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	<title>Dewas Mata Tekri &#8211; Swaraj Vani</title>
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		<title>देवास की माता टेकरी: रक्तपीठ की मान्यता, करीब 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजती हैं बड़ी और छोटी माता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Palak Rajput]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Oct 2026 10:37:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Dewas]]></category>
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					<description><![CDATA[देवास की माता टेकरी: रक्तपीठ की मान्यता, करीब 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजती हैं बड़ी और छोटी माता देवास। मालवा क्षेत्र में इंदौर और उज्जैन के बीच स्थित देवास ... <a title="देवास की माता टेकरी: रक्तपीठ की मान्यता, करीब 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजती हैं बड़ी और छोटी माता" class="read-more" href="https://swarajvani.com/dewas-mata-tekri-a-sacred-hilltop-shrine-of-maa-tulja-bhawani-and-maa/" aria-label="Read more about देवास की माता टेकरी: रक्तपीठ की मान्यता, करीब 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजती हैं बड़ी और छोटी माता">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1><strong>देवास की माता टेकरी: रक्तपीठ की मान्यता, करीब 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजती हैं बड़ी और छोटी माता</strong></h1>
<p><strong>देवास।</strong> मालवा क्षेत्र में इंदौर और उज्जैन के बीच स्थित देवास अपनी माता टेकरी के लिए विशेष पहचान रखता है। करीब 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा के मंदिर हैं। श्रद्धालु मां तुलजा भवानी को बड़ी माता और मां चामुंडा को छोटी माता कहते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।</p>
<h2><strong>रक्त की बूंदें गिरने की लोकमान्यता</strong></h2>
<p>माता टेकरी को लेकर प्रचलित मान्यता है कि यहां माता सती के रक्त की बूंदें गिरी थीं, इसलिए इस स्थान को रक्तपीठ कहा जाता है। यह धार्मिक लोककथा है, जिसे श्रद्धालु पीढ़ियों से सुनते और मानते आए हैं। पहाड़ी पर दोनों देवियों के मंदिर होने के कारण इसे देवी-वास भी कहा जाता है। देवास नाम की उत्पत्ति को लेकर भी अलग-अलग मत प्रचलित हैं। एक मान्यता इसे ‘देव’ और ‘वास’ यानी देवताओं का निवास मानती है, जबकि एक अन्य मत के अनुसार शहर का नाम संस्थापक व्यापारी देवासा से जुड़ा हो सकता है।</p>
<h2><strong>दो रियासतों और कुलदेवियों से जुड़ा इतिहास</strong></h2>
<p>देवास की ऐतिहासिक पहचान भी विशिष्ट है। ब्रिटिश काल में यहां देवास सीनियर और देवास जूनियर नाम की दो रियासतें थीं, जिन पर पवार राजवंश की अलग-अलग शाखाओं का शासन था। स्थानीय परंपरा में तुलजा भवानी को होलकर वंश की कुलदेवी और चामुंडा माता को पवार वंश की कुलदेवी बताया जाता है। एक ही पहाड़ी पर दोनों देवियों के मंदिर होना इस धार्मिक स्थल को खास बनाता है।</p>
<p>माता टेकरी के मंदिरों की स्थापना का सटीक वर्ष उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में स्पष्ट नहीं है। इसलिए मंदिर को ढाई हजार साल पुराना बताने का दावा प्रमाणित तिथि के रूप में नहीं, बल्कि प्रचलित मान्यता या लोककथा के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। चामुंडा टेकरी और देवास की धार्मिक परंपरा का उल्लेख पुराने स्थानीय लेखन और पुस्तकों में मिलता है।</p>
<h2><strong>पहाड़ी पर मंदिर और दर्शन के रास्ते</strong></h2>
<p>टेकरी पर पहुंचने के लिए सीढ़ियों और सड़क मार्ग का उपयोग किया जा सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, मंदिर तक जाने के लिए 300 से अधिक सीढ़ियां हैं। पहाड़ी के चारों ओर परिक्रमा का रास्ता भी श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध है। देवास जिला प्रशासन की पर्यटन जानकारी में माता टेकरी के साथ रोपवे का भी उल्लेख है। चढ़ाई करने में असुविधा हो तो श्रद्धालु यात्रा से पहले स्थानीय स्तर पर रोपवे की उपलब्धता और संचालन की जानकारी ले सकते हैं।</p>
<p>पहाड़ी से देवास शहर का दृश्य दिखाई देता है। मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र नवरात्रि में विशेष रूप से सक्रिय रहता है। त्योहार के दिनों में भीड़ बढ़ने के कारण श्रद्धालु समय लेकर पहुंचें और प्रशासन की ओर से जारी व्यवस्था व निर्देशों का पालन करें।</p>
<h2><strong>इंदौर और उज्जैन से सड़क संपर्क</strong></h2>
<p>देवास सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा है। जिला प्रशासन के अनुसार, इंदौर से देवास की दूरी लगभग 35 किलोमीटर और उज्जैन से करीब 33 किलोमीटर है। निकटतम हवाई अड्डा इंदौर में है, जो देवास से लगभग 40 किलोमीटर दूर बताया गया है। शहर आगरा-मुंबई मार्ग से भी जुड़ा है। श्रद्धालु इंदौर या उज्जैन से सड़क मार्ग द्वारा देवास पहुंचकर माता टेकरी के दर्शन कर सकते हैं।</p>
<p>माता टेकरी देवास का प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल है। यहां की लोकमान्यताएं, दोनों देवियों के मंदिर और शहर का इतिहास इसे मालवा के श्रद्धालुओं के लिए खास बनाते हैं। मंदिर की प्राचीनता संबंधी दावों को लेकर प्रमाणित ऐतिहासिक जानकारी सीमित है, लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही आस्था के कारण टेकरी आज भी भक्तों के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।</p>
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