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	<title>Spiritual Welfare &#8211; Swaraj Vani</title>
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		<title>गुरु के मार्गदर्शन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है: आचार्यश्री उदारसागर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Palak Rajput]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Oct 2026 09:10:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गुरु के मार्गदर्शन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है: आचार्यश्री उदारसागर बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा; गुरु-विनय, समर्पण और ज्ञानाराधना के महत्व पर संतों ने दिए प्रवचन मुरैना ... <a title="गुरु के मार्गदर्शन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है: आचार्यश्री उदारसागर" class="read-more" href="https://swarajvani.com/acharya-udar-sagar-the-gurus-guidance-opens-the-path-to-spiritual/" aria-label="Read more about गुरु के मार्गदर्शन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है: आचार्यश्री उदारसागर">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1><strong>गुरु के मार्गदर्शन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है: आचार्यश्री उदारसागर</strong></h1>
<h2><strong>बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा; गुरु-विनय, समर्पण और ज्ञानाराधना के महत्व पर संतों ने दिए प्रवचन</strong></h2>
<p><strong>मुरैना (मनोज जैन नायक)।</strong> जैनाचार्य अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य ज्ञानरत्नाकर आचार्यश्री 108 उदारसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि गुरु के सान्निध्य में रहकर और उनके उपदेशों को जीवन में अपनाकर ही व्यक्ति आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है। गुरु के प्रति विनय और निस्वार्थ समर्पण आवश्यक है, क्योंकि विनय के बिना वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना कठिन है।</p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि गुरु शिष्य को हेय और उपादेय का विवेक कराते हैं। जीवन में क्या ग्रहण करना चाहिए, क्या छोड़ना चाहिए और कौन-सा कार्य उचित या अनुचित है, इसका बोध गुरु के मार्गदर्शन से मिलता है। गुरु केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि शिष्य के जीवन को सही दिशा दिखाने वाले आध्यात्मिक मार्गदर्शक होते हैं। उनके उपदेश सुनना ही पर्याप्त नहीं है; उन्हें आचरण में उतारना भी जरूरी है।</p>
<h3><strong>ज्ञानाराधना के तीन अंगों पर प्रकाश</strong></h3>
<p>प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने ज्ञानाराधना के महत्वपूर्ण अंगों—बहुमानाचार, उपधानाचार और अनिन्हवाचार—की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि बहुमानाचार का अर्थ देव, शास्त्र और गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और विनय का भाव रखना है। धार्मिक जीवन में पूजा-पाठ के साथ देव-शास्त्र-गुरु के प्रति सच्चा बहुमान भी आवश्यक है।</p>
<p>उपधानाचार के बारे में आचार्यश्री ने कहा कि शास्त्रों के अध्ययन के दौरान अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी वस्तु का त्याग करने का संकल्प लेना इसका अर्थ है। इस अभ्यास से ज्ञानार्जन के साथ त्याग, संयम और आत्मानुशासन की भावना विकसित होती है। ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में अनुशासन और साधना का भी अपना महत्व है।</p>
<p>अनिन्हवाचार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जिस गुरु से ज्ञान प्राप्त हुआ है, उनका नाम नहीं छिपाना चाहिए। गुरु के ज्ञानोपकार को स्वीकार करना, उनका नाम आदरपूर्वक लेना और उनके प्रति कृतज्ञ बने रहना प्रत्येक शिष्य का कर्तव्य है।</p>
<h3><strong>गुरु का सान्निध्य आध्यात्मिक उत्थान का आधार</strong></h3>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-367797 alignright" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/eeeeeeeeeeeeeeeeeeeee-300x123.gif" alt="eeeeeeeeeeeeeeeeeeeee" width="576" height="236" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/eeeeeeeeeeeeeeeeeeeee-300x123.gif 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/eeeeeeeeeeeeeeeeeeeee-1024x420.gif 1024w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/eeeeeeeeeeeeeeeeeeeee-768x315.gif 768w" sizes="(max-width: 576px) 100vw, 576px" /><span style="font-size: inherit;">मुनिश्री 108 उपशांतसागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में गुरु की महिमा बताते हुए कहा कि व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान की शुरुआत गुरु के मार्गदर्शन से होती है। गुरु अपने ज्ञान, अनुभव और उपदेशों के माध्यम से शिष्य को सही राह दिखाते हैं और उसे जीवन की वास्तविकता समझने की प्रेरणा देते हैं। गुरु के मार्गदर्शन के बिना आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना कठिन हो सकता है।</span></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि जीवन में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु सृजन, संरक्षण और परिवर्तन की प्रेरक शक्ति हैं। जैन धर्म में गुरु को पंचपरमेष्ठी में स्थान प्राप्त है, जो उनकी आध्यात्मिक महत्ता को दर्शाता है। गुरु का सान्निध्य तभी सार्थक होता है, जब शिष्य उनके प्रति विनय रखे, उपदेशों का सम्मान करे और बताए गए मार्ग पर चलने का प्रयास करे।</p>
<p>उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका प्रतिबिंब शिष्य के व्यवहार और आचरण में भी दिखाई देना चाहिए। सच्चा शिष्य वही है, जो गुरु से प्राप्त ज्ञान को जीवन में अपनाकर आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़े।</p>
<h3><strong>धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने लिया प्रवचनों का लाभ</strong></h3>
<p>दोनों संतों के प्रवचनों का सार रहा कि गुरु के प्रति विनय और निस्वार्थ समर्पण, देव-शास्त्र-गुरु का बहुमान तथा ज्ञान के साथ त्याग और संयम की भावना अपनाकर जीवन को धर्ममय बनाया जा सकता है। गुरु के मार्गदर्शन में प्राप्त ज्ञान को आचरण का हिस्सा बनाना आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।</p>
<p>धर्मसभा का संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। मंगलाचरण अरविंद जैन ने प्रस्तुत किया। चित्र अनावरण और दीप प्रज्वलन आकाश जैन (पोरसा वाले), आकाश जैन तथा अरविंद जैन (जैन बगीची) ने किया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने दोनों संतों के प्रवचनों का लाभ लिया और गुरु-भक्ति, विनय, ज्ञानाराधना तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त की।</p>
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