श्री Balipur Dham में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया गुरु पूर्णिमा पर्व, गुरु महिमा पर हुआ चिंतन
कौशिक पंडित, कुशाग्र समाचार सेवा
मनावर, जिला धार (मध्यप्रदेश)
आषाढ़ की विदाई और सावन की अगवानी के इस सुहावने संधिकाल में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व श्री श्री 1008 श्री गजाननजी महाराज अंबिका आश्रम श्री Balipur Dham में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। वेदों और शास्त्रों में वर्णित परंपराओं के अनुरूप आयोजित इस धार्मिक पर्व में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर गुरु चरणों में श्रद्धा अर्पित की।
श्री बालीपुर धाम में वर्ष 1944 से निरंतर गुरु पूर्णिमा पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है। मारुति शास्त्री को गुरु स्वरूप मानकर वर्षों से यह आयोजन श्रद्धा और आस्था के साथ किया जाता रहा है। इस वर्ष भी आश्रम परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-अर्चना और गुरु वंदना के साथ पर्व का आयोजन किया गया।
गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में कृतज्ञता का पर्व
इस अवसर पर श्री गजाननजी महाराज ने गुरु पूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। आषाढ़ और श्रावण के संधिकाल में आने वाला यह पर्व प्रकृति, अध्यात्म और संस्कृति के अद्भुत संगम का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि जब पूर्व दिशा से उठती काली घटाएं आकाश को घेर लेती हैं और वर्षा ऋतु का आगमन होता है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं अपना श्रृंगार कर रही हो। इसी सुंदर ऋतु परिवर्तन के समय गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें ज्ञान, संस्कार और कृतज्ञता का संदेश देता है।
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक होता है। गुरु अपने ज्ञान और अनुभव से शिष्य के जीवन में प्रकाश फैलाता है और उसे अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है।

गुरु चरणों से निर्मल होता है जीवन
गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के मंगलाचरण में लिखा है—
“श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि”
अर्थात गुरु चरणों की धूल से मन रूपी दर्पण को निर्मल किए बिना ईश्वर की अनुभूति संभव नहीं है। गुरु के आशीर्वाद और मार्गदर्शन से व्यक्ति अपने भीतर के दोषों को दूर कर आत्मिक विकास की ओर बढ़ता है।
श्री गजाननजी महाराज ने कहा कि ईश्वर व्यक्ति के कर्मों का हिसाब मांग सकता है, लेकिन गुरु करुणा का सागर होता है। गुरु अपने शिष्य की कमियों को सुधारने का प्रयास करता है और उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया गुरु ज्ञान
गुरु-शिष्य परंपरा का उदाहरण देते हुए उन्होंने महाभारत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र के मैदान में महान योद्धा अर्जुन भी मोह और भ्रम से घिर गए थे। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु का स्वरूप धारण कर उन्हें गीता का ज्ञान दिया।
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा—
“शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्”
अर्थात मैं आपका शिष्य हूं, मुझे उपदेश दीजिए।
उस समय श्रीकृष्ण केवल अर्जुन के मित्र नहीं रहे, बल्कि उनके गुरु बनकर उन्होंने जीवन और धर्म का मार्ग दिखाया। एक सच्चा गुरु वही होता है जो कठिन परिस्थितियों में भी शिष्य का साथ देता है और उसे सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।

गुरु परंपरा भारतीय ज्ञान की अमूल्य धरोहर
गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से भी जुड़ा हुआ है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की और अनेक पुराणों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया।
भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह परंपरा केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें श्रद्धा, समर्पण, संस्कार और जीवन मूल्यों का समावेश है।
मान्यता है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने हिमालय के तट पर सप्त ऋषियों को योग, ध्यान, प्राणायाम और आत्मज्ञान का उपदेश दिया था। वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम और जमदग्नि ऋषि उनके शिष्य बने। भगवान शिव ने उन्हें ज्ञान प्रदान कर मानव कल्याण के लिए आगे बढ़ने का संदेश दिया।
श्री Balipur Dham में धार्मिक आयोजन और भंडारा
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्री सुधाकर जी महाराज एवं श्री योगेश जी महाराज द्वारा बाबा जी की प्रतिमा को लेकर हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना की गई। इसके पश्चात प्रतिमा के साथ शोभायात्रा निकाली गई, जो पुनः श्री बालीपुर धाम पहुंची।
शोभायात्रा में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और गुरु भक्ति के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो गया। आश्रम परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की।
संपूर्ण आयोजन के दौरान धार्मिक आस्था, गुरु भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में नमन कर जीवन में ज्ञान, संस्कार और सद्मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

इस आयोजन की जानकारी सतगुरु सेवा समिति के जगदीश चंद्र पाटीदार ने दी। उन्होंने बताया कि श्री बालीपुर धाम में गुरु पूर्णिमा पर्व वर्षों से परंपरा और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है तथा भविष्य में भी यह धार्मिक परंपरा निरंतर जारी रहेगी।
