Sugar Price: मिलों में ₹67 से घटकर ₹47-55 तक पहुंची चीनी, फिर खुदरा बाजार में क्यों नहीं मिल रही सस्ती?
नई दिल्ली। त्योहारी सीजन से पहले चीनी की कीमतों में आई तेजी ने आम उपभोक्ताओं का बजट प्रभावित किया है। केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद मिल स्तर पर चीनी की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन इसका पूरा लाभ अभी खुदरा ग्राहकों तक नहीं पहुंचा है। अलग-अलग बाजारों में एक्स-मिल कीमतें 47 से 55 रुपये प्रति किलो तक आने की रिपोर्ट है, जबकि खुदरा बाजार में चीनी अब भी करीब 62 से 64 रुपये प्रति किलो के आसपास बिक रही है।
उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, देश में चीनी का औसत खुदरा मूल्य पिछले सप्ताह के 65.08 रुपये प्रति किलो से घटकर 62.57 रुपये प्रति किलो हुआ है। यानी ग्राहकों को अभी लगभग 2.50 रुपये प्रति किलो की ही राहत मिली है। इसके विपरीत, एक्स-मिल स्तर पर कीमतों में 17 से 20 रुपये प्रति किलो तक की कमी देखी गई।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब चीनी मिलों से सस्ती निकल रही है तो स्थानीय किराना दुकानों और खुदरा बाजारों में ग्राहकों को इसका पूरा फायदा क्यों नहीं मिल रहा है?
एक्स-मिल कीमत क्या होती है?
एक्स-मिल कीमत वह दर होती है, जिस पर चीनी मिलें अपना उत्पाद थोक व्यापारियों अथवा बड़े खरीदारों को बेचती हैं। इसमें मिल से बाजार तक चीनी पहुंचाने का परिवहन खर्च, भंडारण, थोक विक्रेता का मार्जिन, पैकेजिंग और खुदरा विक्रेता का लाभ शामिल नहीं होता।
इसलिए मिल की कीमत और ग्राहक द्वारा दुकान पर चुकाई जाने वाली कीमत में अंतर स्वाभाविक है। उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में एक्स-मिल और थोक कीमत के बीच दो से तीन रुपये प्रति किलो तथा एक्स-मिल और खुदरा कीमत के बीच सात से आठ रुपये तक का अंतर रह सकता है।
मौजूदा स्थिति में यह अंतर सामान्य से ज्यादा दिखाई दे रहा है, क्योंकि एक्स-मिल कीमतों में गिरावट तेजी से हुई, जबकि खुदरा विक्रेताओं के पास पहले से खरीदा हुआ महंगा स्टॉक मौजूद है।
दुकानदारों के पास पड़ा है पुरानी कीमत वाला स्टॉक
खुदरा बाजार में कीमतें धीमी गति से कम होने का सबसे बड़ा कारण पुराना स्टॉक बताया जा रहा है। किराना दुकानदारों और खुदरा कारोबारियों ने जब चीनी खरीदी थी, उस समय थोक बाजार में इसकी कीमत अधिक थी।
अगर दुकानदार पुराना स्टॉक नई कम कीमत पर बेचते हैं तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए कई विक्रेता पहले ज्यादा कीमत पर खरीदा गया माल समाप्त होने का इंतजार कर रहे हैं। जब वे नई और कम दर पर चीनी खरीदेंगे, तभी ग्राहकों को खुदरा कीमतों में बड़ी कमी दिखाई देगी।
उद्योग सूत्रों के अनुसार एक सामान्य खुदरा व्यापारी 50 किलो वजन वाली लगभग 10 से 15 बोरियां अपने पास रख सकता है। यह पुराना स्टॉक बिकने में कुछ समय लग सकता है। नए स्टॉक की खरीद होने के बाद कीमतों में कमी दिखाई देने की संभावना रहती है।
खुदरा कीमतों में गिरावट आने में लग सकता है समय
एक्स-मिल कीमतों में बदलाव थोक बाजार में अपेक्षाकृत तेजी से दिखाई देता है, लेकिन खुदरा बाजार तक इसका प्रभाव पहुंचने में समय लगता है। चीनी को मिल से थोक व्यापारी, वितरक और फिर स्थानीय दुकानदार तक पहुंचना होता है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार खुदरा कीमत में बदलाव दिखाई देने में करीब 10 दिन या उससे अधिक समय लग सकता है। यह अवधि शहर, बाजार, मांग, उपलब्ध स्टॉक और आपूर्ति व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
