वीतरागता का अर्थ संवेदनहीनता नहीं, मैत्री और करुणा ही सच्ची साधना: आचार्य सुनील सागर
नेमीनगर जैन कॉलोनी। दिगम्बर जैन मंदिर में आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज का 49वां अवतरण दिवस धार्मिक कार्यक्रमों के साथ मनाया गया। सुबह भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। इसके बाद पंडाल में आचार्यश्री का पाद प्रक्षालन कर उन्हें जिनवाणी भेंट की गई। इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री ने जीवन की अनिश्चितता, मानवीय संवेदनशीलता और धर्म के वास्तविक स्वरूप पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि धर्म का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में मैत्री, करुणा और उपकार के रूप में दिखाई देना चाहिए।
जीवन की अनिश्चितता को समझने का संदेश
मीडिया प्रभारी प्रवीण जैन ने बताया कि अवतरण दिवस पर आचार्यश्री ने अपनी अमृतवाणी में कहा कि मनुष्य की आयु कितनी है, यह किसी को पता नहीं। कोई व्यक्ति स्वस्थ और प्रसन्न दिखाई दे सकता है, उत्सव में नाच सकता है और अगले ही क्षण उसका जीवन समाप्त हो सकता है। यही जीवन की अनिश्चितता है।
आचार्यश्री ने एक प्रसंग के माध्यम से समझाया कि किसी व्यक्ति की अचानक मृत्यु होने के बाद भी यदि कार्यक्रम ऐसे चलता रहे, मानो कुछ हुआ ही नहीं, तो यह केवल मृत्यु की घटना नहीं है। यह मनुष्य की संवेदनशीलता के क्षीण होने का संकेत भी है। उन्होंने ऐसे प्रसंगों में अपने व्यवहार और भीतर के भावों पर विचार करने का संदेश दिया।
दुःख की घड़ी में परिवार के साथ खड़े हों
आचार्य सुनील सागर जी महाराज ने कहा कि किसी की मृत्यु के समय सबसे पहली जिम्मेदारी उसके परिवार और परिजनों के साथ खड़े होने की होनी चाहिए। शोक में डूबे परिवार को संभालना और उनकी पीड़ा को समझना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में यदि कोई मृत्यु को ही ‘अपशकुन’ कहने लगे, तो उसे अपने भीतर झांकने की आवश्यकता है। किसी के दुःख को समझने के स्थान पर केवल अपने कार्यक्रम और आनंद की चिंता करना संवेदना के अभाव को दर्शाता है। उन्होंने मृत्यु को अपशकुन समझने के बजाय जीवन की सच्चाई और अनिश्चितता का संदेश समझने की बात कही।
धर्ममार्ग पर बढ़नी चाहिए मैत्री और करुणा
आचार्यश्री ने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को धर्ममार्ग का साधक और मुमुक्षु मानता है, उसके भीतर जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और अपनापन बढ़ना चाहिए। साधना का प्रभाव केवल विचारों या वचनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी के प्राण चले जाने पर भी यदि संवेदना नहीं जागती और व्यक्ति केवल अपने उत्सव तथा आनंद को देखता है, तो उसे विचार करना चाहिए। उसे देखना चाहिए कि धर्म और साधना का प्रभाव उसके आचरण में कितना आया है। दूसरों की पीड़ा के प्रति सजगता धर्म के व्यवहारिक स्वरूप से जुड़ी है।
वैराग्य और संवेदनहीनता के अंतर पर दिया जोर
आचार्य सुनील सागर जी महाराज ने स्पष्ट किया कि वैराग्य का अर्थ संवेदनहीन होना नहीं है। वीतरागता का अर्थ राग-द्वेष से ऊपर उठना है। जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और उपकार की भावना समाप्त कर देना धर्म नहीं है।
उन्होंने कहा कि राग का क्षय होने पर जीवों के प्रति मैत्री और अपनापन बढ़ना चाहिए। उपकार की भावना जागनी चाहिए। केवल बाहरी रूप से धर्म की बातें करना पर्याप्त नहीं है। यदि व्यवहार में किसी के दुःख से कोई फर्क ही नहीं पड़ता, तो अपने भीतर के धर्म को जांचने की आवश्यकता है।
चित्र अनावरण और दीप प्रज्वलन में शामिल हुए समाजजन
अवतरण दिवस के अवसर पर चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया। कार्यक्रम में समाजसेवी संजय पाटौदी, चातुर्मास संयोजक इंद्र कुमार सेठी, गिरीश जी पाटोदी, कांतिलाल जी बम, प्रदीप जी बड़जात्या, तेजकुमार जी वैद, संदीप जी गंगवाल, देवेंद्र जी सेठी और संजय जैन उपस्थित रहे। बाहर से आए गणमान्य धर्मप्रेमी समाजजनों ने भी सहभागिता की।
धर्मसभा में आचार्यश्री के संदेश का केंद्र मानवीय संवेदना रहा। उन्होंने कहा कि धर्म भीतर से जागृत करता है। राग-द्वेष कम होने के साथ जीवों के प्रति मैत्री और करुणा बढ़ना ही सच्ची साधना है। किसी के दुःख में साथ खड़े होना, परिवार को संभालना और जीव मात्र के प्रति करुणा रखना धर्म की वास्तविक प्रभावना है।
