मोराड़ में सामूहिक गायत्री साधना के बाद पितरों के निमित्त हुआ श्राद्ध-तर्पण, जीवित माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा को बताया सबसे बड़ा श्राद्ध
विश्व कल्याण की कामना से हुआ गायत्री मंत्र जाप, सर्वपितृ अमावस्या पर गायत्री परिवार शाखा मोराड़ का आयोजन
मनावर, जिला धार। अखिल विश्व गायत्री परिवार, शांतिकुंज हरिद्वार के मार्गदर्शन में गायत्री परिवार शाखा मोराड़ ने ग्राम के हनुमान मंदिर में विश्व कल्याण की कामना से सामूहिक गायत्री मंत्र साधना की। इसके बाद सर्वपितृ अमावस्या के उपलक्ष्य में दिवंगत पूर्वजों की स्मृति में सामूहिक श्राद्ध-तर्पण कार्यक्रम संपन्न हुआ।
देव पूजन और कर्मकांड
कार्यक्रम में ग्राम के राधेश्याम मुवेल ने देव पूजन किया और गोपाल मौर्य ने यमदेव का पूजन किया। कार्यक्रम का संचालन और कर्मकांड बादल भालके ने संपन्न कराया।
श्राद्ध का मूल आधार श्रद्धा
गायत्री परिवार के कार्यकर्ता गिरधारी लाल मालवीया ने श्राद्ध-तर्पण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में पितरों की स्मृति में श्राद्ध, तर्पण, दान-पुण्य और ब्राह्मण भोजन की परंपरा रही है। श्राद्ध का मूल आधार श्रद्धा है। इसके जरिए संतान अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है, जिन्होंने जीवन के साथ संस्कार भी दिए।

“जीवित माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा श्राद्ध”
उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध-तर्पण से पितरों की शांति और सद्गति की कामना की जाती है। गायत्री परिवार इस बात पर भी विशेष जोर देता है कि जीवित माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों की सेवा-सत्कार किया जाए। उनके जीवनकाल में उनकी जरूरतों का ध्यान रखना और सम्मान करना ही सबसे बड़ा श्राद्ध है।
दान-पुण्य, वृक्षारोपण और ज्ञानदान का महत्व
उन्होंने कहा कि पितरों की स्मृति में दान-पुण्य, वृक्षारोपण और ज्ञानदान जैसे सत्कर्म भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे कार्य समाज में सेवा, सद्भाव और संस्कारों की भावना को मजबूत करते हैं।
ये रहे उपस्थित
कार्यक्रम में चंदर मुवेल, मांगीलाल मुवेल, मनोहर जर्मन, भारत वास्केल, रामा मुवेल सहित देवरा, सीतापुरी, सनमोड़ और लुंहेरा क्षेत्र के गायत्री परिवार के परिजन शामिल हुए।
