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	<title>Karma Theory &#8211; Swaraj Vani</title>
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		<title>परिवार संबंधों का ही नहीं, संस्कारों की पाठशाला है: आचार्यश्री उदारसागर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Palak Rajput]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 Oct 2026 13:10:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[परिवार संबंधों का ही नहीं, संस्कारों की पाठशाला है: आचार्यश्री उदारसागर मनोज जैन नायक &#124; मुरैना मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागरजी ... <a title="परिवार संबंधों का ही नहीं, संस्कारों की पाठशाला है: आचार्यश्री उदारसागर" class="read-more" href="https://swarajvani.com/is-the-first-school-of-values-says-acharya-udar-sagar/" aria-label="Read more about परिवार संबंधों का ही नहीं, संस्कारों की पाठशाला है: आचार्यश्री उदारसागर">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1><strong>परिवार संबंधों का ही नहीं, संस्कारों की पाठशाला है: आचार्यश्री उदारसागर</strong></h1>
<p><strong>मनोज जैन नायक | मुरैना</strong></p>
<p>मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने परिवार, संस्कार, कर्म सिद्धांत और आत्मचिंतन के महत्व पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि परिवार केवल संबंधों का समूह नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली पाठशाला है। व्यक्ति यहीं से प्रेम, सहयोग, अनुशासन, विनम्रता और सदाचार सीखता है। परिवार से प्राप्त संस्कार उसके व्यक्तित्व और व्यवहार को आकार देते हैं। इसलिए घर में अच्छे विचारों, परस्पर सम्मान और सद्भाव का वातावरण बनाए रखना जरूरी है।</p>
<p>आचार्यश्री अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्यश्री उदारसागरजी ने कहा कि जैन दर्शन में परिवार, संस्कार, सदाचार और कर्म सिद्धांत जीवन की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण आधार हैं। मनुष्य को अपने विचारों और आचरण की शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए। इच्छाओं पर नियंत्रण, आत्मचिंतन और परोपकार की भावना अपनाने से जीवन शांतिपूर्ण, संयमित और सार्थक बनता है।</p>
<h2><strong>कर्मों के प्रति स्वयं उत्तरदायी है व्यक्ति</strong></h2>
<p>कर्म सिद्धांत की व्याख्या करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि प्रत्येक जीव अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है। परिवारजन और मित्र सुख-दुख में साथ दे सकते हैं, लेकिन व्यक्ति को अपने कर्मों का फल स्वयं भोगना पड़ता है। इसलिए ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे आत्मा का अहित हो या दूसरे जीवों को कष्ट पहुंचे।</p>
<p>उन्होंने कहा कि शुभ भाव, सदाचार और धर्ममय आचरण आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। इसके विपरीत राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय व्यक्ति को अशांत करते हैं। मनुष्य को अपने व्यवहार और विचारों पर ध्यान देते हुए इन प्रवृत्तियों को कम करने का प्रयास करना चाहिए।</p>
<h2><strong>संयम और संतोष से मिलती है मानसिक शांति</strong></h2>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-366526 alignright" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/uyifyti-300x179.gif" alt="uyifyti" width="355" height="212" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/uyifyti-300x179.gif 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/uyifyti-1024x611.gif 1024w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/uyifyti-768x459.gif 768w" sizes="(max-width: 355px) 100vw, 355px" /><span style="font-size: inherit;">आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित होती हैं, जबकि इच्छाओं का विस्तार लगातार बढ़ता रहता है। जीवन के लिए जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति उचित है, लेकिन अनियंत्रित इच्छाएं असंतोष और मानसिक तनाव का कारण बन सकती हैं। जैन दर्शन अपरिग्रह और संयम की शिक्षा देता है। व्यक्ति को जरूरतों और इच्छाओं के बीच अंतर समझकर संग्रह की प्रवृत्ति कम करनी चाहिए और संतोष का भाव विकसित करना चाहिए।</span></p>
<p>उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख बाहरी साधनों की अधिकता में नहीं, बल्कि मन की शांति और आत्मिक संतुलन में है। जीवन में सही और गलत का निर्णय केवल आकर्षण या दूसरों की देखा-देखी में नहीं करना चाहिए। सम्यक ज्ञान और विवेक से ही व्यक्ति अपने हित-अहित को समझ सकता है। सही समझ विकसित होने पर व्यवहार में भी सकारात्मक बदलाव आता है। धर्म का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि जीवन में अहिंसा, सत्य, संयम और करुणा को अपनाना है।</p>
<h2><strong>आत्मचिंतन से शुरू होता है सुधार</strong></h2>
<p>धर्मसभा में मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने आत्मचिंतन, सदाचार और सकारात्मक दृष्टिकोण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने दोष पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों की कमियां देखने के बजाय अपने विचारों और आचरण का निरीक्षण करना आत्मसुधार की पहली सीढ़ी है। व्यक्ति जब अपने भीतर झांकता है, तभी उसे अपनी कमजोरियों और सुधार की संभावनाओं का बोध होता है।</p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि अज्ञान और मोह के कारण कई बार व्यक्ति अनुचित बातों को भी उचित मानने लगता है। सही ज्ञान से विवेक जागृत होता है और उचित-अनुचित के बीच अंतर समझ आता है। जीवन में वास्तविक परिवर्तन बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि भीतर उत्पन्न सही समझ और दृढ़ संकल्प से आता है। उन्होंने क्रोध, अहंकार और द्वेष जैसी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा दी।</p>
