Satna में मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण-पत्र की जांच, राज्य स्तरीय समिति ने जारी किया नोटिस
मध्य प्रदेश की राजनीति में नया विवाद
Satna : मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नया घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। नगरीय प्रशासन एवं आवास विभाग की राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी को उनके अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाण-पत्र की जांच के संबंध में नोटिस जारी किया गया है। यह नोटिस अनुसूचित जाति विकास आयुक्त कार्यालय, भोपाल की ओर से राज्य स्तरीय अनुसूचित जाति छानबीन समिति के माध्यम से जारी किया गया है। समिति ने मंत्री को 6 जुलाई 2026 को भोपाल स्थित मंत्रालय (वल्लभ भवन) में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।
नोटिस के अनुसार, समिति प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र की वैधता की जांच करेगी। इसके लिए उन्हें अपने जातीय दावे से जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज और प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। इस मामले के सामने आने के बाद प्रदेश की राजनीति में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विपक्षी दल इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जांच का परिणाम आगे चलकर राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
क्या है पूरा मामला?
राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण-पत्र को लेकर राज्य स्तरीय अनुसूचित जाति छानबीन समिति के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत मिलने के बाद समिति ने प्रारंभिक परीक्षण किया और अब मंत्री को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया है।
समिति ने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी तरह निर्धारित नियमों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर की जाएगी। किसी भी प्रकार का अंतिम निर्णय सुनवाई के बाद प्रस्तुत किए गए प्रमाणों की जांच के उपरांत ही लिया जाएगा।
इस पूरे मामले में अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है। नोटिस केवल जांच प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका उद्देश्य संबंधित पक्ष से आवश्यक दस्तावेज और स्पष्टीकरण प्राप्त करना है।
किन दस्तावेजों की होगी जांच?
राज्य स्तरीय समिति ने प्रतिमा बागरी को निर्देश दिया है कि वे वर्ष 1950 की स्थिति के अनुसार जिला सतना की निवासी होने तथा स्वयं को ‘बागरी’ अनुसूचित जाति का सदस्य सिद्ध करने वाले सभी आवश्यक दस्तावेज लेकर समिति के समक्ष उपस्थित हों।
इन दस्तावेजों में परिवार से जुड़े पुराने राजस्व रिकॉर्ड, जाति संबंधी अभिलेख, सरकारी प्रमाण-पत्र और अन्य ऐसे दस्तावेज शामिल हो सकते हैं, जो उनके दावे को प्रमाणित करते हों।
यदि समिति को जांच के दौरान किसी अतिरिक्त जानकारी या दस्तावेज की आवश्यकता महसूस होगी, तो वह संबंधित पक्ष से अतिरिक्त साक्ष्य भी मांग सकती है।
6 जुलाई को भोपाल में होगी सुनवाई
राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी को 6 जुलाई 2026 को भोपाल स्थित मंत्रालय (वल्लभ भवन) में राज्य स्तरीय अनुसूचित जाति छानबीन समिति के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।
सुनवाई के दौरान समिति उनके दस्तावेजों का परीक्षण करेगी और यदि आवश्यक हुआ तो उनसे कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण भी मांगा जाएगा।
जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसके आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
कलेक्टर और विभागीय अधिकारियों को भी मिले निर्देश
आयुक्त कार्यालय ने केवल मंत्री को ही नोटिस जारी नहीं किया है, बल्कि सतना कलेक्टर और अनुसूचित जाति विकास विभाग के सहायक आयुक्त को भी आवश्यक निर्देश दिए हैं।
इन अधिकारियों से कहा गया है कि वे नोटिस की विधिवत तामील सुनिश्चित करें और उसकी पावती समिति को उपलब्ध कराएं। साथ ही संबंधित गांव और क्षेत्र में सार्वजनिक सूचना का व्यापक प्रचार-प्रसार भी कराया जाए ताकि यदि किसी व्यक्ति या संस्था को इस मामले में कोई जानकारी या आपत्ति हो, तो वह समिति के समक्ष अपना पक्ष रख सके।
इसके अलावा अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि जांच प्रक्रिया के दौरान सभी आवश्यक अभिलेख और रिकॉर्ड समय पर उपलब्ध कराए जाएं।
जांच प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने पर जोर
इस पूरे मामले का सबसे अहम चरण अब 6 जुलाई 2026 को होने वाली सुनवाई है, जब राज्य स्तरीय अनुसूचित जाति छानबीन समिति के समक्ष राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी अपने दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत करेंगी। यह सुनवाई केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समिति द्वारा किए जाने वाले दस्तावेजों के परीक्षण और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर ही आगे की दिशा तय होगी। जांच के दौरान यदि किसी भी दस्तावेज में असंगति या अतिरिक्त स्पष्टीकरण की आवश्यकता पाई जाती है, तो समिति संबंधित जानकारी मांग सकती है।
इसके बाद अंतिम निर्णय पूरी तरह उपलब्ध साक्ष्यों और जांच रिपोर्ट पर आधारित होगा। फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी माना जाएगा, क्योंकि प्रक्रिया प्रारंभिक चरण में है। राजनीतिक हलकों में भी इस सुनवाई को लेकर चर्चा तेज है, और सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि समिति का रुख क्या रहता है और जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।
