Supreme Court में स्ट्रीट डॉग्स पर बड़ी बहस: न्यायालय ने कहा डरने वालों को सूंघ कर हमला करते हैं आवारा कुत्ते
Supreme Court में इस सप्ताह आवारा कुत्तों और उनके प्रबंधन के मुद्दे पर विस्तृत बहस हुई। जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों की दलीलों को सुना और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि चाहे कुत्ते पालतू हों या आवारा, वे प्रायः व्यक्ति के डर और व्यवहार को महसूस कर उसी आधार पर आक्रामक हो सकते हैं। जजों ने यह भी कहा कि आवारा कुत्तों के मामलों में न केवल नागरिक सुरक्षा बल्कि पशु कल्याण को भी ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।
कोर्ट में बजट और shelter homes की चुनौती
सुनवाई में एनजीओ प्रतिनिधियों और पशु अधिकार एक्टिविस्ट वकीलों ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान परिस्थितियों में 91,800 नए shelter बनाने के लिए लगभग 26,800 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इतना विशाल बजट इंसानों के घरों और मूलभूत जरूरतों पर खर्च नहीं किया जाना चाहिए।
कुछ वकीलों ने यह भी तर्क दिया कि जब तक कुत्तों के लिए स्थायी आवास सुनिश्चित नहीं होते, उन्हें पकड़ने या हटाने की प्रक्रिया शुरू करना उचित नहीं होगा।
वकील ध्रुव मेहता ने कहा कि नगर पालिकाओं के पास इस उद्देश्य के लिए अलग बजट नहीं है, इसलिए किसी आदेश पर कार्रवाई करने से पहले ठोस डेटा और योजना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि केवल लोगों की शिकायतों के आधार पर कोई कठोर कदम उठाना संतुलित नीति के खिलाफ होगा।
हिंसक कुत्ते’ की परिभाषा पर बहस
सुनवाई के दौरान बीजेपी नेता विजय गोयल के वकील ने पुराने मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट से कहा कि कुछ कुत्तों की गतिविधियां गंभीर होती हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि एक ही कुत्ते ने सात साल के बच्चे और दो बुजुर्गों सहित कई लोगों को काटा।
उनका तर्क था कि ऐसे मामलों में कुत्तों को हिंसक घोषित करने की स्पष्ट परिभाषा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उनकी हेल्पलाइन पर लोगों की शिकायतों की संख्या 20,000 से अधिक हो चुकी है।
वकील ने यह भी कहा कि कानून को इस दृष्टिकोण से समझना चाहिए कि यह नागरिक सुरक्षा सुनिश्चित करे और पशु क्रूरता को बढ़ावा न दे।

PETA और IIT दिल्ली मॉडल का उदाहरण
सुनवाई में PETA के वकील श्याम दीवान ने कहा कि कुत्तों को बंद पिंजरे में रखना क्रूरता है और इससे समस्या का समाधान नहीं होता। उन्होंने सुझाव दिया कि माइक्रो चिपिंग, टीकाकरण और ट्रैकिंग जैसे आधुनिक उपाय अपनाए जाएं।
वहीं, अधिवक्ता करुणा नंदी ने IIT दिल्ली का मॉडल कोर्ट के सामने रखा। उन्होंने बताया कि IIT परिसर में बिना किसी हटाने या मारने की कार्रवाई के केवल एबीसी प्रोग्राम (Animal Birth Control) और जियोटैगिंग लागू करने से तीन साल में रेबीज और काटने की घटनाओं में पूरी तरह कमी आई।
करुणा नंदी ने बताया कि इस मॉडल में स्थानीय आरडब्ल्यूए (Resident Welfare Association) और कम्युनिटी फीडिंग ज़ोन का सहयोग लिया गया। इससे कुत्तों के व्यवहार और आवास पर निगरानी भी बनी रही और समस्या स्थायी रूप से हल हुई।
Supreme Court का रुख और आगे की प्रक्रिया
Supreme Court ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि संतुलित नीति बनाना आवश्यक है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों के मामलों में केवल नागरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि पशु कल्याण भी सुनिश्चित होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा नियमों और स्थानीय उपायों के आधार पर ही कोई व्यापक कदम उठाना चाहिए। उदाहरण के लिए, एबीसी प्रोग्राम, माइक्रो चिपिंग, जियोटैगिंग और shelter homes को प्राथमिकता दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को निर्धारित की है। इस सुनवाई में आशा जताई जा रही है कि आवारा कुत्तों और नागरिक सुरक्षा दोनों के हितों को संतुलित करते हुए नई दिशा तय की जाएगी।
विशेषज्ञों की राय
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पशु अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि कुत्तों को मारने या हटाने के बजाय उनके प्रजनन और आवास पर नियंत्रण सबसे कारगर उपाय है।
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नागरिक सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डर और असुरक्षा महसूस करने वाले लोग कुत्तों के आक्रामक व्यवहार का कारण बन सकते हैं, इसलिए जागरूकता और प्रशिक्षण भी जरूरी है।
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न्यायालय ने सुझाव दिया कि माइक्रो चिपिंग और जियोटैगिंग जैसी तकनीकें अपनाने से न केवल समस्या का समाधान होगा, बल्कि डेटा के आधार पर सही निर्णय लेना भी संभव होगा।
निष्कर्ष
Supreme Court में हुई यह बहस यह दर्शाती है कि आवारा कुत्तों का मुद्दा केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि पशु कल्याण का भी है।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस मामले में संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इसके तहत नागरिक सुरक्षा, पशु अधिकार, बजट और आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर विचार किया जाएगा।
शुक्रवार की अगली सुनवाई में उम्मीद जताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी दिशा निर्देशित नीति जारी करेगा, जो नागरिकों को सुरक्षित रखे और कुत्तों के प्रति क्रूरता को कम करे।