<h2><strong>सहयोग और सद्भाव से मजबूत होता है समाज</strong></h2>
<p><img decoding="async" class="wp-image-366525 alignright" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/hmnbm-300x156.gif" alt="hmnbm" width="362" height="188" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/hmnbm-300x156.gif 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/hmnbm-1024x534.gif 1024w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/10/hmnbm-768x400.gif 768w" sizes="(max-width: 362px) 100vw, 362px" /><span style="font-size: inherit;">मुनिश्री उपशांतसागरजी ने कहा कि समाज की उन्नति केवल व्यक्तिगत सफलता से संभव नहीं है। इसके लिए परस्पर सहयोग, सेवा, प्रेम और सद्भावना आवश्यक हैं। व्यक्ति जब स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के हित की भावना अपनाता है, तब परिवार और समाज में विश्वास तथा एकता मजबूत होती है। जैन धर्म की अहिंसा और अनेकांत की भावना दूसरों के विचारों को समझने, सहिष्णुता रखने और विवाद के स्थान पर संवाद को महत्व देने की प्रेरणा देती है।</span></p>
<p>उन्होंने कहा कि संस्कार सही दिशा देते हैं, कर्म जिम्मेदारी का बोध कराते हैं और संयम आत्मिक शांति की ओर ले जाता है। विचार निर्मल, आचरण शुद्ध और व्यवहार करुणामय रखने से व्यक्ति का जीवन सुखमय बनता है और वह परिवार तथा समाज के लिए भी कल्याणकारी सिद्ध होता है।</p>
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		<title>प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है, कण-कण स्वतंत्र है : आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज</title>
		<link>https://swarajvani.com/acharya-vishuddhasagar-ji-maharaj-spiritual-discourse-rishabh-vihar-delhi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Swaraj Vani Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Oct 2026 10:18:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[JAINS]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Vishuddhasagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Atma Swatantrata]]></category>
		<category><![CDATA[Dainik Swaraj Vani]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
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		<category><![CDATA[Jain Spiritual Discourse]]></category>
		<category><![CDATA[Karma Theory]]></category>
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		<category><![CDATA[Rishabh Vihar Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[Veetrag Bhav]]></category>
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					<description><![CDATA[नई दिल्ली के ऋषभ विहार में पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने आत्मा की स्वतंत्रता, कर्म बंधन और वीतराग भाव से मुक्ति का संदेश दिया। प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है, ... <a title="प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है, कण-कण स्वतंत्र है : आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज" class="read-more" href="https://swarajvani.com/acharya-vishuddhasagar-ji-maharaj-spiritual-discourse-rishabh-vihar-delhi/" aria-label="Read more about प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है, कण-कण स्वतंत्र है : आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली के ऋषभ विहार में पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने आत्मा की स्वतंत्रता, कर्म बंधन और वीतराग भाव से मुक्ति का संदेश दिया।</p>
<p>प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है, कण-कण स्वतंत्र है : पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव</p>
<p>दैनिक स्वराज वाणी</p>
<p>आत्मा चैतन्य है, कर्म जड़ है; जीव राग-मोह से बंधता है और वीतराग भाव से मुक्त होता है</p>
<p>रिपोर्ट : राजेश जैन दद्दू | नई दिल्ली</p>
<p>नई दिल्ली, 11 अक्टूबर 2026। दिल्ली के ऋषभ विहार में विराजित परम पूज्य पंचम पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आत्मा की स्वतंत्रता, कर्म बंधन और मोक्ष मार्ग पर गहन आध्यात्मिक प्रवचन दिया।</p>
<p>गुरुदेव ने कहा कि प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है। कण-कण स्वतंत्र है और अणु-अणु स्वतंत्र है। संसारी आत्मा कर्मों से बंधी होने के बावजूद अपने मूल स्वरूप में स्वतंत्र रहती है।</p>
<p>आत्मा चैतन्य है और कर्म जड़ : गुरुदेव</p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि आत्मा और कर्म दूध-पानी की तरह मिले हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन दोनों का अस्तित्व और स्वरूप अलग-अलग है। अनादिकाल से बंधे होने के बावजूद कर्म कभी आत्मा नहीं बना और न भविष्य में बनेगा। आत्मा कभी कर्मरूप परिणत नहीं होती। आत्मा चैतन्य है, जबकि कर्म जड़ है। आत्मा कभी जड़ नहीं होगी और जड़ कभी चेतन नहीं बनेगा।</p>
<p>राग-मोह से बंधन, वीतराग भाव से मुक्ति</p>
<p>गुरुदेव ने कर्म बंधन और मुक्ति का मार्ग समझाते हुए कहा कि जीव राग और मोह के वशीभूत होकर कर्मों का बंधन करता है, जबकि वीतराग भाव धारण करने से कर्मों से मुक्त होता है।</p>
<p>मानसिकता को व्यवस्थित करना आवश्यक</p>
<p>विश्व व्यवस्था पर चिंतन करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि संसार की व्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित है। राग और मोह से ग्रसित जीव अपने भावों को अव्यवस्थित करके जगत की व्यवस्था बदलना चाहता है, लेकिन ऐसा नहीं कर पाता। इसलिए मनुष्य को अपनी मानसिकता और भावों को व्यवस्थित करने की आवश्यकता है।</p>
<p>धर्मसभा में गुरुदेव ने आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने और वीतराग भाव की महत्ता पर प्रकाश डाला।</p>
<p>&nbsp;</p>
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