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शब्दज्ञान भिन्न, आत्मज्ञान भिन्न; आचरण के बिना ज्ञान अधूरा : आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज

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Published On: 13 August 2026
विशुद्धसागर

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शब्दज्ञान भिन्न, आत्मज्ञान भिन्न” : आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज*

धन से सुविधाएं, धर्म से सुख-शांति”

चित्र नहीं, चारित्र निहारो” – दिल्ली में गुरुदेव का प्रवचन*

राजेश जैन दद्दू

नई दिल्ली। दिल्ली स्थित ऋषभोदय ऋषभ बिहार* में विराजित दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव* ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि शब्दज्ञान के साथ यदि आचरण नहीं है, तो वह कोरा-ज्ञान व्यर्थ है।

आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा “वह गधे की पीठ पर लदे चन्दन के समान है। बोझा लाद रहा है कोई और उसका उपयोग अन्य कोई करेगा। शब्दज्ञान भिन्न है, आत्मज्ञान भिन्न है।* चर्चा की पवित्रता के बिना तत्त्व चर्चा व्यर्थ है। आत्म-ज्ञान शून्य क्रिया व्यर्थ है।”

प्लास्टिक के फूल जैसी स्थिति

गुरुदेव ने कहा कि प्लास्टिक के कृत्रिम पुष्प देखने में बहुत सुन्दर लगते हैं, परन्तु उनमें सुगन्ध नहीं होती। ऐसे ही शाब्दिक ज्ञानी व्याख्यान तो बहुत अच्छा करता है, वह अपने व्याख्यान से सबको प्रभावित कर लेता है, दूसरे श्रोता उसके उपदेशों को ग्रहण कर श्रेष्ठ-पथ का अनुसरण करते हैं, परन्तु वह वक्ता स्वयं आत्मज्ञान से शून्य अधूरा रह जाता है। वह अन्य चम्मच के समान होता है, दूसरों को परोसता है, स्वयं खाली का खाली।”

संस्कार सिद्धि का सोपान*

आचार्य श्री ने कहा संस्कार सिद्धि को प्रदान करते हैं।”* एक कुम्भकार जब मिट्टी संस्कारित करता है, तो कलश बनता है जो जगत को शीतल जल प्रदान कर कण्ठों को शीतल करता है। शिल्पकार पाषाण को टांक-टांक कर प्रतिमा बना देता है, जिससे जगत नैतिकता का बोध प्राप्त करता है।

धन नहीं, धर्म श्रेष्ठ

गुरुदेव ने कहा “मित्रो! धन से धर्म नहीं होता, धन से जीवन धन्य नहीं होता, धर्म से ही जीवन धन्य होता है।”* धन से सुविधाएं प्राप्त की जा सकती हैं, पर सुख व शांति धर्म से ही संभव है।
उन्होंने बताया अहिंसा धर्म है, सत्य धर्म है, अचौर्य धर्म है, ब्रह्मचर्य धर्म है, अपरिग्रह धर्म है, क्षमा धर्म है, संयम धर्म है, तप धर्म है, त्याग धर्म है, करुणा-दया धर्म है।
धर्म ही सुख का श्रेष्ठ-साधन है। धर्म ही मंगल है, धर्म ही उत्तम है, धर्म ही शरण है। धर्म ही मनुष्य-जीवन का सार है।”

चित्र नहीं, चारित्र निहारो*

आचार्य श्री ने कहा “अहो मित्रो! चित्र नहीं, चारित्र निहारो। चित्र ही निहारना है, तो ऐसे निहारो जिससे आपका चारित्र पवित्र हो। ऐसे चित्र मत देखो, जिससे चारित्र भ्रष्ट हो। चित्र ऐसे निहारो जिससे चारित्र धारण एवं पालन की प्रेरणा मिले।”

क्षमता बढ़ाओ, सुख पाओ*

उन्होंने कहा साधक को साधना करने की क्षमता बढ़ाना चाहिए। समता ही साधुता है। “जो जितना अधिक सहन कर लेगा वह उतना श्रेष्ठता को प्राप्त कर लेगा। साधना से ही सुख संभव है। मिट्टी सहन करती है, तभी कलश बनती है। सिद्ध बनना है, तो सहन करो।

कमल खिलाओ, सिद्धि पाओ

अंत में गुरुदेव ने कहा जिनका हृदय-कमल खिला है, चारित्र में चमक है, उनकी शीघ्र ही सिद्धि होगी। चारित्र की चमक बढ़ाओ, प्रसन्न-चित्त रहो। जिनका श्रद्धा-भक्ति से हृदय कमल खिला रहता है, उनके ही हृदय-आंगन में प्रभु-गुरु विराजते हैं।”

धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के अमृत वचनों का लाभ लिया। नमोस्तु शासन जयवंत हो

देशनाचार्य:* दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज
स्थान: ऋषभोदय ऋषभ बिहार, दिल्ली
राजेश जैन दद्दू,

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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