श्रीकृष्ण : नारायण की लोकमंगल यात्रा और करुणा का शाश्वत दर्शन
कर्म, नीति, परोपकार और लोककल्याण की चेतना आज के अशांत समाज के लिए भी प्रासंगिक
संपादकीय | डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’, चंदेरी
मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने धर्म के शास्त्र तो बचा लिए, लेकिन धर्म की संवेदना धीरे-धीरे खोता जा रहा है। वाणी में अहिंसा की बात होती है, लेकिन व्यवहार में कठोरता दिखाई देती है। मुख पर करुणा के शब्द होते हैं, मगर कर्म में स्वार्थ हावी रहता है। हम हाथ जोड़कर धर्म की आराधना तो करते हैं, लेकिन सामने पड़े पीड़ित व्यक्ति की सहायता के लिए हाथ बढ़ाने में संकोच करते हैं।
यहीं से श्रीकृष्ण का स्मरण सार्थक हो जाता है।
जैन दर्शन की दृष्टि से श्रीकृष्ण को समझना केवल उनकी लीलाओं का स्मरण करना नहीं, बल्कि कर्म, पुरुषार्थ, नीति, परोपकार और जीवन की जटिल परिस्थितियों के बीच धर्मबुद्धि को पहचानना है। जैन परंपरा में श्रीकृष्ण को नारायण के रूप में देखा गया है। वे उसी यादव परंपरा से जुड़े हैं, जिससे भगवान नेमिनाथ का भी संबंध माना जाता है।
यह संबंध भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं की उस अंतर्धारा को सामने लाता है, जहां अलग-अलग दर्शन अपने-अपने तरीके से मनुष्य को आत्मोन्नति और लोककल्याण का मार्ग दिखाते हैं।
करुणा और अहिंसा का संदेश
जैन दर्शन का मूल आग्रह है कि किसी जीव को पीड़ा न दी जाए, राग-द्वेष को कम किया जाए और अपने कर्मों के प्रति सजग रहा जाए। इसी कसौटी पर कृष्ण के जीवन को देखने पर उनका एक मानवीय और प्रेरक रूप सामने आता है।
कृष्ण के जीवन में शक्ति थी, लेकिन उस शक्ति के साथ लोकहित की चिंता भी थी। नीति थी, लेकिन नीति केवल स्वार्थ सिद्धि का साधन नहीं थी। संबंध थे, लेकिन उनमें आत्मीयता थी। उनका जीवन आज भी मनुष्य के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है—क्या हमारा सामर्थ्य केवल हमारे अपने लिए है या किसी असहाय के काम भी आ सकता है?
आज यही प्रश्न समाज के सामने भी खड़ा है।
मनुष्य सफल होना चाहता है, लेकिन उपयोगी नहीं। संपन्न होना चाहता है, लेकिन संवेदनशील नहीं। प्रतिष्ठा चाहता है, लेकिन परोपकार से दूर रहता है। वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, लेकिन कर्तव्यों के प्रति उतना ही उदासीन दिखाई देता है।
जैन दर्शन ऐसे जीवन को अधूरा मानता है।
परिग्रह केवल वस्तुओं का नहीं
परिग्रह का अर्थ केवल धन-संपत्ति या वस्तुओं का संग्रह नहीं है। अहंकार, लोभ, प्रतिष्ठा और स्वार्थ का परिग्रह भी मनुष्य को बांधता है।
कृष्ण के जीवन में मित्रता का भाव हमें यह शिक्षा देता है कि मनुष्य को उसकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि मनुष्य होने के नाते देखना चाहिए। सुदामा के साथ कृष्ण का संबंध इसी आत्मीयता का प्रतीक माना जाता है। वहां धन और निर्धनता के बीच कोई दीवार नहीं है। मित्रता की कीमत वस्तुओं से नहीं, भावनाओं से निर्धारित होती है।
यही करुणा है।
करुणा का अर्थ केवल किसी पर दया करना नहीं है। जैन दृष्टि में करुणा वह आंतरिक संवेदना है, जिसमें दूसरे जीव की पीड़ा देखकर हमारा मन भी व्यथित हो उठे।
यदि सामने वाला भूखा है और हमारी थाली भरी हुई है, तो प्रश्न केवल यह नहीं कि हमने भोजन किया या नहीं। प्रश्न यह भी है कि क्या हमारे भीतर दूसरे की भूख के लिए स्थान बचा है?
