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एक आचार्य, जिनके दर्शन ने 500 से अधिक आत्माओं को दीक्षा-पथ पर अग्रसर कर दिया

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Published On: 2 July 2026
एक आचार्य, जिनके दर्शन ने 500 से अधिक आत्माओं को दीक्षा-पथ पर अग्रसर कर दिया

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एक आचार्य, जिनके दर्शन ने 500 से अधिक आत्माओं को दीक्षा-पथ पर अग्रसर कर दिया
गणाचार्य विरागसागर समाधि दिवस पर विशेष आलेख

*(मनोज जैन नायक, मुरैना की कलम से)*
कुछ महापुरुष समय के साथ इतिहास नहीं बनते, बल्कि स्वयं एक युग बन जाते हैं। उनका जीवन केवल उनके अनुयायियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अमर स्रोत बन जाता है । तेजस्वी बालक अरविंद जैन ने 02 मई 1963 को मध्य प्रदेश के सागर जिले के नगर पथरिया में जन्म लेकर, यौवनावस्था में जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर एक अध्याय ही नहीं बल्कि एक युग का इतिहास रच दिया ।

दिगंबर जैन परंपरा में परम पूज्य आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज ऐसे ही युगप्रभावक आचार्य थे, जिन्होंने अपने तप, त्याग, चरित्र, साधना और विलक्षण आचार्यत्व से संपूर्ण बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि देश-विदेश में यह स्थापित कर दिया कि सच्चा मुनि आचार्य कैसा होता है।
उनका समाधि दिवस केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि उस महान विभूति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिवस है, जिसने हजारों आत्माओं के जीवन की दिशा बदल दी।

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आचार्य श्री का जीवन बचपन से ही विलक्षण था। अल्पायु में ही उन्होंने वैराग्य का मार्ग चुन लिया और मात्र *16 वर्ष 9 माह 18 दिन की आयु* में गृहत्याग कर मुनि दीक्षा धारण कर ली। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से आपने ब्रह्मचर्य व्रत स्वीकार कर संयम पथ पर चलने का दृढ़ संकल्प लिया। निमित्तज्ञानी आचार्यश्री विमलसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा लेने के पश्चात आपका सम्पूर्ण जीवन तप, त्याग, अध्ययन, स्वाध्याय, ध्यान और धर्मप्रभावना को समर्पित हो गया।
उन्होंने अपने जीवन में ऐसे-ऐसे कठोर तप किए, जो सामान्य व्यक्ति के लिए कल्पना से भी परे हैं।

अनेक दीर्घ उपवास, हजारों किलोमीटर का पदविहार, रस-परित्याग, निरंतर स्वाध्याय, ध्यान और आत्मसंयम—ये सब उनके जीवन की सहज दिनचर्या थे। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि संयम केवल ग्रंथों में पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन में जीने की साधना है।

आचार्य श्री की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल स्वयं साधना करने वाले संत नहीं थे, बल्कि दूसरों के भीतर भी वैराग्य की ज्योति जगा देते थे। उनके दर्शन, उनका जीवन और उनका आचरण ही उनका सबसे बड़ा प्रवचन था। यही कारण है कि उनकी प्रेरणा से *500* से अधिक व्रतियों ने संसार का त्याग कर *मुनि* एवं *आर्यिका* दीक्षा ग्रहण की। उनके करकमलों से *556* से अधिक दीक्षाएँ सम्पन्न हुईं, जिनमें *147* मुनि सहित बड़ी संख्या में *आर्यिकाएँ,* *ऐलक* और *क्षुल्लक* शामिल हैं। बुंदेलखंड के इतिहास में इतना विराट दीक्षा-प्रभाव शायद ही किसी अन्य आचार्य के जीवन में देखने को मिलता हो।

आचार्य श्री केवल संयम के प्रतीक ही नहीं थे, बल्कि समाज निर्माण के महान शिल्पी भी थे। उनकी प्रेरणा से *102* से अधिक *पंचकल्याणक* *प्रतिष्ठाएँ* , *250* से अधिक गजरथ-महामहोत्सव, अनेक जिनालय, गुरुकुल, छात्रावास और धार्मिक संस्थाओं का निर्माण एवं विस्तार हुआ। उन्होंने धर्म को केवल पूजा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे शिक्षा, संस्कार और सामाजिक जागरण से जोड़ दिया।

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उनकी विद्वत्ता भी अद्भुत थी। उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की, हजारों प्रवचन दिए और धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाया। उनका प्रत्येक प्रवचन आत्मा को जागृत करने वाला और जीवन को बदल देने वाला होता था। इसलिए उनके शिष्यों की संख्या केवल दीक्षित संतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लाखों श्रावक-श्राविकाएँ भी उनके विचारों से प्रभावित होकर धर्ममार्ग पर अग्रसर हुए।

आचार्य श्री का पदविहार भी अभूतपूर्व रहा। उन्होंने गाँव-गाँव, नगर-नगर पहुँचकर धर्म का दीप जलाया। जहाँ उनका विहार हुआ, वहाँ नई चेतना का संचार हुआ। उनके चातुर्मास केवल धार्मिक आयोजन नहीं होते थे, बल्कि संस्कार, अध्ययन और समाज जागरण के महाकुंभ बन जाते थे।

आज बुंदेलखंड में यदि संयम, वैराग्य और दीक्षा की सशक्त परंपरा दिखाई देती है, तो उसमें आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने अपने जीवन से यह प्रमाणित कर दिया कि सच्चा आचार्य वह है, जो स्वयं तप करे, समाज को दिशा दे और हजारों आत्माओं को मोक्षमार्ग पर अग्रसर कर दे।

04 जुलाई का यह पावन समाधि दिवस हम सभी के लिए केवल भाव-विभोर होने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी अवसर है। यदि हम उनके जीवन से त्याग, संयम, अनुशासन, स्वाध्याय, विनम्रता और धर्मनिष्ठा का एक भी गुण अपने जीवन में उतार सकें, तो वही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज आज भले ही शरीर से हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनका तप, त्याग, चरित्र, साहित्य, प्रेरणा और आध्यात्मिक तेज आज भी लाखों हृदयों में जीवित है। आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें सदैव बुंदेलखंड के उस युगपुरुष के रूप में स्मरण करेंगी, जिसने संपूर्ण विश्व को यह बता दिया कि “मुनि आचार्य होना क्या होता है।”

*सल्लेखना समाधि -*
04 जुलाई 2024 आषाढ कृष्ण 13, बुधवार वीर नि.सं. 2550, अक्षय मंगल कार्यालय, देवमुर्ती, जालना (महा.) में 33 पिच्छीयों की उपस्थिति में आपने सल्लेखना समाधि पूर्वक इस असार संसार के जन्म मृत्यु के चक्र को तोड़ते हुए इस नश्वर शरीर को त्यागते हुए मोक्ष मार्ग की ओर गमन किया ।
परम पूज्य गुरुदेव गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज को समाधि दिवस पर शत-शत श्रद्धासुमन।

*चरण सेवक*
मनोज जैन नायक (स्वतंत्र पत्रकार), मुरैना

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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