दौंड नगर।
Jain परोपकार सम्राट मोहनखेड़ा महातीर्थ विकास प्रेरक आचार्यप्रवर गुरुदेव श्रीमद्विजय ऋषभचंद्र सूरीश्वरजी महाराजा साहेब के आज्ञानुसार उनके शिष्य प्रवचनदक्ष मुनिप्रवर श्री रजत विजयजी म.साहेब की निश्रा में दौंड नगर में त्रिदिवसीय सुरिराजेंद्र गुरु सप्तमी महापर्व का भव्यतम महोत्सव संपन्न हुआ। यह आयोजन मुनि रजत की शिष्यवत् अनुशासन, भक्ति और संघ की समर्पित भागीदारी का अनुपम उदाहरण रहा।
तीन दिनों तक चले इस महोत्सव में भव्य वरघोड़ा निकाला गया, जिसमें सकल संघ के सदस्य सर पर साफा और गले में पचरंगी दुपट्टा पहनकर ड्रेस कोड का पालन करते हुए शामिल हुए। इस अनुशासन और एकरूपता को देखकर उपस्थित लोग अत्यंत प्रभावित हुए। महोत्सव के दौरान उपस्थित श्रद्धालु इस भव्य आयोजन का लाभ उठाकर आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति का अनुभव कर रहे थे।
मोहनखेड़ा गुरुधाम तीर्थ, दहाणु में चातुर्मास सफलतापूर्वक पूर्ण करने के बाद मुनिप्रवर श्री रजतचंद्र विजयजी बंधु बेलड़ी, आलंदी (पुणे) से दौंड नगर पहुंचे। वहां उन्होंने पौष दशमी अठ्ठम तपाराधना उत्सव में निश्रा ग्रहण किया। इसके बाद 21 दिसंबर को गुरु भगवंत का सामैया सह भव्यतम मंगल प्रवेश हुआ। इस अवसर पर पूरे नगर में आध्यात्मिक उत्साह और भक्ति भाव का वातावरण देखा गया।

3 दिन के प्रमुख कार्यक्रम
महोत्सव में उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए कई धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयोजन किए गए। इनमें विशेष रूप से शामिल थे:
- श्री स्नात्र पूजा – गुरु सप्तमी की भव्य परंपरा के अनुसार स्नात्र पूजा का आयोजन किया गया।
- श्री पार्श्वनाथ पंचकल्याणक पूजा – पंचकल्याणक पूजन के माध्यम से भक्तगण आध्यात्मिक लाभ अर्जित कर रहे थे।
- श्री राजेंद्र सूरी गुरुपद महापूजन – गुरुपूजा के माध्यम से गुरुभक्ति की भावना को प्रबल किया गया।
- संध्या भक्ति और भक्ति भावना – संध्या आरती और कीर्तन के माध्यम से श्रद्धालु भक्ति रस में डूबे।
- वरघोड़ा संध्या आरती एवं अंगरचना – भव्य वरघोड़ा निकाला गया और संध्या आरती के माध्यम से महोत्सव को भव्य और आध्यात्मिक रूप प्रदान किया गया।
तीनों दिन श्रद्धालु अनुशासन और भक्ति भाव के साथ कार्यक्रमों में शामिल रहे। संघ के सभी सदस्यों ने अपने ड्रेस कोड, साफा और पचरंगी दुपट्टा पहनकर महोत्सव में भाग लिया, जिससे महोत्सव की शोभा और अनुशासन अत्यंत आकर्षक प्रतीत हुआ।
धर्मसभा और मुनिप्रवर के प्रवचन
मुनिप्रवर श्री रजतचंद्र विजयजी ने धर्मसभा में दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी महाराजा साहेब के जीवन, तप और साधना पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि गुरुदेव ने ज्ञान साधना, तप साधना, योग साधना, आत्म साधना, नवकार साधना और क्रियोद्धार साधना के माध्यम से समाज और अनुयायियों को मार्गदर्शन दिया।
मुनिप्रवर ने कहा कि आज देश और विदेश में 1000 से अधिक गुरु मंदिर और देवकुलिकाएं स्थापित हैं। यह दर्शाता है कि सुरि राजेंद्र गुरुदेव का प्रभाव और योगदान कितने व्यापक और महान हैं। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालु मुनिप्रवर के प्रवचन से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने गुरु सप्तमी महोत्सव का लाभ उठाया।
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मोहनखेड़ा तीर्थ तिथि दर्शन पंचांग का विमोचन
महोत्सव के दौरान परोपकार सम्राट गुरुदेव श्री ऋषभचंद्र सूरीश्वरजी महाराजा साहेब द्वारा संपादित मोहनखेड़ा तीर्थ तिथि दर्शन पंचांग का विमोचन किया गया। यह पंचांग पिछले 35 वर्षों से निरंतर प्रकाशित हो रहा है और इसमें तिथियों, उत्सवों और धार्मिक अवसरों का विवरण श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध कराया जाता है।
विमोचन समारोह में श्रीसंघ के ट्रस्टी और अतिथियों ने भाग लिया। इसके बाद आयोजित सामूहिक आरती में श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर बोलियां बोलीं और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया। यह आरती न केवल भक्ति का प्रतीक बनी, बल्कि श्रद्धालुओं को संघ और गुरुभक्ति की महत्ता का अनुभव भी कराया।

