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सिंधिया फैमिली सेटलमेंट विवाद में नया मोड़: ज्योतिरादित्य सिंधिया की फुफेरी बहन प्रतिमा देवी ने कोर्ट में दायर की कैविट, संपत्ति में वैधानिक हिस्से का किया दावा

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Published On: 21 July 2026
Pratima Devi files caveat in Scindia property dispute
— Pratima Devi files caveat in Scindia property dispute

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सिंधिया फैमिली सेटलमेंट विवाद में नया मोड़: ज्योतिरादित्य सिंधिया की फुफेरी बहन प्रतिमा देवी ने कोर्ट में दायर की कैविट, संपत्ति में वैधानिक हिस्से का किया दावा

ग्वालियर। देश के प्रमुख पूर्व राजघरानों में शामिल सिंधिया परिवार की संपत्तियों को लेकर वर्षों से चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस बार मामले ने नया मोड़ तब लिया, जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की फुफेरी बहन प्रतिमा देवी ने फैमिली सेटलमेंट के खिलाफ अदालत में कैविट (Caveat) दायर कर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उन्होंने अदालत से आग्रह किया है कि उनके पक्ष को सुने बिना परिवार की संपत्तियों से जुड़े किसी भी समझौते या आदेश पर निर्णय न लिया जाए।

प्रतिमा देवी का कहना है कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत फैमिली सेटलमेंट में सभी तथ्य पूरी तरह सामने नहीं रखे गए हैं। उनका आरोप है कि समझौते के दौरान उनके वैधानिक अधिकारों की अनदेखी की गई है और उन्हें संपत्ति में मिलने वाले हिस्से से वंचित रखा गया है। उनके इस कदम ने लंबे समय से चल रहे सिंधिया परिवार के संपत्ति विवाद को एक बार फिर कानूनी और सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

सिंधिया परिवार के संपत्ति विवाद में नया कानूनी अध्याय

सिंधिया राजघराने की चल और अचल संपत्तियों को लेकर पिछले कई वर्षों से विभिन्न अदालतों में कई मुकदमे लंबित हैं। इन विवादों का संबंध उत्तराधिकार, संपत्ति के स्वामित्व, पारिवारिक अधिकारों और संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा हुआ है।

इन्हीं विवादों को समाप्त करने के उद्देश्य से परिवार के कई प्रमुख सदस्यों ने आपसी सहमति के आधार पर फैमिली सेटलमेंट तैयार कर अदालतों में आवेदन प्रस्तुत किए हैं। इस समझौते का उद्देश्य वर्षों से लंबित मुकदमों का शांतिपूर्ण समाधान निकालना बताया जा रहा है।

हालांकि, प्रतिमा देवी द्वारा दायर कैविट ने यह संकेत दिया है कि परिवार के सभी सदस्य इस समझौते से सहमत नहीं हैं। ऐसे में अब अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या प्रस्तावित समझौते में सभी वैधानिक उत्तराधिकारियों और संबंधित पक्षों के अधिकारों का समुचित ध्यान रखा गया है।

किन-किन सदस्यों ने किया है फैमिली सेटलमेंट का समर्थन?

जानकारी के अनुसार, इस फैमिली सेटलमेंट में सिंधिया परिवार के कई प्रमुख सदस्य शामिल हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मध्य प्रदेश की पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सहित परिवार के अन्य सदस्य पक्षकार बताए जा रहे हैं।

इन सभी की ओर से अदालत में आवेदन प्रस्तुत कर यह अनुरोध किया गया है कि परिवार के बीच हुए आपसी समझौते को स्वीकार करते हुए वर्षों से लंबित संपत्ति विवादों का निपटारा किया जाए।

यदि अदालत इस समझौते को स्वीकार करती है, तो कई पुराने मुकदमों का एक साथ समाधान संभव हो सकता है। लेकिन प्रतिमा देवी की आपत्तियों ने इस प्रक्रिया को फिलहाल जटिल बना दिया है।

प्रतिमा देवी ने अदालत में क्या कहा?

