ के जरिए दबाव बढ़ाने की तैयारी
अमेरिकी प्रशासन ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए ‘ऑपरेशन इकॉनमिक आउटकास्ट’ नाम से अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इसका मकसद कथित रूप से उन वित्तीय और कारोबारी नेटवर्क को बाधित करना है, जिनके जरिए ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद आय हासिल करता है।
अमेरिका ने दूसरे देशों और कारोबारी संस्थाओं से भी ईरान के साथ आर्थिक संबंधों को लेकर सावधानी बरतने को कहा है। ट्रंप प्रशासन का संदेश है कि ईरान को प्रतिबंधों से बचने में सहायता करने वाली कंपनियों और व्यक्तियों को भी अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
इस कदम का असर अंतरराष्ट्रीय तेल कारोबार, शिपिंग, बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था से जुड़ी कंपनियों पर भी पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन ने सहयोगी देशों को भी दिया संदेश
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ आर्थिक कार्रवाई और कड़ी करने के संकेत दिए हैं। उनका कहना है कि तेल व्यापार, धन के हस्तांतरण या कथित मुखौटा कंपनियों के जरिए ईरान को प्रतिबंधों से बचने में सहायता करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
ट्रंप प्रशासन अपने सहयोगी देशों से भी ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की रणनीति में सहयोग चाहता है। इसी व्यापक नीति के तहत विभिन्न देशों में स्थित कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।
भारत स्थित चार कंपनियों पर हुई कार्रवाई को भी इसी अभियान से जोड़कर देखा जा रहा है।
ईरान ने भी दी कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी
अमेरिका के बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी अधिकारियों ने क्षेत्रीय देशों को चेतावनी दी है कि वे उसके खिलाफ अमेरिकी आर्थिक अभियान का हिस्सा न बनें।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल से जुड़े मोहसिन रजाए ने अमेरिका की संभावित कार्रवाई के जवाब में कड़े कदम उठाने की चेतावनी दी है। ईरानी पक्ष ने फारस की खाड़ी से गुजरने वाले समुद्री मार्गों को लेकर भी गंभीर बयान दिए हैं।
फारस की खाड़ी और उसके आसपास का समुद्री क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और समुद्री परिवहन पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मामला?
भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक देशों में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल आपूर्ति, प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में तनाव से जुड़े घटनाक्रम का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है। कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में तेज बदलाव होने पर आयात लागत, ईंधन बाजार और महंगाई जैसे आर्थिक संकेतकों पर प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है।
फिलहाल यह मामला भारत स्थित चार कंपनियों के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़ा है। आने वाले दिनों में संबंधित कंपनियों की प्रतिक्रिया, भारत सरकार का रुख और अमेरिकी प्रशासन की आगे की कार्रवाई इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी।
