छोटे-छोटे संयम के नियम बदल सकते हैं जीवन की दिशा : आचार्यश्री उदारसागर — दैनिक स्वराज वाणी
रिपोर्टर: मनोज जैन नायक
नगर के बड़े जैन मंदिर में चातुर्मासरत ज्ञानरत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संसार में रहते हुए मनुष्य सांसारिक कार्यों में इतना लिप्त हो जाता है कि राग-द्वेष, मान, माया और लोभ के चक्कर में पड़कर आत्मसाधना को भूल जाता है। उन्होंने कहा कि सांसारिक जिम्मेदारियों के बीच भी मनुष्य को धीरे-धीरे संयम की साधना का अभ्यास करते रहना चाहिए। जीवन में संयम का विशेष महत्व है, क्योंकि यह इच्छाओं पर नियंत्रण रखना और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना सिखाता है।
नियमित नियमों से मजबूत होता है आत्मबल
आचार्यश्री ने कहा कि एक छोटा-सा संयम का नियम भी मनुष्य के जीवन की दिशा बदल सकता है। व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियम अपनाकर उनका नियमित पालन करना चाहिए। जिस प्रकार बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, उसी प्रकार छोटे-छोटे नियमों का नित्य पालन करने से आत्मबल मजबूत होता है और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता मिलती है।
उन्होंने कहा कि संयम की साधना एक दिन में पूरी नहीं होती। इसके लिए निरंतर अभ्यास, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास जरूरी है। जब मनुष्य अपनी क्षमता के अनुसार छोटे नियम धारण कर उनका निष्ठापूर्वक पालन करता है, तो धीरे-धीरे उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। नियमों के माध्यम से व्यक्ति अपने व्यवहार को सुधारने और कमजोरियों को दूर करने का प्रयास कर सकता है।
आचार्यश्री ने बताया कि नियम व्यक्ति को अनुशासन, आत्मनियंत्रण और आत्मजागरूकता देते हैं। वे संयम को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करते हैं और जीवन के उद्देश्य की ओर बढ़ने का आधार बनते हैं। नियमों का पालन करने से व्यक्ति अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीखता है। इससे वह अपने कार्यों के प्रति अधिक सजग होता है और गलत प्रवृत्तियों से बचकर सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा पाता है।
विकार आत्मिक उन्नति में बाधक
आचार्यश्री उदारसागरजी ने कहा कि काम, क्रोध, लोभ, मान और माया जैसे विकार आत्मिक उन्नति में बाधा बनते हैं। इनके कारण मन अशांत रहता है और व्यक्ति कई बार उचित-अनुचित का विचार किए बिना कार्य कर बैठता है। संयम के नियमों के नियमित अभ्यास से इन विकारों पर नियंत्रण पाने का प्रयास किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपनी इच्छाओं को सीमित करना और क्रोध के समय धैर्य रखना सीखता है, तब उसके भीतर शांति और संतोष का भाव विकसित होता है। वाणी पर नियंत्रण रखना, दूसरों के प्रति कटु भाव न रखना और अनावश्यक इच्छाओं को सीमित करना भी आत्मसंयम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। व्यक्ति को अपनी दिनचर्या में ऐसे नियम अपनाने चाहिए, जो उसे आत्मसंयम की ओर प्रेरित करें। सामर्थ्य के अनुसार नियमित प्रयास किए जाएं तो कठिन लगने वाली साधना भी धीरे-धीरे सहज बन सकती है।
समता भाव से समाधि मरण की भावना रखें : मुनिश्री उपशांतसागर
धर्मसभा में जैन संत मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य सल्लेखनापूर्वक समाधि मरण की भावना रखना होना चाहिए। गृहस्थ हो या महाव्रती, प्रत्येक व्यक्ति के मन में यह भाव रहना चाहिए कि जीवन के अंतिम समय में वह राग-द्वेष से रहित होकर समता धारण करे और इस नश्वर शरीर का त्याग करे।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन अनित्य है और शरीर एक दिन नष्ट होने वाला है। इसलिए शरीर के प्रति अत्यधिक मोह रखने के बजाय आत्मकल्याण की भावना को महत्व देना चाहिए। मनुष्य को जीवनभर संयम और नियमों का पालन करते हुए आत्मा को विकारों से मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन के अंतिम समय में भी किसी के प्रति राग-द्वेष, मोह अथवा कषाय का भाव नहीं रहना चाहिए। उन्होंने समता भाव धारण कर शांतिपूर्वक शरीर त्यागने की भावना रखने का संदेश दिया।
