सुप्रीम कोर्ट का फैसला: धर्मांतरण के बाद पुरानी जाति के आधार पर नहीं मिलेगा पिछड़ा वर्ग आरक्षण
नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण और आरक्षण से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म में जाने के बाद कोई व्यक्ति केवल अपनी पुरानी जाति या समुदाय की सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति के आधार पर दूसरे धर्म के किसी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग में शामिल होने का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने तमिलनाडु सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें हाई कोर्ट द्वारा राज्य सरकार के आदेश को रद्द किए जाने को चुनौती दी गई थी।
यह मामला तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (BC Muslim) श्रेणी के तहत आरक्षण से जुड़ा था। अदालत का फैसला इसी कानूनी विवाद और राज्य सरकार के आदेश के संदर्भ में है। फैसले का आशय यह है कि धर्म बदलने मात्र से किसी व्यक्ति को नए धर्म के किसी अधिसूचित पिछड़े समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता।
क्या था तमिलनाडु सरकार का आदेश?
तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक सरकारी आदेश जारी किया था। इसके तहत पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदाय (DNC) और अनुसूचित जाति (SC) से इस्लाम अपनाने वाले कुछ लोगों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम के रूप में मानकर आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया था। आदेश में ऐसे धर्मांतरित लोगों को मुस्लिम समुदाय की अधिसूचित श्रेणी का प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था भी शामिल थी।
राज्य सरकार का तर्क था कि धर्म बदलने से किसी व्यक्ति की पहले से मौजूद सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। इसी आधार पर सरकार ने कहा था कि धर्मांतरण करने वाले लोगों को आरक्षण से पूरी तरह वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
मद्रास हाई कोर्ट ने क्यों रद्द किया था आदेश?
मद्रास हाई कोर्ट ने जून 2026 में राज्य सरकार के आदेश को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि इस्लाम स्वीकार करने से कोई व्यक्ति अपने आप उन मुस्लिम समुदायों में शामिल नहीं हो जाता, जिन्हें तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग मुस्लिम के रूप में अधिसूचित किया गया है। अदालत के अनुसार, एक धर्म से दूसरे धर्म में जाना और किसी विशेष सामाजिक समुदाय का सदस्य बनना अलग-अलग बातें हैं।
हाई कोर्ट ने यह भी माना था कि केवल कार्यकारी आदेश के जरिए पहले के न्यायिक फैसलों और लागू कानूनी सिद्धांतों को बदला नहीं जा सकता। इसी फैसले के खिलाफ तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
समीर अहमद से जुड़ा था मामला
यह विवाद तूतीकोरिन जिले के समीर अहमद से जुड़ा था। उनका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था और बाद में उन्होंने इस्लाम अपनाया। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम लेब्बई समुदाय का प्रमाणपत्र लेने के लिए आवेदन किया। स्थानीय राजस्व अधिकारी ने आवेदन स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला मद्रास हाई कोर्ट पहुंचा।
समीर अहमद की ओर से यह दावा किया गया था कि धर्मांतरण के बाद उन्हें पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में प्रमाणपत्र मिलना चाहिए। तमिलनाडु सरकार ने भी अपने आदेश का बचाव करते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य धर्म बदलने के कारण किसी पिछड़े व्यक्ति को आरक्षण के लाभ से वंचित होने से बचाना था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस्लाम अपनाने मात्र से कोई व्यक्ति राज्य में अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदायों में शामिल नहीं हो जाता। व्यक्ति की पुरानी जाति या समुदाय की पहचान को सीधे नए धर्म की किसी पिछड़ा वर्ग श्रेणी में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी निजी धार्मिक संस्था या जमात का प्रमाणपत्र अपने आप सरकारी आरक्षण पात्रता तय नहीं कर सकता। आरक्षण से जुड़ी पात्रता कानून और सक्षम सरकारी प्राधिकरण द्वारा निर्धारित नियमों के आधार पर ही तय होगी।
फैसले का दायरा क्या है?
इस फैसले को यह कहकर समझना सही नहीं होगा कि धर्म बदलने वाला हर व्यक्ति हर परिस्थिति में किसी भी प्रकार के आरक्षण से वंचित हो जाएगा। मामला तमिलनाडु सरकार के 2024 के आदेश और पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में पात्रता से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्मांतरण के बाद पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर नए अधिसूचित पिछड़ा वर्ग में सदस्यता अपने आप नहीं मिलती। किसी व्यक्ति की पात्रता संबंधित कानून, समुदाय की अधिसूचना और सक्षम प्राधिकरण के निर्णय के अनुसार देखी जाएगी।
