सूरजपुर मां-बेटी हत्याकांड: कुलदीप साहू समेत तीन दोषियों को मृत्युदंड, चौथे को आजीवन कारावास
सूरजपुर। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में चर्चित मां-बेटी हत्याकांड में फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने सजा सुनाई है। गुरुवार, 8 अक्टूबर की प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य दोषी कुलदीप साहू समेत तीन दोषियों को मृत्युदंड दिया गया है। चौथे दोषी आर्यन विश्वकर्मा को जीवन के अंत तक कारावास की सजा सुनाए जाने की जानकारी सामने आई है। मामला हत्या, दुष्कर्म और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो से जुड़ा है। अदालत ने इससे पहले चारों को दोषी ठहराया था और सजा के लिए 8 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की थी।
चार दोषियों के खिलाफ हुई सुनवाई
पूर्व में प्रकाशित अदालती रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में कुलदीप साहू, चंद्रकांत चौधरी उर्फ सीके, फूल सिंह उर्फ रिंकू और आर्यन विश्वकर्मा उर्फ गोल्डी को दोषी ठहराया गया था। दोषसिद्धि और सजा निर्धारित करने की कार्रवाई अलग-अलग चरणों में हुई।
अब सामने आई सजा संबंधी रिपोर्ट में कुलदीप समेत तीन को मृत्युदंड और आर्यन को शेष जीवन कारावास की जानकारी दी गई है। प्रत्येक दोषी पर लागू धाराओं, अलग-अलग सजाओं और अन्य निर्देशों का पूरा विवरण अदालत के लिखित आदेश से स्पष्ट होगा।
अक्टूबर 2024 की घटना से जुड़ा मामला
दोहरे हत्याकांड की घटना 13 अक्टूबर 2024 की रात की है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी की हत्या हुई थी। मामले की जांच के दौरान यौन अपराध से जुड़े आरोप भी सामने आए थे।
इसके बाद प्रकरण अदालत पहुंचा और सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान तथा साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इनका परीक्षण करने के बाद चार आरोपियों को दोषी ठहराया। घटना के लगभग दो वर्ष बाद सजा का फैसला सामने आया है। पीड़ितों की निजता को ध्यान में रखते हुए उनकी पहचान संबंधी विवरण यहां शामिल नहीं किए गए हैं।
28 सितंबर को सुनाई गई थी दोषसिद्धि
अमर उजाला की 28 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायाधीश आनंद प्रकाश वारियाल की अदालत ने चार आरोपियों को हत्या, दुष्कर्म और पॉक्सो से जुड़े मामले में दोषी पाया था। उसी समय सजा के लिए 8 अक्टूबर की तारीख तय की गई थी।
इसलिए सितंबर में आया फैसला दोषसिद्धि का था, जबकि गुरुवार की खबर सजा निर्धारित होने से संबंधित है। दोनों चरणों को अलग समझना जरूरी है। अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन और सजा का आधार लिखित निर्णय में दर्ज होता है।
अलग प्रकरण में कुलदीप को दस वर्ष की सजा
इसी घटनाक्रम से जुड़े एक अलग मामले में कुलदीप साहू को दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रकरण पुलिसकर्मी को वाहन से कुचलने के प्रयास से संबंधित था।
उस सजा को मां-बेटी हत्याकांड में सुनाए गए मृत्युदंड के साथ मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए। अलग-अलग आपराधिक प्रकरणों में अदालत साक्ष्यों और आरोपों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय देती है। मुख्य हत्याकांड की सजा का आदेश और अन्य मामलों के आदेश अपने-अपने दायरे में महत्वपूर्ण हैं।
मृत्युदंड के बाद भी जारी रहती है न्यायिक प्रक्रिया
सत्र अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने का अर्थ तत्काल फांसी दिया जाना नहीं है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 407 के अनुसार, ऐसी सजा की पुष्टि के लिए कार्यवाही उच्च न्यायालय को भेजी जाती है। उच्च न्यायालय की पुष्टि के बिना मृत्युदंड का क्रियान्वयन नहीं किया जा सकता।
इसलिए वर्तमान खबर को निचली अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के रूप में समझना चाहिए। आगे की न्यायिक कार्रवाई और उच्च न्यायालय के आदेश की स्थिति अलग से स्पष्ट होगी।
उच्च न्यायालय करेगा निर्णय का परीक्षण
कानूनी प्रावधानों के अनुसार, पुष्टि के लिए भेजे गए मामले में उच्च न्यायालय सजा की पुष्टि कर सकता है या कानून के अनुसार अन्य निर्णय दे सकता है। आवश्यक होने पर अतिरिक्त साक्ष्य या आगे की जांच से जुड़े निर्देश भी दिए जा सकते हैं।
अपील और मृत्युदंड की पुष्टि की प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अभी उपलब्ध जानकारी में इस मामले पर उच्च न्यायालय का कोई नया आदेश शामिल नहीं है। इसलिए सजा को सभी न्यायिक चरणों के बाद अंतिम रूप से लागू हो चुका बताना सही नहीं होगा।
लिखित आदेश से स्पष्ट होंगे विस्तृत निर्देश
फिलहाल प्रकाशित रिपोर्टों में तीन दोषियों को मृत्युदंड और आर्यन विश्वकर्मा को जीवनपर्यंत कारावास की जानकारी सामने आई है। जुर्माना, अन्य धाराओं की सजा और अदालत की विस्तृत टिप्पणियों की पुष्टि लिखित आदेश से की जानी चाहिए।
