नागदा के चंबल तट पर श्रावणी उपाकर्म में बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाजबंधु शामिल हुए। हेमाद्रि संकल्प, देव-ऋषि-पितृ तर्पण और यज्ञोपवीत परिवर्तन के बाद पौधों को रक्षा सूत्र बांधकर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लिया गया।
नागदा में भव्य श्रावणी उपाकर्म: चंबल तट पर वैदिक मंत्रों के बीच यज्ञोपवीत परिवर्तन, उमड़ा ब्राह्मण समाज
जानकारी : निलेश मेहता
नागदा।
श्रावणी उपाकर्म नागदा के तहत रक्षाबंधन के पावन पर्व पर शुक्रवार को गवर्नमेंट कॉलोनी रोड स्थित हनुमान डैम, चंबल तट पर सामूहिक श्रावणी उपाकर्म का आयोजन किया गया। सर्व ब्राह्मण महासभा अध्यक्ष डॉ. अनिल दुबे के नेतृत्व में आयोजित श्रावणी उपकर्म में पं. अजय पंड्या एवं पं. दीपक पंड्या के आचार्यत्व तथा मोहनलाल उपाध्याय ‘डैडी’ के मार्गदर्शन में नागदा सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाजबंधु शामिल हुए।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से श्रावणी उपाकर्म संपन्न कराया गया और समाजबंधुओं ने नवीन यज्ञोपवीत धारण किया। समापन पर सर्व ब्राह्मण महासभा द्वारा सभी आगंतुक ब्राह्मण समाजजनों के लिए पूजन सामग्री सहित फलाहार और चाय की व्यवस्था की गई।
हेमाद्रि संकल्प से शुरू हुआ श्रावणी उपाकर्म नागदा
श्रावणी उपाकर्म की शुरुआत आचार्यों द्वारा आचमन, शुद्धिकरण और संकल्प के साथ हुई। इसके बाद हेमाद्रि संकल्प कराया गया, जिसमें वर्षभर में जाने-अनजाने हुए कर्मों के प्रायश्चित और आत्मशुद्धि का भाव व्यक्त किया गया।
वैदिक विधि के अनुसार देव तर्पण, ऋषि तर्पण एवं पितृ तर्पण कर देवताओं, ऋषियों और पितरों के प्रति कृतज्ञता अर्पित की गई।
इसके पश्चात पुराने यज्ञोपवीत का विधिपूर्वक त्याग कर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ नवीन यज्ञोपवीत धारण कराया गया। सामूहिक रूप से मंत्रोच्चार होने से चंबल तट का वातावरण भक्तिमय हो गया।
यज्ञोपवीत परिवर्तन का आध्यात्मिक महत्व
आचार्यों ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म केवल जनेऊ बदलने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, प्रायश्चित, संस्कारों के नवीनीकरण और अपने कर्तव्यों के प्रति पुनः संकल्प का अवसर है। यज्ञोपवीत को ज्ञान, अनुशासन, संयम, सदाचार और धार्मिक कर्तव्य का प्रतीक माना गया है।
श्रावणी कर्म में ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ जीवन को सदाचार और संस्कारों के अनुरूप चलाने का संकल्प लिया जाता है। इसी भाव के साथ समाजबंधुओं ने नवीन यज्ञोपवीत धारण किया।
चंबल में स्नान के बाद गणेश-अरुंधती पूजन
श्रावणी उपाकर्म एवं यज्ञोपवीत परिवर्तन के बाद समाजबंधुओं ने मां चंबल में स्नान किया। इसके पश्चात भगवान श्री गणेश एवं माता अरुंधती का विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया गया।
गणेश पूजन के माध्यम से मंगल एवं निर्विघ्नता की कामना की गई। इसके साथ ही रक्षाबंधन पर्व का शुभारंभ किया गया।
आयोजन में समाज के वरिष्ठजनों के साथ युवाओं ने भी सहभागिता की। सामूहिक आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को वैदिक परंपराओं और सनातन संस्कारों से परिचित कराने का प्रयास किया गया।
पौधारोपण के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश
धार्मिक अनुष्ठान के पश्चात कार्यक्रम का समापन फलाहार के साथ हुआ। इसके बाद बाल हनुमान मंदिर परिसर में पौधारोपण किया गया। समाजबंधुओं ने अरुंधती, हरसिंगार, जामुन, आम, अशोक, गुलमोहर, साबूदाना, पीपल और नीम सहित विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए।
विशेष बात यह रही कि विगत वर्ष लगाए गए पौधों को भी रक्षाबंधन के अवसर पर रक्षा सूत्र बांधा गया। समाजबंधुओं ने पौधों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लिया।
रक्षाबंधन के पर्व को प्रकृति संरक्षण से जोड़ते हुए संदेश दिया गया कि जिस प्रकार परिवार में रिश्तों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है, उसी प्रकार जीवनदायिनी वनस्पतियों की रक्षा करना भी समाज की जिम्मेदारी है।
आयोजकों ने कहा कि सनातन संस्कृति में प्रकृति, नदियों, वृक्षों और वनस्पतियों को सम्मान देने की परंपरा रही है। धार्मिक आयोजन के साथ पौधारोपण और पूर्व में लगाए गए पौधों को रक्षा सूत्र बांधने की पहल इसी भावना को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
युवाओं को संस्कारों से जोड़ने का संदेश
सर्व ब्राह्मण महासभा ने आयोजन के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का संदेश दिया। आयोजकों ने कहा कि श्रावणी उपाकर्म जैसे सामूहिक आयोजन बच्चों और युवाओं को वैदिक परंपराओं, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक जिम्मेदारियों से परिचित कराने का प्रभावी माध्यम हैं।
आयोजन में बड़ी संख्या में समाजबंधुओं की उपस्थिति ने सामूहिक एकता और सनातन परंपराओं के प्रति आस्था को प्रदर्शित किया। धार्मिक अनुष्ठान के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश कार्यक्रम की विशेषता रहा।