शालीभद्र भंडारा का लाभ
परम गुरुभक्त शा. कुमारपाल भाई नेनमलजी सोलंकी ने शालीभद्र भंडारे का लाभ प्राप्त किया। इस अवसर पर विशेष वरघोड़ा निकाला गया और लाभार्थी के निवास पर स्थापना, प्रवचन और प्रभावना के कार्यक्रम आयोजित किए गए।
मुनिप्रवर श्री रजतचंद्र विजयजी के प्रथम नगर आगमन पर विभिन्न गुरुभक्त परिवारों के यहां गुरु भगवंत के पगलियाजी मांगलिक एवं प्रवचन का लाभ प्राप्त हुआ। प्रतिदिन प्रवचन का आयोजन जारी रहा और आसपास के गुरुभक्त परिवार लगातार गुरुदर्शन के लिए पधार रहे।
संघ और समुदाय की भागीदारी
संघ अध्यक्ष घीसुलालजी और संघ के अन्य महानुभाव भी इस आयोजन में शामिल होकर सतत आध्यात्मिक और सामाजिक लाभ प्राप्त कर रहे थे। महोत्सव के माध्यम से न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक संदेश फैलाए गए, बल्कि समुदाय में अनुशासन, एकता और भक्ति भावना को भी प्रोत्साहित किया गया।
श्रद्धालुओं ने गुरु सप्तमी महोत्सव के सभी कार्यक्रमों में गहन भागीदारी दिखाई और इसे अपने जीवन में आध्यात्मिक अनुशासन, भक्ति और समाज सेवा का प्रेरक अवसर माना।
महोत्सव का समग्र महत्व
त्रिदिवसीय गुरु सप्तमी महोत्सव ने दौंड नगर और आसपास के क्षेत्र में धार्मिक चेतना, भक्ति भावना और सामाजिक समरसता का अद्भुत संदेश दिया। यह महोत्सव मुनिप्रवर श्री रजतचंद्र विजयजी की शिष्यवत् निश्रा में आयोजित होकर गुरुभक्ति, संघ अनुशासन और समुदायिक एकता का उत्कृष्ट उदाहरण बन गया।
श्रद्धालुओं ने महोत्सव के माध्यम से न केवल अध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया, बल्कि गुरु भक्ति और सामाजिक सहयोग का संदेश भी ग्रहण किया। यह आयोजन यह दर्शाता है कि गुरु शिष्य परंपरा और संघ की समर्पित सेवा समाज में कितनी सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक प्रकाश फैलाती है।
महोत्सव के तीन दिनों में आयोजित प्रवचन, पूजा, भजन संध्या, वरघोड़ा और सामूहिक आरती ने सभी उपस्थित श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान किया। इस प्रकार यह महोत्सव दौंड नगर में भक्ति, अनुशासन और सामाजिक समरसता का अनूठा प्रतीक बन गया।

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