भागीरथपुरा में दूषित पानी से फैली बीमारी: जांच में सामने आई गंभीर लापरवाही
इंदौर। भागीरथपुरा क्षेत्र में 29 दिसंबर को दूषित पानी पीने से बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने की घटना ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद कराई गई पानी की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। लगातार 15 दिनों के भीतर छह बार लिए गए पानी के नमूनों में फीकल कोलीफार्म और E. coli जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए, जो यह दर्शाते हैं कि क्षेत्र में सप्लाई किया जा रहा पानी पीने योग्य नहीं था।
विधानसभा में हुआ खुलासा
इस मामले का खुलासा शुक्रवार को विधानसभा में हुआ। मनावर से कांग्रेस विधायक हीरालाल अलावा द्वारा पूछे गए प्रश्न के लिखित उत्तर में नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने स्वीकार किया कि भागीरथपुरा और आसपास के क्षेत्रों से लिए गए पानी के नमूनों में गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण पाया गया है।
मंत्री द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 30 दिसंबर से 1 जनवरी के बीच नगर निगम की टीम ने भागीरथपुरा सहित
भागीरथपुरा
आसपास के कई इलाकों से पानी के सैंपल एकत्र किए। इन नमूनों की जांच एमजीएम मेडिकल कॉलेज और जिला जन स्वास्थ्य प्रयोगशाला में कराई गई। जांच रिपोर्ट में पानी को पीने के लिए अनुपयुक्त घोषित किया गया।
15 दिनों में छह बार असंतोषजनक रिपोर्ट
घटना के बाद लगातार पानी की गुणवत्ता की निगरानी की गई, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ। 30 दिसंबर से 15 जनवरी के बीच कुल छह बार अलग-अलग स्थानों से सैंपल लिए गए और लगभग हर बार रिपोर्ट असंतोषजनक रही। इससे स्पष्ट है कि समस्या अस्थायी नहीं बल्कि संरचनात्मक और गंभीर थी।
एमजीएम मेडिकल कॉलेज में हुई जांच के दौरान भागीरथपुरा के घरों से लिए गए नौ नमूनों में कोलीफार्म बैक्टीरिया की पुष्टि हुई। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों से लिए गए नमूनों में भी इसी प्रकार के खतरनाक जीवाणु पाए गए।
किन-किन क्षेत्रों में मिला संक्रमित पानी
सिर्फ भागीरथपुरा ही नहीं, बल्कि कुलकर्णी का भट्टा, आदर्श बिजासन नगर (परदेशीपुरा), फर्शी वाली गली, भट्टा बस्ती, तिनका कॉलोनी और यादव कॉलोनी जैसे कई क्षेत्रों से लिए गए सैंपलों में भी दूषित पानी की पुष्टि हुई।
चौंकाने वाली बात यह रही कि एक चाय की दुकान, एक पानी के टैंकर (एमपी09 केबी 8382) और मामा की धर्मशाला से लिए गए नमूनों में भी फीकल कोलीफार्म और ई-कोलाई बैक्टीरिया पाए गए। इससे यह संकेत मिलता है कि समस्या केवल घरेलू पाइपलाइनों तक सीमित नहीं थी, बल्कि सार्वजनिक जलस्रोत भी प्रभावित थे।
कुछ नमूनों में हाइड्रोजन सल्फाइड गैस की भी पुष्टि हुई, जिससे पानी में बदबू आ रही थी। यह गैस आमतौर पर जैविक प्रदूषण और सड़न की स्थिति में उत्पन्न होती है।
जांच में पाए गए खतरनाक बैक्टीरिया
जांच रिपोर्ट में जिन प्रमुख बैक्टीरिया की पुष्टि हुई, उनमें शामिल हैं:
- फीकल कोलीफार्म
- ई-कोलाई
- स्युडोमोनास एरूजिनोसा
- क्लेबीसिया स्पीशीज
- सिट्रोबेक्टर स्पीशीज
- वाइब्रो स्पीशीज
ये सभी बैक्टीरिया मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। विशेष रूप से फीकल कोलीफार्म और ई-कोलाई मल-मूत्र जनित प्रदूषण के संकेत माने जाते हैं। इनकी मौजूदगी से यह स्पष्ट होता है कि पेयजल स्रोत किसी न किसी रूप में सीवेज या गंदे पानी के संपर्क में आया।
