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सिद्धि तप के तृतीय दिवस तपस्वियों का अक्षत से हुआ वधामणा, धर्मसभा में उमड़े श्रद्धालु

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Published On: 2 September 2026
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सिद्धि तप के तृतीय दिवस तपस्वियों का अक्षत से हुआ वधामणा, धर्मसभा में उमड़े श्रद्धालु

साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी ने कहा- ज्ञान अर्जन का प्रमुख माध्यम है धार्मिक पाठशाला, बच्चों में धार्मिक संस्कार विकसित करने के लिए पाठशाला भेजना जरूरी

महिदपुर रोड। श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के लिए विराजित परम पूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब के पावन सान्निध्य में सिद्धि तप के तृतीय दिवस विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस अवसर पर सिद्धि तप करने वाले तपस्वियों का अक्षत के माध्यम से वधामणा किया गया। बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालुओं ने आयोजन में शामिल होकर तपस्वियों की अनुमोदना की और धर्मलाभ प्राप्त किया।

बुधवार को आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब ने जीवन में धार्मिक ज्ञान और संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि धर्म की साधना और आराधना को सही रूप में समझने के लिए ज्ञान आवश्यक है। ज्ञान के अभाव में केवल क्रिया करने से उसके वास्तविक उद्देश्य को समझना कठिन हो जाता है।

धार्मिक ज्ञान जीवन के लिए परम आवश्यक

साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी ने कहा कि जीवन में धर्म का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने धर्मसभा में संदेश देते हुए कहा, “ज्ञान बिना सब क्रिया झूठी, करें आवश्यक अनुसारी।” इसका आशय समझाते हुए उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति को धार्मिक क्रियाओं का ज्ञान और उनके पीछे का उद्देश्य समझ में नहीं आता, तब तक केवल बाहरी क्रियाएं करना पर्याप्त नहीं है।

उन्होंने कहा कि ज्ञान व्यक्ति को सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता प्रदान करता है। धार्मिक जीवन में भी ज्ञान के साथ की गई आराधना साधक को उसके वास्तविक उद्देश्य की ओर आगे बढ़ाती है।

बच्चों को धार्मिक पाठशाला भेजने का किया आह्वान

साध्वी श्रीजी ने वर्तमान पीढ़ी में धार्मिक संस्कारों की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को धार्मिक ज्ञान देने के लिए धार्मिक पाठशालाएं महत्वपूर्ण माध्यम हैं। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी अपने धर्म, संस्कृति और संस्कारों से जुड़ी रहे तो बच्चों को नियमित रूप से धार्मिक पाठशाला भेजना चाहिए।

उन्होंने कहा कि बच्चों के मन में छोटी उम्र से ही अच्छे संस्कारों के बीज बोना जरूरी है। बचपन में प्राप्त धार्मिक शिक्षा जीवनभर व्यक्ति के आचरण और विचारों को प्रभावित करती है।

साध्वी श्रीजी ने कहा कि वर्तमान में धर्म प्रभावना कर रहे अनेक बड़े आचार्य, साधु-साध्वी और धर्माचार्यों ने भी अपने जीवन के प्रारंभिक समय में पाठशालाओं से धार्मिक अध्ययन किया। यही ज्ञान आगे चलकर उनकी साधना और आध्यात्मिक यात्रा का आधार बना।

मानव जीवन भक्त से भगवान बनने के लिए मिला

धर्मसभा के दौरान साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी ने मानव जीवन के महत्व को समझाते हुए कहा कि यह मानव भव अत्यंत दुर्लभ है। मनुष्य को मिला शरीर केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और धर्म आराधना के लिए भी है।

उन्होंने कहा कि मानव जीवन हमें “भक्त से भगवान बनने” की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है। मनुष्य को तन और मन मिला है तो उसका उपयोग धर्म, साधना, संयम और आत्मकल्याण के लिए करना चाहिए।

जीवन में धार्मिक संस्कार और आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायता करते हैं। इसलिए सांसारिक जिम्मेदारियों के साथ धर्म आराधना के लिए भी समय निकालना आवश्यक है।

कृष्ण महाराजा का प्रसंग सुनाकर समझाई भावों की महत्ता

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साध्वी श्रीजी ने धर्मसभा में कृष्ण महाराजा से जुड़ा धार्मिक प्रसंग सुनाते हुए भावों की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि कृष्ण महाराजा ने 18 हजार साधुओं को शुद्ध भाव से वंदन कर पुण्य का उपार्जन किया।

इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि धर्म में केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद शुद्ध भाव का भी अत्यधिक महत्व है। सच्चे और निर्मल भाव से की गई वंदना, आराधना और सेवा व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बन सकती है।

हर जीव में शिव के दर्शन करने की प्रेरणा

साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब ने जीव दया और समभाव का संदेश देते हुए कहा कि हमें प्रत्येक जीव में शिव के दर्शन करने चाहिए। संसार में चींटी से लेकर हाथी तक प्रत्येक जीव में आत्मा विद्यमान है।

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, अहिंसा और समानता की भावना रखने की प्रेरणा देता है। किसी जीव को छोटा या बड़ा समझने के बजाय उसके भीतर मौजूद आत्मतत्व को देखने का प्रयास करना चाहिए।

जब मनुष्य प्रत्येक जीव के प्रति दया और करुणा की भावना विकसित करता है, तभी अहिंसा का वास्तविक स्वरूप उसके जीवन में दिखाई देता है।

तृतीय दिवस तपस्वियों का अक्षत से किया वधामणा

सिद्धि तप के तृतीय दिवस के मंगलकारी अवसर पर तपस्वियों के अक्षत वधामणा का विशेष आयोजन किया गया। लाभार्थी परिवारों एवं समाजजनों ने अक्षत के माध्यम से तपस्वियों का वधामणा कर उनकी कठिन तपस्या की अनुमोदना की।

धार्मिक वातावरण के बीच आयोजित कार्यक्रम में समाजजनों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। तपस्वियों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उनके तप की सुख-साता पूछी गई और मंगलकामनाएं की गईं।

बरडिया परिवार ने लिया संपूर्ण दिवस का लाभ

जैन समाज के मीडिया प्रभारी सचिन भंडारी ने जानकारी देते हुए बताया कि बुधवार को आयोजित साधार्मिक भक्ति, प्रभावना एवं संपूर्ण दिवस का लाभ कांतिलाल, राजेश कुमार, संदीप कुमार और कुलदीप कुमार बरडिया परिवार द्वारा लिया गया।

वहीं सिद्धि तप के तृतीय दिवस आयोजित अक्षत वधामणा का लाभ जैन श्वेतांबर सोशल ग्रुप केसरिया यूनिक शाखा, महिदपुर रोड द्वारा लिया गया।

दो घंटे तक चला धार्मिक आयोजन

करीब दो घंटे तक चले धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में जैन समाज के महिला-पुरुष, युवा एवं वरिष्ठजन उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब के प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

पूरे आयोजन के दौरान धर्म, तप, ज्ञान, जीवदया और संस्कारों का संदेश दिया गया। विशेष रूप से बच्चों को धार्मिक पाठशालाओं से जोड़ने की प्रेरणा देते हुए साध्वी श्रीजी ने समाज से आह्वान किया कि नई पीढ़ी को धार्मिक ज्ञान और संस्कार प्रदान करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

सिद्धि तप के तृतीय दिवस का आयोजन तपस्वियों के सम्मान, धर्म आराधना और साध्वी श्रीजी के प्रेरणादायी संदेशों के साथ धर्ममय वातावरण में संपन्न हुआ।

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