तेंदूखेड़ा पुलिस की FIR पर गंभीर सवाल, आरोपी की जाति गलत दर्ज करने का आरोप; पीड़ित ने SP से लगाई न्याय की गुहार
दैनिक स्वराज वाणी – कोमल अहिरवार (जिला ब्यूरो )
दमोह/तेंदूखेड़ा। तेंदूखेड़ा थाना क्षेत्र के ग्राम सांगा में हुए विवाद के बाद पुलिस द्वारा दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शिकायतकर्ता सुग्रीम अहिरवार ने पुलिस पर FIR लिखने में गंभीर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि विवाद में शामिल आरोपी कमोद यादव की जाति उनके द्वारा स्पष्ट रूप से बताए जाने के बावजूद पुलिस रिकॉर्ड में कथित तौर पर अलग-अलग जातियां दर्ज की गईं।
शिकायतकर्ता ने इस मामले को लेकर 1 सितंबर 2026 को दमोह पुलिस अधीक्षक के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत कर निष्पक्ष जांच और आवश्यक कार्रवाई की मांग की है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि FIR में आरोपी की जाति सही दर्ज नहीं होने के कारण अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत लागू होने वाली धाराओं को लेकर भी स्थिति प्रभावित हुई है। साथ ही उन्होंने मारपीट में हाथ की उंगली काटे जाने के आरोप के बावजूद गंभीर धाराएं नहीं लगाए जाने की बात कही है।
हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। पुलिस जांच और आधिकारिक स्तर पर मामले की समीक्षा के बाद ही पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
28 अगस्त की शाम किराना दुकान पर हुआ विवाद
शिकायतकर्ता सुग्रीम अहिरवार, निवासी ग्राम सांगा, के अनुसार उनकी गांव में एक छोटी किराना दुकान है, जिसे उनकी बेटी संभालती है। 28 अगस्त 2026 की शाम करीब 5 बजे गांव के निवासी कमोद यादव, कुद्दू गौड़ और साहब सिंह गौड़ कथित तौर पर उनकी दुकान पर उधार किराना सामान लेने पहुंचे।
शिकायत के मुताबिक, दुकान पर मौजूद सुग्रीम की बेटी ने उधार सामान देने से इनकार कर दिया। इसके बाद तीनों के बीच विवाद की स्थिति बन गई। सुग्रीम का आरोप है कि उनकी बेटी के साथ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए गाली-गलौज की गई और मारपीट का प्रयास किया गया।
शोर सुनकर सुग्रीम अपनी बेटी को बचाने के लिए मौके पर पहुंचे। उनका आरोप है कि इसके बाद तीनों आरोपियों ने उनके साथ भी कथित रूप से मारपीट की।
उंगली काटने का लगाया आरोप
सुग्रीम अहिरवार ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि विवाद के दौरान कमोद यादव ने उनके बाएं हाथ की एक उंगली को मुंह से काट लिया। इससे उन्हें चोट आई और उनका कहना है कि घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस को उचित धाराओं में मामला दर्ज करना चाहिए था।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि घटना की जानकारी पुलिस को देते समय उन्होंने आरोपियों की पहचान और जाति के संबंध में स्पष्ट जानकारी दी थी। इसके बावजूद FIR तैयार करते समय कमोद यादव की जाति कथित तौर पर अलग-अलग रूप में दर्ज की गई।
उन्होंने इसी कथित गलती को मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए पुलिस अधिकारियों से FIR की जांच और रिकॉर्ड की समीक्षा कराने की मांग की है।