यदि कोई निर्बल अन्याय सह रहा है, तो सवाल यह नहीं कि संकट हमारा है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हमारी आत्मा अन्याय देखकर मौन रह सकती है?
कर्म से पलायन नहीं, उत्तरदायित्व जरूरी
कृष्ण ने कर्म से पलायन का संदेश नहीं दिया। अर्जुन के मोह और विषाद के सामने उन्होंने कर्तव्यबोध की बात रखी। जैन दर्शन भी मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा देता है।
दोनों परंपराओं के दार्शनिक अंतर अपनी जगह हैं, लेकिन जीवन के नैतिक प्रश्न पर एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है—मनुष्य अपने आचरण के प्रति उत्तरदायी है।
आज समाज को इसी उत्तरदायित्व की सबसे अधिक आवश्यकता है।
धर्म यदि हमें उत्तरदायी नहीं बनाता तो वह केवल अनुष्ठान बनकर रह जाता है। पूजा यदि करुणा में नहीं बदलती तो वह अधूरी है। ज्ञान यदि विनय नहीं देता तो वह अहंकार का कारण बन सकता है। शक्ति यदि संरक्षण नहीं करती तो वही शक्ति अत्याचार में बदल सकती है।

अनेकांत की दृष्टि से कृष्ण
जैन दर्शन का अनेकांत सिद्धांत हमें सिखाता है कि सत्य को समझने के लिए दृष्टि व्यापक होनी चाहिए। किसी व्यक्ति, विचार या परंपरा को केवल एक दृष्टिकोण से देखकर अंतिम निष्कर्ष पर पहुंच जाना उचित नहीं।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व भी व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि से समझे जाने की मांग करता है। सनातन परंपरा में वे योगेश्वर और गीता के उपदेशक हैं, जबकि जैन परंपरा में उन्हें नारायण के रूप में देखा गया है और जैन साहित्य में उनके जीवन का अपना विशिष्ट आख्यान मिलता है।
इन भिन्न दृष्टियों को विरोध का कारण बनाने के बजाय भारतीय संस्कृति की बहुलता और संवादशीलता के रूप में देखना अधिक उचित है।
यही अनेकांत की संस्कृति है—भिन्न दृष्टियों को सुनना, समझना और उनमें निहित सत्य को पहचानना।
आज जब समाज छोटी-छोटी पहचानों के नाम पर विभाजित हो रहा है, तब यह शिक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
लोकमंगल से आत्ममंगल तक
कृष्ण का विश्वबंधुत्व केवल बड़े शब्दों का विषय नहीं है। इसकी शुरुआत तब होती है, जब मनुष्य अपने स्वार्थ की सीमा से बाहर निकलकर दूसरे के सुख-दुःख को महसूस करता है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना तभी सार्थक होगी, जब हमारी दृष्टि में प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री और करुणा का भाव जागे।
जैन परंपरा मनुष्य को चार भावों की ओर प्रेरित करती है—सभी जीवों के प्रति मैत्री, दुःखी जीवों के प्रति करुणा, गुणी जीवों के प्रति प्रमोद और विपरीत परिस्थितियों में माध्यस्थ भाव।
यदि इसी दृष्टि से कृष्ण के जीवन को पढ़ा जाए तो उनका परोपकार केवल कथा नहीं रह जाता, बल्कि वर्तमान समाज के लिए नैतिक प्रश्न बन जाता है।
हम दूसरों के लिए क्या कर रहे हैं?
हमारी शक्ति किसके काम आ रही है?
हमारा ज्ञान किसका अंधकार दूर कर रहा है?
हमारी संपत्ति में किसी जरूरतमंद का कितना अधिकार है?
और हमारे धर्म में करुणा का कितना अंश है?
निष्काम सेवा का महत्व
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम जो करते हैं, क्या उसके बदले कुछ पाने की अपेक्षा रखते हैं?