प्रतिमा देवी ने अदालत में दायर अपनी कैविट में कहा है कि फैमिली सेटलमेंट से जुड़ी पूरी जानकारी न्यायालय के सामने प्रस्तुत नहीं की गई है।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया है और समझौते की वास्तविक स्थिति अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से नहीं रखी गई।

उनका कहना है कि यदि अदालत केवल उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर फैसला करती है तो उनके वैधानिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया है कि किसी भी आदेश से पहले उन्हें सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाए।

प्रतिमा देवी का यह भी कहना है कि वह परिवार की संपत्तियों में अपने वैधानिक हिस्से का दावा रखती हैं और इस अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

संपत्ति में वैधानिक हिस्से का दावा

कैविट में प्रतिमा देवी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सिंधिया परिवार की संपत्तियों में उनका भी वैधानिक अधिकार बनता है।

उनका दावा है कि प्रस्तावित फैमिली सेटलमेंट में उनके अधिकारों को उचित महत्व नहीं दिया गया और उन्हें इस प्रक्रिया से अलग रखा गया।

उन्होंने अदालत से आग्रह किया है कि जब तक उनके दावे और आपत्तियों पर विस्तार से सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक किसी भी प्रकार के अंतिम आदेश या समझौते को मंजूरी नहीं दी जाए।

यदि अदालत उनके दावों को सुनवाई योग्य मानती है, तो फैमिली सेटलमेंट के कई पहलुओं की दोबारा समीक्षा भी हो सकती है।

पावर ऑफ अटॉर्नी को लेकर भी उठाए गंभीर सवाल

प्रतिमा देवी ने केवल संपत्ति के अधिकारों पर ही नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की वैधानिकता पर भी सवाल उठाए हैं।

उन्होंने अपने आवेदन में कहा है कि उनके नाम से जारी पावर ऑफ अटॉर्नी केवल 24 जून तक ही प्रभावी थी। इसके बावजूद उसके बाद भी उससे संबंधित प्रक्रिया जारी रखी गई।

उनका कहना है कि यदि पावर ऑफ अटॉर्नी की वैधता समाप्त हो चुकी थी, तो उसके आधार पर की गई किसी भी कार्रवाई की कानूनी स्थिति की जांच की जानी चाहिए।

उन्होंने अदालत से इस पहलू की स्वतंत्र रूप से जांच कराने की मांग भी की है।

कौन हैं प्रतिमा देवी?

प्रतिमा देवी, सिंधिया परिवार की वरिष्ठ सदस्य पद्मावती राजे की बड़ी पुत्री हैं। पद्मावती राजे का विवाह त्रिपुरा के राजपरिवार में हुआ था।

इस मामले में प्रतिमा देवी अकेली नहीं हैं। उनकी बहन कनिका देवी भी इस विवाद में पक्षकार हैं।

दोनों बहनों का कहना है कि परिवार की संपत्तियों से संबंधित किसी भी समझौते में उनके वैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सिंधिया परिवार की संपत्तियां क्यों हैं इतनी महत्वपूर्ण?

सिंधिया राजघराना देश के सबसे प्रतिष्ठित पूर्व राजघरानों में गिना जाता है। ग्वालियर सहित देश के कई हिस्सों में परिवार की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण संपत्तियां मौजूद हैं।

इनमें महल, ऐतिहासिक भवन, कृषि भूमि, व्यावसायिक संपत्तियां और अन्य चल-अचल संपत्तियां शामिल हैं।

इन्हीं संपत्तियों के स्वामित्व और उत्तराधिकार को लेकर वर्षों से विभिन्न अदालतों में कानूनी विवाद चल रहे हैं।

बताया जाता है कि इस मामले से जुड़े डेढ़ दर्जन से अधिक मुकदमे अलग-अलग अदालतों में विचाराधीन हैं।

क्या होता है फैमिली सेटलमेंट?

फैमिली सेटलमेंट वह कानूनी व्यवस्था होती है जिसमें परिवार के सदस्य आपसी सहमति से संपत्ति के बंटवारे या अधिकारों को लेकर समझौता करते हैं।

ऐसे समझौते का उद्देश्य लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों को समाप्त करना और पारिवारिक विवादों का शांतिपूर्ण समाधान निकालना होता है।

यदि सभी संबंधित पक्ष इस समझौते पर सहमत हों और अदालत इसे वैधानिक रूप से उचित पाए, तो इससे कई पुराने मुकदमों का एक साथ निपटारा संभव हो सकता है।

हालांकि यदि किसी वैधानिक पक्षकार को यह लगे कि उसके अधिकारों की अनदेखी हुई है, तो वह अदालत में आपत्ति दर्ज करा सकता है, जैसा कि इस मामले में प्रतिमा देवी ने किया है।

कैविट क्या होती है और इसका क्या महत्व है?