31 अगस्त की एक रिपोर्ट के अनुसार एक्स-मिल चीनी की कीमत अपने 67 रुपये प्रति किलो के उच्च स्तर से घटकर करीब 47 रुपये तक आ गई थी। उस समय औसत खुदरा भाव 64.23 रुपये और थोक भाव 59.72 रुपये प्रति किलो बताया गया था।
सरकार के इन कदमों से कम हुए मिल स्तर के दाम
सरकार द्वारा आपूर्ति बढ़ाने और जमाखोरी पर रोक लगाने के लिए उठाए गए कदमों के बाद एक्स-मिल कीमतों में गिरावट आई है। निर्यात के लिए रिफाइन की गई चीनी को घरेलू बाजार में बेचने की अनुमति देने का फैसला भी किया गया।
अनुमान है कि अगले दो महीनों में लगभग तीन से साढ़े तीन लाख टन रिफाइंड चीनी घरेलू बाजार में आ सकती है। इससे बाजार में उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
सरकार ने अधिक मात्रा में चीनी का उपयोग करने वाले संस्थागत और औद्योगिक खरीदारों के लिए स्टॉक रखने से संबंधित नियम भी सख्त किए हैं। इसका उद्देश्य जरूरत से ज्यादा भंडारण को रोकना और बाजार में नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
सितंबर से लागू हुई नई कोटा व्यवस्था
सरकार ने सितंबर से चीनी का पखवाड़ा आधारित कोटा सिस्टम लागू करने का निर्णय लिया है। इसके तहत मासिक कोटा प्रणाली की जगह कम अवधि में बिक्री और आपूर्ति की निगरानी की जाएगी।
चीनी मिलों को आवंटित मात्रा का कम से कम 40 प्रतिशत हिस्सा पहले सप्ताह में और शेष हिस्सा अगले सप्ताह में बेचने के लिए कहा गया है। इसके अतिरिक्त मिलों को बिक्री के सात दिनों के भीतर चीनी भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चीनी केवल कागजों पर न बिके, बल्कि समय पर मिल से निकलकर व्यापारियों और ग्राहकों तक पहुंचे। सरकार का कहना है कि देश में चीनी की कमी नहीं है और पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।
जमाखोरी और सट्टेबाजी पर निगरानी
चीनी की कीमतों में अचानक आई तेजी के पीछे जमाखोरी और सट्टेबाजी को भी एक कारण माना गया। देशभर में चीनी मिलों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन कराया गया। कुछ मामलों में मिलों के पास घोषित मात्रा से अधिक स्टॉक पाए जाने की जानकारी सामने आई।
कुछ मिलों द्वारा आवंटित मात्रा से कम चीनी बाजार में बेचने की प्रवृत्ति भी देखी गई। इससे पर्याप्त भंडार होने के बावजूद बाजार में कृत्रिम कमी जैसी स्थिति बन सकती है। सरकार ने ऐसे मामलों की निगरानी बढ़ाने और आपूर्ति व्यवस्थित करने के निर्देश दिए हैं।
नई चीनी आने से और कम हो सकती हैं कीमतें
नया गन्ना पेराई सत्र 15 अक्टूबर से शुरू होने की संभावना है। अक्टूबर में 10 लाख टन से अधिक और नवंबर में लगभग 45 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान है। नई चीनी बाजार में आने से उपलब्धता और मजबूत होने की उम्मीद है।
अगर मिल स्तर की कम कीमतें बनी रहती हैं और नया स्टॉक थोक एवं खुदरा बाजार तक पहुंचता है तो आने वाले दिनों में ग्राहकों को अधिक राहत मिल सकती है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर कीमत शहर, ब्रांड, पैकिंग, गुणवत्ता और बिक्री व्यवस्था के अनुसार अलग हो सकती है।
ग्राहकों को खरीदारी से पहले स्थानीय दुकानों, सहकारी भंडारों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की कीमतों की तुलना करनी चाहिए। मिल में कीमत घटने का मतलब यह नहीं है कि उसी दिन खुदरा बाजार में भी उतनी ही कमी आ जाएगी, क्योंकि पुराना स्टॉक और वितरण श्रृंखला कीमतों के बदलाव को धीमा कर देते हैं।
