स्वच्छ भारत मिशन की उड़ी धज्जियां, आदिम जाति विभाग के बच्चे जंगल में शौच जाने को मजबूर
लवकुशनगर की देवीखेड़ा पंचायत में स्वच्छता व्यवस्था पर गंभीर सवाल
लवकुशनगर क्षेत्र की देवीखेड़ा पंचायत से स्वच्छ भारत मिशन के दावों और जमीनी हकीकत को लेकर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। आदिम जाति कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित संस्था में रह रहे बच्चों को शौच के लिए जंगल का सहारा लेना पड़ रहा है। बताया जा रहा है कि संस्था के शौचालय भर जाने के कारण बच्चों को खुले में शौच के लिए बाहर जाना पड़ रहा है।
यह स्थिति न केवल सरकारी स्वच्छता अभियानों के दावों पर सवाल खड़े करती है, बल्कि संस्था में रहने वाले बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करती है। जिन बच्चों की देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी संबंधित संस्था और विभाग की है, उन्हें यदि रोजाना शौच के लिए जंगल की ओर जाना पड़ रहा है, तो यह व्यवस्था की गंभीर लापरवाही का संकेत माना जा सकता है।
बोतल में पानी लेकर जंगल जाने को मजबूर बच्चे
जानकारी के अनुसार, संस्था में रहने वाले बच्चों को शौच के लिए जंगल की ओर जाना पड़ रहा है। बच्चे बोतल में पानी भरकर खुले में शौच के लिए बाहर जाने को मजबूर हैं। यह तस्वीर उस समय और भी चिंताजनक हो जाती है, जब सरकार गांव-गांव स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध कराने और खुले में शौच की समस्या को समाप्त करने के लिए लगातार अभियान चलाने का दावा करती है।
बच्चों के लिए शौचालय किसी सुविधा मात्र का हिस्सा नहीं, बल्कि उनकी बुनियादी आवश्यकता है। ऐसे में किसी आवासीय संस्था में रहने वाले बच्चों को पर्याप्त और उपयोग योग्य शौचालय उपलब्ध न होना कई सवाल खड़े करता है। यदि शौचालय मौजूद हैं, लेकिन उनकी नियमित सफाई नहीं होने के कारण उनका उपयोग नहीं किया जा सकता, तो सफाई व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रबंधक के जवाब से सामने आई व्यवस्था की स्थिति
बच्चों से उनकी परेशानी के संबंध में जानकारी ली गई तो उन्होंने बताया कि संस्था के प्रबंधक की ओर से कहा गया है कि शौचालय भर चुके हैं। इसी वजह से बच्चों को शौच के लिए बाहर जाना पड़ रहा है।
यदि यही स्थिति वास्तव में बनी हुई है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि शौचालयों की नियमित सफाई और रखरखाव की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। किसी भी आवासीय संस्था में शौचालयों की सफाई, पानी की उपलब्धता और स्वच्छता व्यवस्था की नियमित निगरानी आवश्यक होती है।
शौचालय भर जाने के बाद उन्हें साफ कराने की व्यवस्था करना कोई असाधारण काम नहीं है। इसके बावजूद यदि कई दिनों तक बच्चों को खुले में शौच के लिए जाना पड़े, तो यह प्रशासनिक उदासीनता और निगरानी की कमी की ओर इशारा करता है।
बरसात के मौसम में बढ़ी बच्चों की परेशानी
वर्तमान समय में बारिश का मौसम होने के कारण समस्या और गंभीर हो गई है। जंगल और आसपास के खुले क्षेत्रों में बारिश के बाद घास और झाड़ियां तेजी से बढ़ जाती हैं। ऐसे में बच्चों का अकेले या समूह में जंगल की ओर जाना उनकी सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के मौसम में जंगल और झाड़ियों वाले इलाकों में जहरीले जीव-जंतुओं और सांपों का खतरा भी बना रहता है। ऐसे में यदि किसी बच्चे को जंगल में शौच के दौरान कोई जहरीला जीव काट ले या किसी अन्य प्रकार की दुर्घटना हो जाए, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
बच्चों को ऐसी जोखिम भरी परिस्थितियों में भेजने के बजाय संस्था प्रबंधन को तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए। बच्चों की सुरक्षा किसी भी परिस्थिति में स्वच्छता व्यवस्था से अलग नहीं की जा सकती।
स्वच्छ भारत मिशन के दावों पर उठे सवाल
देशभर में स्वच्छ भारत मिशन के तहत खुले में शौच की समस्या समाप्त करने और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाए गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण और उनके उपयोग को लेकर भी लगातार जागरूकता कार्यक्रम किए जाते हैं।
लेकिन देवीखेड़ा पंचायत में सामने आया यह मामला इन अभियानों की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़ा करता है। एक तरफ खुले में शौच से मुक्ति की बात की जाती है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी विभाग के अंतर्गत संचालित संस्था में रहने वाले बच्चे ही खुले में शौच करने को मजबूर हैं।