भारतीय न्यायिक व्यवस्था में कैविट एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान है।

जब किसी व्यक्ति को यह आशंका होती है कि अदालत उसके अधिकारों को प्रभावित करने वाला कोई आदेश पारित कर सकती है, तो वह पहले से कैविट दायर कर सकता है।

कैविट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि अदालत किसी भी प्रकार का आदेश पारित करने से पहले संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर अवश्य दे।

प्रतिमा देवी ने भी इसी उद्देश्य से कैविट दायर करते हुए अदालत से अनुरोध किया है कि उनकी आपत्तियों को सुने बिना फैमिली सेटलमेंट पर कोई अंतिम निर्णय न लिया जाए।

अदालत के सामने अब कौन-कौन से सवाल?

प्रतिमा देवी की कैविट के बाद अदालत के सामने कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न खड़े हो गए हैं।

इनमें प्रमुख सवाल यह हैं—

  • क्या फैमिली सेटलमेंट में सभी आवश्यक पक्षकार शामिल हैं?
  • क्या सभी वैधानिक उत्तराधिकारियों की सहमति प्राप्त की गई है?
  • क्या अदालत के समक्ष सभी तथ्य पूरी पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत किए गए हैं?
  • पावर ऑफ अटॉर्नी की वैधता समाप्त होने के बाद यदि कोई कार्रवाई हुई, तो उसकी कानूनी स्थिति क्या होगी?
  • क्या प्रतिमा देवी के दावों का प्रथम दृष्टया कोई कानूनी आधार बनता है?

इन सभी पहलुओं पर अदालत की सुनवाई आगे की प्रक्रिया तय करेगी।

कानूनी विशेषज्ञ क्या मानते हैं?

कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी भी फैमिली सेटलमेंट को अदालत तभी स्वीकार करती है जब वह सभी संबंधित पक्षों के अधिकारों और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करता हो।

यदि किसी पक्षकार द्वारा यह दावा किया जाता है कि उसके अधिकारों की अनदेखी हुई है या अदालत के सामने सभी तथ्य प्रस्तुत नहीं किए गए, तो न्यायालय पहले उन आपत्तियों पर सुनवाई कर सकता है।

हालांकि किसी भी दावे की वैधता का अंतिम निर्णय अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों, साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर ही होगा।

आगे क्या हो सकता है?

प्रतिमा देवी की कैविट के बाद अदालत पहले यह तय करेगी कि उनकी आपत्तियां सुनवाई योग्य हैं या नहीं।

यदि अदालत को उनके दावों में प्रथम दृष्टया आधार दिखाई देता है, तो फैमिली सेटलमेंट की प्रक्रिया में देरी हो सकती है और कुछ बिंदुओं पर पुनर्विचार भी कराया जा सकता है।

दूसरी ओर, यदि अदालत यह पाती है कि समझौते में सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है और सभी पक्षकारों को शामिल किया गया है, तो फैमिली सेटलमेंट की कार्यवाही आगे बढ़ सकती है।

फिलहाल अदालत के फैसले पर टिकी हैं निगाहें

सिंधिया परिवार के बहुचर्चित संपत्ति विवाद में प्रतिमा देवी की कैविट ने एक नया कानूनी आयाम जोड़ दिया है। अब यह मामला केवल पारिवारिक समझौते तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसमें वैधानिक अधिकारों, उत्तराधिकार, पावर ऑफ अटॉर्नी की वैधता और न्यायिक प्रक्रिया जैसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी जुड़ गए हैं।

फिलहाल सभी की निगाहें अदालत की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। न्यायालय यह तय करेगा कि प्रतिमा देवी की आपत्तियों का कानूनी आधार कितना मजबूत है और क्या फैमिली सेटलमेंट को वर्तमान स्वरूप में स्वीकार किया जा सकता है या उसमें किसी प्रकार के संशोधन अथवा पुनर्विचार की आवश्यकता है।

अदालत के अगले कदम से न केवल इस बहुचर्चित संपत्ति विवाद की दिशा तय होगी, बल्कि यह भी स्पष्ट होगा कि परिवार के सभी पक्षों के वैधानिक अधिकारों को किस प्रकार संतुलित किया जाएगा।

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