शादी के नए आडंबर और प्री-वेडिंग शूट के बढ़ते चलन ने समाज पर क्या प्रभाव डाला है? पढ़ें राष्ट्र गौरव पारस जैन “पार्श्वमणि” का विशेष विश्लेषण, जिसमें दिखावे, बढ़ते खर्च, कर्ज और सामाजिक दबाव पर विस्तार से चर्चा की गई है।
शादी के नए आडंबर: क्यों प्री-वेडिंग शूट बन रहा है समाज के लिए गंभीर अभिशाप?
लेखक : राष्ट्र गौरव पारस जैन “पार्श्वमणि”, पत्रकार, कोटा (राजस्थान)
शादी के नए आडंबर
भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का पवित्र मिलन माना जाता है। सदियों से विवाह संस्कार प्रेम, विश्वास, जिम्मेदारी और सामाजिक मूल्यों का प्रतीक रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शादी के नए आडंबर तेजी से बढ़े हैं। विशेष रूप से प्री-वेडिंग शूट, महंगे डेस्टिनेशन फंक्शन, थीम पार्टी, रिंग सेरेमनी, मेहंदी नाइट, हल्दी सेरेमनी और महिला संगीत जैसे आयोजनों ने शादी को एक सामाजिक प्रदर्शन का माध्यम बना दिया है।
आज शादी की चर्चा संस्कारों से ज्यादा सजावट, कैमरे, सोशल मीडिया पोस्ट और वायरल रील्स को लेकर होने लगी है।
पहले की शादियां और आज का दौर
पहले जब विवाह तय होते थे तो परिवार, संस्कार, कुल और चरित्र को महत्व दिया जाता था। शादी सादगी से होती थी। परिवार और समाज के आशीर्वाद के साथ सात फेरे ही सबसे बड़ा उत्सव होते थे।आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। अब शादी कई दिनों तक चलने वाला महंगा आयोजन बन गई है। हर रस्म के लिए अलग-अलग डेकोरेशन, अलग ड्रेस, अलग फोटोग्राफी और सोशल मीडिया पर अलग पोस्ट तैयार की जाती है।
प्री-वेडिंग शूट का बढ़ता चलन
शादी के नए आडंबर में सबसे अधिक चर्चा प्री-वेडिंग शूट की होती है। आज अधिकांश युवा शादी से पहले पहाड़ों, झीलों, महलों, रिसॉर्ट और विदेशी लोकेशन पर जाकर फोटो और वीडियो शूट करवाते हैं।इन शूट पर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक खर्च किए जाते हैं। कई बार परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च केवल इसलिए करता है ताकि समाज में उसकी छवि अच्छी दिखाई दे।यही प्रवृत्ति धीरे-धीरे सामाजिक प्रतिस्पर्धा का रूप ले रही है।
टीवी सीरियल और सोशल मीडिया का प्रभाव
टीवी सीरियल और सोशल मीडिया ने विवाह की परंपराओं को काफी प्रभावित किया है।लगभग हर धारावाहिक में शादी को कई एपिसोड तक दिखाया जाता है। भव्य सेट, महंगे कपड़े, शानदार सजावट और लगातार होने वाले समारोह लोगों को प्रभावित करते हैं।सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल होने वाली शादी की रील्स देखकर युवा वर्ग भी वैसी ही शादी का सपना देखने लगता है।धीरे-धीरे यह सपना सामाजिक दबाव बन जाता है।
स्टेटस सिंबल बनती शादी
आज शादी केवल पारिवारिक कार्यक्रम नहीं रह गई बल्कि स्टेटस सिंबल बनती जा रही है।लोग अक्सर कहते हैं—”रिश्तेदार क्या कहेंगे?””लोग क्या सोचेंगे?”यही सोच परिवारों को अनावश्यक खर्च करने के लिए मजबूर करती है।
मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर सबसे ज्यादा असर
शादी के नए आडंबर का सबसे बड़ा नुकसान मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों को उठाना पड़ रहा है।एक ओर महंगाई लगातार बढ़ रही है, दूसरी ओर शादी में दिखावे की होड़ भी बढ़ रही है।कई परिवार—
- कर्ज लेते हैं।
- बचत खत्म कर देते हैं।
- जेवर गिरवी रखते हैं।
- भविष्य की योजनाएं रोक देते हैं।
सिर्फ इसलिए कि शादी किसी से कम न लगे।यह आर्थिक दबाव कई वर्षों तक परिवार को परेशान करता रहता है।
सोशल मीडिया की तुलना ने बढ़ाई समस्या
आज हर शादी की तुलना सोशल मीडिया से होने लगी है।किसकी एंट्री बेहतर रही?किसका प्री-वेडिंग वीडियो ज्यादा वायरल हुआ?किसने ज्यादा महंगा डेकोरेशन कराया?इसी तुलना ने संतोष की भावना को कम कर दिया है।
रिश्तों की असली खूबसूरती
हमारे बुजुर्गों की शादियां बिना प्री-वेडिंग शूट और महंगे आयोजनों के भी सफल रहीं।
रिश्तों में विश्वास था।
संस्कार थे।
बड़ों का सम्मान था।
परिवार का साथ था।
आज दिखावा बढ़ा है लेकिन अपनापन कहीं कम होता दिखाई देता है।
क्या वास्तव में जरूरी है प्री-वेडिंग शूट?
यदि कोई परिवार अपनी खुशी से और अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार प्री-वेडिंग शूट करवाता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है।समस्या तब शुरू होती है जब यह सामाजिक दबाव बन जाता है।दिखावे की मानसिकता समाज को धीरे-धीरे आर्थिक और मानसिक रूप से कमजोर करती है।
समाज को क्या सीख लेनी चाहिए?
यदि विवाह को वास्तव में सफल बनाना है तो हमें—
- सादगी को अपनाना होगा।
- अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार खर्च करना होगा।
- दिखावे से बचना होगा।
- बच्चों की शिक्षा और भविष्य को प्राथमिकता देनी होगी।
- संस्कारों को आधुनिक दिखावे से ऊपर रखना होगा।
सादगी ही सबसे बड़ी सुंदरता
शादी फैशन शो नहीं है।
यह दो आत्माओं का मिलन है।
यह दो परिवारों का विश्वास है।
यदि विवाह सादगी, प्रेम और संस्कारों के साथ सम्पन्न हो तो वही सबसे सफल विवाह माना जाएगा।
महंगे आयोजन कुछ घंटों की खुशी दे सकते हैं लेकिन मजबूत रिश्ते जीवनभर साथ निभाते हैं।
निष्कर्ष
शादी के नए आडंबर समाज के सामने गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। प्री-वेडिंग शूट, अत्यधिक दिखावा और अनावश्यक खर्च सामाजिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ा रहे हैं। यदि समाज समय रहते नहीं संभला तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आने वाली पीढ़ियों को होगा।हमें यह समझना होगा कि शादी का उद्देश्य लोगों को प्रभावित करना नहीं बल्कि दो परिवारों को जोड़ना है।जब विवाह संस्कारों, सादगी और प्रेम के साथ होंगे तभी समाज मजबूत बनेगा।
लेखक
राष्ट्र गौरव पारस जैन “पार्श्वमणि”
पत्रकार, कोटा (राजस्थान)
मो.: 9414764980