यह स्थिति केवल एक संस्था की समस्या नहीं मानी जानी चाहिए। यदि किसी सरकारी संस्था में शौचालय उपलब्ध होने के बावजूद उनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, तो संबंधित विभाग को यह पता लगाने की जरूरत है कि समस्या कहां है और इसे दूर करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए।
बच्चों के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है असर
खुले में शौच करने से बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। गंदगी और अस्वच्छ वातावरण के कारण संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है। विशेष रूप से बच्चों के मामले में साफ-सफाई और स्वच्छ शौचालय की व्यवस्था बेहद जरूरी है।
आवासीय संस्था में रहने वाले बच्चों के लिए यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वे अपने दैनिक जीवन की मूलभूत सुविधाओं के लिए संस्था की व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं। यदि उन्हें शौचालय के लिए बाहर जाना पड़ रहा है, तो उन्हें न केवल स्वास्थ्य संबंधी बल्कि सुरक्षा से जुड़े जोखिमों का भी सामना करना पड़ रहा है।
इसलिए मामले को केवल सफाई की छोटी समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह बच्चों के अधिकार, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
सफाई और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी?
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि संस्था के शौचालयों की नियमित सफाई और रखरखाव की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यदि शौचालय भर गए हैं तो उन्हें समय पर खाली क्यों नहीं कराया गया? यदि सफाई के लिए कर्मचारी या संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, तो संबंधित विभाग को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई?
इसके अलावा यह भी जांच का विषय है कि संस्था में कितने शौचालय हैं, उनमें से कितने उपयोग योग्य हैं, पानी की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं और उनकी सफाई कितनी नियमित रूप से होती है।
यदि प्रबंधन के स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं यदि बजट, संसाधन या किसी अन्य प्रशासनिक कारण से समस्या उत्पन्न हुई है, तो विभाग को उसका तत्काल समाधान करना चाहिए।
स्थानीय लोगों ने भी जताई चिंता
स्थानीय लोगों का कहना है कि बच्चों के लिए पर्याप्त, सुरक्षित और साफ-सुथरे शौचालय उपलब्ध कराना संस्था तथा संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। बच्चों को जंगल में भेजना किसी भी स्थिति में स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
लोगों का यह भी कहना है कि बरसात के मौसम में बच्चों की परेशानी और बढ़ सकती है। जंगल और झाड़ियों में जाने के दौरान किसी अप्रिय घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए प्रशासन को किसी दुर्घटना का इंतजार करने के बजाय पहले ही आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
तत्काल जांच और व्यवस्था सुधारने की जरूरत
मामले में संबंधित अधिकारियों को तत्काल संज्ञान लेकर संस्था का निरीक्षण करना चाहिए। शौचालयों की वास्तविक स्थिति, सफाई व्यवस्था, पानी की उपलब्धता और बच्चों की सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं की जांच की जानी चाहिए।
यदि शौचालय भर चुके हैं, तो उनकी तत्काल सफाई और मरम्मत कराकर उन्हें उपयोग योग्य बनाया जाना चाहिए। साथ ही भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए नियमित सफाई और निरीक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
बच्चों को तब तक खुले में शौच के लिए जाने से रोकने के लिए वैकल्पिक सुरक्षित व्यवस्था भी की जानी आवश्यक है।
अब जवाबदेही तय करने का समय
देवीखेड़ा पंचायत में सामने आया यह मामला केवल शौचालयों की सफाई का मामला नहीं है, बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़ा सवाल है। यदि सरकारी विभाग के अधीन संचालित संस्था में बच्चे मूलभूत स्वच्छता सुविधा से वंचित हैं, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित अधिकारी मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाएं और बच्चों को तत्काल राहत उपलब्ध कराएं। शौचालयों की सफाई, पानी की उपलब्धता, नियमित रखरखाव और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
सरकार की योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा माना जाएगा, जब उनका लाभ कागजों और प्रचार अभियानों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर भी दिखाई दे। बच्चों को जंगल में शौच के लिए जाने की मजबूरी समाप्त करना इसी दिशा में पहला और जरूरी कदम होना चाहिए।
