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सच्ची श्रद्धा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं: साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब

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Published On: 27 August 2026
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सच्ची श्रद्धा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं: साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब

महिदपुर रोड। श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के लिए विराजित परम पूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब आदि ठाणा के सानिध्य में गुरुवार को धर्मसभा का आयोजन किया गया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर धर्मलाभ लिया। इस अवसर पर साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी ने श्रद्धा, आस्था, आत्मकल्याण और जीवन में क्रोध, मान, माया एवं लोभ जैसे कषायों के त्याग का महत्व बताते हुए कहा कि परमात्मा और धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखने पर जीवन में असंभव दिखाई देने वाले कार्य भी संभव हो सकते हैं।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य के भीतर दृढ़ इच्छा, विश्वास और सच्ची आस्था हो तो वह कठिन परिस्थितियों का सामना भी सकारात्मक भाव से कर सकता है। उन्होंने कहा कि जीवन में केवल धार्मिक क्रियाएं करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके पीछे सच्ची श्रद्धा और आत्मशुद्धि का भाव होना भी आवश्यक है।

जहां चाह होती है, वहां राह भी निकलती है

साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जहां चाह होती है, वहां राह होती है। मनुष्य जब दृढ़ संकल्प के साथ किसी अच्छे उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ता है और परमात्मा पर विश्वास रखता है तो कठिन से कठिन रास्ते भी आसान लगने लगते हैं।

उन्होंने प्रेरक अंदाज में कहा कि परमात्मा की कृपा और स्वयं के विश्वास से जीवन में दिखाई देने वाला “Impossible” भी “I’m Possible” में बदल सकता है। इसके लिए व्यक्ति को सबसे पहले अपने भीतर सकारात्मकता, संयम और धर्म के प्रति विश्वास पैदा करना चाहिए।

उनका कहना था कि श्रद्धा केवल शब्दों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जब श्रद्धा व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में दिखाई देने लगती है, तभी वह जीवन को सही दिशा प्रदान करती है।

बंजर भूमि की तरह मन को भी बनाना होगा उपजाऊ

धर्मसभा में साध्वीश्री ने एक उदाहरण के माध्यम से आत्मशुद्धि का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी बंजर भूमि में सीधे बीज डाल देने से अच्छी फसल की उम्मीद नहीं की जा सकती, उसी तरह मनुष्य के अंतर्मन को शुद्ध किए बिना आध्यात्मिक उन्नति की अपेक्षा करना भी कठिन है।

पहले भूमि को उपजाऊ बनाया जाता है, उसकी कमियों को दूर किया जाता है और उसके बाद उसमें बीज बोया जाता है। इसी प्रकार व्यक्ति को भी अपने भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इसके बाद ही धर्म और सद्गुणों के बीज जीवन में बेहतर तरीके से फलित हो सकते हैं।

क्रोध, मान, माया और लोभ के त्याग का दिया संदेश

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साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी ने जैन दर्शन में बताए गए चार प्रमुख कषायों—क्रोध, मान, माया और लोभ—का उल्लेख करते हुए इनके त्याग की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि ये कषाय व्यक्ति के आत्मिक विकास के मार्ग में बाधा बनते हैं।

क्रोध व्यक्ति की विवेकशीलता को प्रभावित करता है, मान अहंकार को बढ़ाता है, माया व्यक्ति को वास्तविकता और सरलता से दूर ले जाती है तथा लोभ इच्छाओं को लगातार बढ़ाता रहता है। इन चारों से स्वयं को मुक्त करने की दिशा में प्रयास करके ही व्यक्ति अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से अधिक सार्थक बना सकता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे अपने दैनिक जीवन में आत्मचिंतन करें और देखें कि उनके व्यवहार में क्रोध, अहंकार, छल या लालच जैसी प्रवृत्तियां कहां प्रभाव डाल रही हैं। इन पर नियंत्रण ही आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

सच्ची श्रद्धा को बताया आत्मकल्याण का आधार

साध्वीश्री ने कहा कि परमात्मा के प्रति सच्ची श्रद्धा, आस्था और विश्वास आत्मकल्याण की यात्रा का आधार हैं। जब तक व्यक्ति के भीतर वास्तविक श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती, तब तक आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त करना कठिन होता है।

उन्होंने शास्त्रीय भाव का उल्लेख करते हुए कहा, “श्रद्धा साची आवे, भव तीजे मोक्ष सीधावे।” इसके माध्यम से उन्होंने समझाया कि जैन दर्शन में सच्ची श्रद्धा को मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अपने भीतर परिवर्तन लाना है। मन, वचन और कर्म में शुद्धता लाने का प्रयास ही मनुष्य को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है।

चातुर्मास में धर्म आराधना का चल रहा क्रम

श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के दौरान लगातार विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब आदि ठाणा के सानिध्य में श्रद्धालुओं को धर्म, संयम, त्याग, तप, श्रद्धा और आत्मचिंतन से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन मिल रहा है।

चातुर्मास को जैन धर्म में विशेष साधना और आराधना का समय माना जाता है। इस अवधि में साधु-साध्वियां एक स्थान पर विराजित रहकर धर्मसभा, प्रवचन और विभिन्न धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से श्रावक-श्राविकाओं को धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

बोथरा, डूंगरवाल और रकां परिवार ने लिया लाभ

जैन समाज के मीडिया प्रभारी सचिन भंडारी ने जानकारी देते हुए बताया कि गत दिवस की धार्मिक भक्ति प्रभावना का लाभ राहुल कुमार-पारसमल बोथरा परिवार ने लिया। वहीं गुरुवार की धार्मिक भक्ति प्रभावना का लाभ राजेंद्र कुमार-मनोहर लाल डूंगरवाल परिवार द्वारा लिया गया।

उन्होंने बताया कि गत दिवस प्रभावना का लाभ प्रकाशचंद, रमेश कुमार और राहुल कुमार रकां परिवार, गडां वाले द्वारा लिया गया। धार्मिक आयोजन में परिवारों के साथ समाज के अन्य श्रद्धालुओं ने भी सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

विधायक दिनेश जैन सहित सकल जैन श्रीसंघ रहा उपस्थित

संपूर्ण मंगलमय आयोजन में सकल जैन श्रीसंघ के सदस्यों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। क्षेत्रीय विधायक एवं जैन समाज गौरव दिनेश जैन भी धर्मसभा में उपस्थित हुए और साध्वीश्री के दर्शन कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं ने साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब के प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुना। कार्यक्रम में श्रद्धा, आत्मशुद्धि और चार कषायों के त्याग के माध्यम से जीवन को बेहतर बनाने का संदेश प्रमुख रूप से सामने आया। चातुर्मास के चलते श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में धार्मिक वातावरण बना हुआ है और समाजजन नियमित रूप से विभिन्न आराधना एवं धर्मसभा कार्यक्रमों में सहभागिता कर रहे हैं।

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