भगवान विश्वकर्मा की जयंती धूमधाम के साथ मनाई गई, नगर में निकली भव्य शोभा यात्रा
सिलवानी संवाददाता: वैभव जैन मस्ताना
सृष्टि रचयिता की जयंती पर उमड़ी श्रद्धा
Silwani क्षेत्र में सृष्टि रचयिता भगवान विश्वकर्मा की जयंती का पर्व इस वर्ष अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया गया। क्षेत्र के विश्वकर्मा समाज द्वारा इस पावन अवसर को विशेष रूप से आयोजित किया गया, जिसमें समाज के सभी वर्गों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। भगवान विश्वकर्मा को शिल्प, निर्माण और तकनीकी ज्ञान के देवता के रूप में पूजा जाता है, इसलिए यह पर्व विशेष रूप से कारीगरों, शिल्पकारों और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है।
सुबह से ही मंदिर में हुआ पूजन-पाठ व हवन
इस अवसर पर समाज बंधुओं द्वारा सुबह से ही सरस्वती नगर स्थित मंदिर पर विधिवत पूजन-पाठ व हवन का आयोजन किया गया। मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया था और वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना हुआ था। पंडितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हवन संपन्न कराया गया, जिसमें समाज के वरिष्ठ सदस्यों से लेकर युवाओं और बच्चों तक ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस पूजा-अर्चना के दौरान समस्त समाज बंधु उपस्थित रहे और भगवान विश्वकर्मा से समृद्धि, सुख-शांति तथा तकनीकी प्रगति के लिए आशीर्वाद मांगा गया।
झांकी के साथ निकली भव्य शोभा यात्रा
मंदिर में संपन्न हुए धार्मिक कार्यक्रम के पश्चात नगर में भगवान विश्वकर्मा की आकर्षक झांकी के साथ एक भव्य शोभा यात्रा निकाली गई। यह शोभा यात्रा अपने आप में आकर्षण का केंद्र बनी रही, जिसमें भगवान विश्वकर्मा की सुसज्जित झांकी को देखने के लिए मार्ग के दोनों ओर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। यात्रा में शामिल श्रद्धालु भक्ति भाव से परिपूर्ण होकर चल रहे थे, जिससे पूरे नगर में उत्सव जैसा माहौल बन गया।
गाजे-बाजे के साथ मुख्य मार्गों से गुजरी यात्रा
शोभा यात्रा गाजे-बाजे के साथ नगर के मुख्य मार्गों से होती हुई आगे बढ़ी। बैंड-बाजों की मधुर धुनों और जयकारों की गूंज ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया। यात्रा के दौरान समाज बंधुओं ने पारंपरिक वेशभूषा में भाग लिया, जिससे यात्रा की भव्यता और अधिक बढ़ गई। मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थानों से गुजरते हुए यह यात्रा अंततः तहसील प्रांगण पहुंची, जहां कुछ समय के लिए विश्राम किया गया।
तहसील प्रांगण से वापसी और समापन
तहसील प्रांगण पहुंचने के बाद शोभा यात्रा ने वहां से अपनी वापसी यात्रा शुरू की। वापसी के दौरान भी यात्रा उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ती रही, जैसी शुरुआत में देखी गई थी। अंततः यह भव्य शोभा यात्रा सरस्वती मंदिर पहुंचकर संपन्न हुई, जहां समापन अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की गई और उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।
जगह-जगह हुआ भव्य स्वागत
शोभा यात्रा के मार्ग में जगह-जगह स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों द्वारा भव्य स्वागत किया गया। कई स्थानों पर पुष्प वर्षा की गई, तो कुछ जगहों पर यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के लिए जलपान और शीतल पेय की व्यवस्था भी की गई थी। इस आत्मीय स्वागत ने यात्रा में शामिल सभी लोगों का उत्साह और भी बढ़ा दिया, और यह स्पष्ट हो गया कि क्षेत्र के नागरिकों में भगवान विश्वकर्मा के प्रति गहरी आस्था और सम्मान की भावना है।
समाज में एकता और सांस्कृतिक चेतना का संदेश
इस पूरे आयोजन ने न केवल धार्मिक आस्था को प्रदर्शित किया, बल्कि विश्वकर्मा समाज में एकजुटता और सामाजिक सौहार्द को भी मजबूत किया। इस तरह के आयोजनों से युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है, साथ ही समाज के सदस्यों के बीच आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना भी सुदृढ़ होती है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, सिलवानी में आयोजित भगवान विश्वकर्मा जयंती का यह कार्यक्रम श्रद्धा, उत्साह और सामाजिक एकता का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है। सुबह के पूजन-हवन से लेकर शाम तक चली भव्य शोभा यात्रा तक, पूरा आयोजन बेहद सफल और यादगार रहा। विश्वकर्मा समाज के सदस्यों ने इस अवसर पर जिस उत्साह और भक्ति भाव का परिचय दिया, वह निश्चित रूप से आने वाले वर्षों में भी इस परंपरा को और मजबूती प्रदान करेगा।