FIR में जाति को लेकर उठे सवाल
शिकायतकर्ता का सबसे गंभीर आरोप FIR में आरोपी कमोद यादव की जाति के उल्लेख को लेकर है। उनका कहना है कि उन्होंने पुलिस को आरोपी की जाति यादव बताई थी, लेकिन रिपोर्ट में कहीं ‘गौड़’ तो कहीं ‘अहिरवार’ लिखे जाने की बात सामने आई।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इससे मामले की कानूनी धाराओं पर असर पड़ सकता है। विशेष रूप से उन्होंने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आवश्यक कार्रवाई किए जाने की मांग की है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि किसी भी आपराधिक प्रकरण में FIR में दर्ज तथ्यों की शुद्धता आगे की जांच और कानूनी कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में शिकायतकर्ता ने पुलिस प्रशासन से पूरे रिकॉर्ड की जांच कराने का अनुरोध किया है।
पुलिस अधिकारी की भूमिका पर भी उठाए सवाल
सुग्रीम अहिरवार ने अपनी शिकायत में केवल आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं की, बल्कि FIR दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारी की भूमिका की भी जांच की मांग की है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि पुलिस को घटना और आरोपियों से संबंधित सही जानकारी दी गई थी, तो FIR में कथित रूप से गलत विवरण कैसे दर्ज हुआ, इसकी जांच आवश्यक है। उन्होंने संबंधित अधिकारी की भूमिका की जांच कर दोष पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई किए जाने की मांग की है।
शिकायतकर्ता ने पुलिस अधीक्षक से यह भी आग्रह किया है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि पीड़ित पक्ष को न्याय मिल सके और भविष्य में FIR दर्ज करने में ऐसी कथित लापरवाही दोबारा न हो।
SC/ST Act के तहत धाराएं जोड़ने की मांग
शिकायतकर्ता ने पुलिस अधीक्षक को दिए आवेदन में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आवश्यक धाराएं जोड़े जाने की मांग की है। उनका कहना है कि विवाद के दौरान उनकी बेटी के साथ कथित जातिसूचक गाली-गलौज की गई और इसके बाद उनके साथ भी मारपीट हुई।
उन्होंने पुलिस से पूरे घटनाक्रम, उपलब्ध साक्ष्यों और आरोपों की जांच कर कानून के अनुसार धाराएं निर्धारित करने की मांग की है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी मामले में कौन-सी धाराएं लागू होंगी, यह पुलिस की जांच, उपलब्ध साक्ष्यों और मामले के तथ्यों के आधार पर तय किया जाता है। शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

गांव के विवाद ने लिया गंभीर रूप
ग्राम सांगा में किराना दुकान से शुरू हुआ विवाद अब पुलिस प्रशासन के स्तर तक पहुंच गया है। शुरुआत में यह मामला उधार सामान को लेकर हुए विवाद के रूप में सामने आया, लेकिन बाद में मारपीट, जातिसूचक टिप्पणी और चोट के आरोपों के चलते मामला गंभीर हो गया।
शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि FIR में तथ्यों को सही तरीके से दर्ज किया जाता और घटना से संबंधित सभी आवश्यक धाराएं लगाई जातीं, तो उन्हें न्याय की प्रक्रिया में अधिक भरोसा रहता। इसी कारण उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की है।
पुलिस अधीक्षक के निर्णय पर नजर
मामले में शिकायतकर्ता द्वारा पुलिस अधीक्षक को आवेदन दिए जाने के बाद अब आगामी कार्रवाई पर नजर बनी हुई है। शिकायतकर्ता ने FIR की जांच, आरोपी की जाति से संबंधित रिकॉर्ड की समीक्षा, चोट से जुड़ी धाराओं पर पुनर्विचार और संबंधित पुलिस अधिकारी की भूमिका की जांच की मांग की है।
यदि जांच में FIR दर्ज करने में किसी प्रकार की लापरवाही या तथ्यात्मक गलती सामने आती है, तो पुलिस प्रशासन द्वारा नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। वहीं यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है तो मामले में आवश्यक कानूनी धाराएं भी जोड़ी जा सकती हैं।
निष्पक्ष जांच की मांग
पीड़ित पक्ष का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान करना नहीं, बल्कि घटना के वास्तविक तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित कराना है। सुग्रीम अहिरवार ने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, मेडिकल दस्तावेजों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और FIR में दर्ज तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि पुलिस रिकॉर्ड में आरोपी की जाति या घटना से संबंधित कोई तथ्य गलत दर्ज हुआ है तो उसे नियमानुसार सुधारा जाना चाहिए।

अब जांच से साफ होगी तस्वीर
ग्राम सांगा का यह मामला फिलहाल पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायत के बाद जांच के चरण में है। शिकायतकर्ता ने पुलिस पर FIR लेखन में लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
अब देखना यह होगा कि दमोह पुलिस अधीक्षक शिकायत पर क्या कार्रवाई करते हैं और क्या FIR में दर्ज तथ्यों की दोबारा समीक्षा कराई जाती है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि घटना में लगाए गए मारपीट, जातिसूचक टिप्पणी और उंगली काटने के आरोपों की जांच में पुलिस को क्या तथ्य और साक्ष्य मिलते हैं।
मामले में निष्पक्ष और तथ्यपरक जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि FIR में कथित तौर पर जाति संबंधी विवरण कैसे दर्ज हुआ और घटना के संबंध में किन कानूनी धाराओं का प्रावधान लागू होता है।