निष्कामता का भाव कृष्ण के जीवन से मिलने वाली महत्वपूर्ण प्रेरणाओं में से एक है। परोपकार तब अपने शुद्धतम रूप में पहुंचता है, जब उसमें प्रतिफल की आकांक्षा कम होती जाती है।
जैन दर्शन इसे आत्मशुद्धि की दिशा में देखने की प्रेरणा देता है। कर्म का बंधन केवल बाहरी क्रिया से नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे भावों से भी जुड़ा है। इसलिए सेवा करते हुए यदि अहंकार बढ़ रहा है तो आत्मनिरीक्षण आवश्यक है।
दान दिया, लेकिन अहंकार भी साथ आ गया—तो क्या मिला?
क्षमा मांगी, लेकिन मन में वैर बचा रहा—तो क्या बदला?
धर्म किया, लेकिन भीतर द्वेष बढ़ता गया—तो धर्म कहां रहा?
यही जैन चिंतन की विशेषता है। वह मनुष्य को केवल बाहरी आचरण से नहीं, बल्कि उसके भीतर के भावों से भी परखता है।
आज हमें किस कृष्ण की आवश्यकता है?
आज संसार को ऐसे कृष्ण की आवश्यकता है, जो केवल उत्सव की शोभा न बनें, बल्कि चरित्र की कसौटी बनें।
ऐसा कृष्ण-भाव चाहिए, जिसमें शक्ति के साथ संयम हो, नीति के साथ न्याय हो, कर्म के साथ निष्कामता हो और धर्म के साथ करुणा हो।
क्योंकि समाज केवल कानूनों से नहीं, मनुष्यों के भावों से बनता है।
यदि भावों में हिंसा है तो अहिंसा के उपदेश खोखले हैं। यदि मन में लोभ है तो अपरिग्रह केवल शब्द है। यदि दृष्टि में अहंकार है तो विनय केवल अभिनय है। और यदि हृदय में करुणा नहीं है तो धर्म का आडंबर मनुष्य को भीतर से निर्मल नहीं कर सकता।

श्रीकृष्ण और जैन दर्शन का मानवीय संवाद
श्रीकृष्ण के जीवन और जैन दर्शन को व्यापक मानवीय धरातल पर पढ़ने की आवश्यकता है। कृष्ण कर्म की प्रेरणा दें और जैन दर्शन कर्म के परिणाम का बोध कराए। कृष्ण लोकमंगल की ओर उन्मुख करें और जैन दर्शन आत्ममंगल की ओर—तो दोनों के बीच संवाद मनुष्य को बाहरी और आंतरिक, दोनों स्तरों पर समृद्ध कर सकता है।
आज के समय में यही सबसे बड़ा संदेश है।
धर्म हमें बांटने के लिए नहीं, भीतर की कठोरता को गलाने के लिए है। शक्ति दूसरों को झुकाने के लिए नहीं, निर्बल को संभालने के लिए है। ज्ञान स्वयं को बड़ा सिद्ध करने के लिए नहीं, अज्ञान का अंधकार दूर करने के लिए है। और जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि जीव मात्र के प्रति मैत्री, करुणा और उत्तरदायित्व के लिए है।
कृष्ण को यदि सचमुच समझना है तो उन्हें केवल मंदिर में नहीं, अपने कर्म में खोजिए। और जैन दर्शन को यदि सचमुच जीना है तो केवल शास्त्रों में नहीं, अपने भावों में उतारिए।
तभी नारायण का आदर्श और अहिंसा का दर्शन मिलकर ऐसे मनुष्य का निर्माण कर सकेंगे, जिसकी आज संसार को सबसे अधिक आवश्यकता है—शक्तिशाली, लेकिन अहंकारी नहीं; संपन्न, लेकिन परिग्रही नहीं; धार्मिक, लेकिन संकीर्ण नहीं; और सबसे बढ़कर करुणामय, निष्काम तथा दूसरे के दुःख में अपना दुःख देखने वाला।
शायद यही श्रीकृष्ण की प्रासंगिकता है।
और शायद यही जैन दर्शन की करुणा का आधुनिक संसार के लिए सबसे सुंदर संदेश भी है।