स्वास्थ्य पर संभावित खतरे
दूषित पानी के सेवन से डायरिया, उल्टी-दस्त, पेट में संक्रमण, बुखार और अन्य जठरांत्र संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। छोटे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए यह स्थिति अधिक खतरनाक हो सकती है।
हाइड्रोजन सल्फाइड गैस की मौजूदगी न केवल पानी को दुर्गंधयुक्त बनाती है, बल्कि लंबे समय तक सेवन करने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।
29 दिसंबर को जब बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े, तब इस खतरे की गंभीरता सामने आई। इसके बावजूद शुरुआती स्तर पर नियंत्रण में देरी को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
पुरानी पाइप लाइनें बनी बड़ी वजह
भागीरथपुरा क्षेत्र में लगभग 40 वर्ष पुरानी पाइप लाइनें बिछी हुई हैं। समय के साथ इन पाइपों में जंग लगना, दरारें आना और लीकेज होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में सीवेज लाइन और पेयजल लाइन के संपर्क में आने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे पानी दूषित हो सकता है।
पिछले तीन वर्षों में लगभग 60 प्रतिशत कॉलोनियों में नर्मदा पेयजल लाइन बिछाई जा चुकी है। हालांकि शेष 40 प्रतिशत क्षेत्रों में अभी कार्य जारी है। करीब 10 प्रतिशत हिस्से में पाइपलाइन बदलने का काम अगले दो से तीन महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
वैकल्पिक व्यवस्था और जनप्रतिनिधि का बयान
फिलहाल कुछ इलाकों में उपयोग के लिए नर्मदा जल की सप्लाई की जा रही है, जबकि पेयजल की आवश्यकता टैंकरों के माध्यम से पूरी की जा रही है। हालांकि टैंकर से लिए गए नमूनों में भी संक्रमण मिलने से यह व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ गई है।
भागीरथपुरा के पार्षद कमल वाघेला के अनुसार, पुरानी पाइप लाइनें समस्या की मुख्य वजह हैं और इन्हें चरणबद्ध तरीके से बदला जा रहा है। उन्होंने आश्वासन दिया कि शेष कार्य जल्द पूरा कर लिया जाएगा और नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा।
प्रशासनिक लापरवाही पर उठते सवाल
लगातार खराब रिपोर्ट आने के बावजूद स्थिति को तुरंत नियंत्रित नहीं किया जा सका। यह सवाल उठ रहा है कि जब शुरुआती जांच में ही पानी पीने योग्य नहीं पाया गया था, तो व्यापक स्तर पर चेतावनी जारी करने और वैकल्पिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में देरी क्यों हुई।
इस घटना ने शहरी जल प्रबंधन प्रणाली की कमियों को उजागर कर दिया है। जलस्रोतों की नियमित जांच, पाइपलाइनों का समय पर रखरखाव और सीवेज सिस्टम की निगरानी में ढिलाई का खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ा।
निष्कर्ष
भागीरथपुरा की यह घटना केवल एक क्षेत्र विशेष की समस्या नहीं है, बल्कि शहरी बुनियादी ढांचे की व्यापक चुनौतियों की ओर संकेत करती है। दूषित पानी में पाए गए फीकल कोलीफार्म और ई-कोलाई जैसे बैक्टीरिया इस बात का प्रमाण हैं कि पेयजल व्यवस्था में गंभीर सुधार की आवश्यकता है।
जब तक पुरानी पाइपलाइनों को पूरी तरह बदला नहीं जाता और जल गुणवत्ता की सतत निगरानी नहीं होती, तब तक इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति की आशंका बनी रहेगी। नागरिकों की सेहत से जुड़ा यह मामला प्रशासन के लिए चेतावनी है कि स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

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