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बाहर की ऊंचाई नहीं, भीतर की नींव मजबूत कीजिए: मुनिश्री सुधासागर महाराज

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Published On: 5 September 2026

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बाहर की ऊंचाई नहीं, भीतर की नींव मजबूत कीजिए: मुनिश्री सुधासागर महाराज

जीवन में मिली सुविधाओं के लिए आभार व्यक्त करें, विरोध और कठिनाइयों को आत्मिक उन्नति का माध्यम बनाएं

रिपोर्टर: राजेश जैन दद्दू

इंदौर। धर्म, समाज, संस्कृति और जीवदया को समर्पित श्रमण संस्कृति के महाश्रमण मुनिश्री सुधासागर महाराज ने शनिवार को दलालबाग स्थित विद्यासुधा देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा को संबोधित किया। अपनी पीयूष देशना में उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य जीवन में ऊंचाइयों को छूना चाहता है, लेकिन ऊंचा वही उठ सकता है जिसकी जड़ें मजबूत हों।

मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार कोई पेड़ आकाश की ओर बढ़ने से पहले अपनी जड़ों को धरती में गहरा करता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी बाहरी सफलता प्राप्त करने से पहले अपनी अंतरात्मा की नींव और मन की शांति को मजबूत करना चाहिए। केवल बाहरी उपलब्धियां व्यक्ति को महान नहीं बनातीं, बल्कि उसके विचार, संस्कार और आंतरिक स्थिरता ही उसकी वास्तविक ऊंचाई निर्धारित करते हैं।

सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन मन की शांति कम हुई

मुनिश्री सुधासागर महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य के पास परिवार, धन, साधन, सुविधाएं, समाज, भगवान और गुरु सब कुछ उपलब्ध है। इसके बावजूद उसका मन शांत नहीं है। जैसे-जैसे भौतिक सुविधाएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे क्रोध, मान, माया और लोभ भी बढ़ते जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मनुष्य ने अपनी खुशी को दूसरों की प्रशंसा और बाहरी दिखावे से जोड़ लिया है। वह चाहता है कि लोग उसकी उपलब्धियों की प्रशंसा करें और उसके वैभव को स्वीकार करें। इसके विपरीत वास्तविक धर्म अपने भीतर उतरने, स्वयं को पहचानने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का नाम है।

छोटी घटना भी छीन लेती है मन की शांति

मुनिश्री ने दैनिक जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारी शांति कितनी कमजोर है, इसका पता छोटी-सी घटना से चल जाता है। हम सुबह प्रसन्न होकर उठते हैं, लेकिन घर में टूथब्रश जैसी सामान्य वस्तु टूट जाए तो हमारा क्रोध पूरे वातावरण को बदल देता है।

उन्होंने कहा कि यदि इतनी छोटी घटना भी हमारी शांति छीन सकती है, तो हमें विचार करना चाहिए कि हमारा मन वास्तव में कितना मजबूत है। जीवन की बड़ी परिस्थितियों का सामना करने के लिए व्यक्ति को पहले छोटी-छोटी बातों पर अपने क्रोध और प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना सीखना होगा।

मन से पूछिए—और क्या चाहिए?

मुनिश्री ने कहा कि पंचम काल में भारतभूमि, जैन कुल, भगवान, गुरु और धर्म का मिलना अपने आप में बहुत बड़ा सौभाग्य है। मनुष्य को बार-बार अपने मन से पूछना चाहिए कि उसे और क्या चाहिए।

उन्होंने कहा कि मन की भूख तब तक समाप्त नहीं होगी, जब तक मन स्वयं तृप्त होना नहीं सीखता। इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती। एक इच्छा पूरी होने के बाद दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इसलिए सच्चा सुख अधिक से अधिक प्राप्त करने में नहीं, बल्कि जो मिला है उसमें संतोष और कृतज्ञता का अनुभव करने में है।

बुराइयों और कठिनाइयों को खाद बनाना सीखें

मुनिश्री ने जीवन की कठिनाइयों को देखने का दृष्टिकोण बदलने का संदेश देते हुए कहा कि बुराई से केवल घृणा मत कीजिए, बल्कि उसे खाद बनाना सीखिए। जिस प्रकार किसान गंदगी और कचरे को खाद बनाकर अच्छी फसल पैदा करता है, उसी तरह मनुष्य भी विरोध, अपमान, कठिनाई और संकट को अपनी आत्मिक उन्नति का माध्यम बना सकता है।

मानतुंग आचार्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि विपरीत परिस्थितियां भी महान साधना और उपलब्धि का कारण बन सकती हैं। समस्या यह नहीं है कि जीवन में कठिनाई क्यों आई, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हमने उस कठिनाई से क्या सीखा और स्वयं को कितना बेहतर बनाया।

जो मिला है, उसके लिए आभार व्यक्त करें

मुनिश्री सुधासागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को जीवन में प्राप्त प्रत्येक वस्तु के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। बाजरे की रोटी मिले तो उसे छोटा नहीं समझना चाहिए। रहने के लिए झोपड़ी मिली है तो उसके लिए भी धन्यवाद करना चाहिए। साइकिल या पुरानी गाड़ी मिली है तो उसका अपमान करने के बजाय उसके उपयोग और सहयोग को समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनुष्य दूसरों के पास मौजूद वस्तुओं को देखकर दुखी होता है, लेकिन अपने पास उपलब्ध सुख-सुविधाओं को भूल जाता है। जो मिला है, पहले उसके लिए प्रसन्न और आभारी होना सीखना चाहिए। कृतज्ञता का भाव व्यक्ति के भीतर संतोष और शांति पैदा करता है।

अपने जीवन को कोसना सबसे खतरनाक

मुनिश्री ने चेतावनी देते हुए कहा कि दूसरे व्यक्ति के अभिशाप से अधिक खतरनाक स्वयं अपने जीवन को कोसना है। “मेरी किस्मत खराब है” और “मेरे साथ ही हमेशा बुरा होता है” जैसे विचार मनुष्य को अंदर से कमजोर कर देते हैं।

इसके स्थान पर व्यक्ति के भीतर यह भाव होना चाहिए कि उसके पास बहुत कुछ है। उसे भगवान, गुरु और धर्म का सानिध्य प्राप्त हुआ है। जो भी जीवन में मिला है, उसके लिए आभार व्यक्त करने से नकारात्मकता समाप्त होती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।

छोड़ने के बाद भी आभार रखना सच्चा धर्म

मुनिश्री ने कहा कि सच्चा धर्म केवल कुछ प्राप्त करने में नहीं, बल्कि छोड़ने के बाद भी आभार का भाव बनाए रखने में है। जिसने हमें कुछ दिया, जिसने हमारा साथ निभाया और यहां तक कि जिसने हमें कठिनाई दी, हर व्यक्ति और परिस्थिति से कुछ सीखने की दृष्टि विकसित करनी चाहिए।

प्रचार प्रमुख राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में बाल ब्रह्मचारी पारस भैया, चक्रवर्ती अध्यक्ष सपना मनीष गोधा, नवीन गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष आनंद गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोशी, महामंत्री हर्ष जैन, डॉ. जैनेन्द्र जैन, संजय पाटोदी, श्रुत जैन, मयंक जैन, विकास पाटोदी, कमल अग्रवाल, मुक्ता जैन और सोनाली बगड़िया सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।

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