10 अक्टूबर को सर्वपितृ और शनिश्चरी अमावस्या का संयोग, तर्पण और शनि उपासना का विशेष महत्व
संवाददाता : मनोज जैन नायक
इस वर्ष 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या और शनिश्चरी अमावस्या का विशेष संयोग बन रहा है। इसी दिन पितृपक्ष का समापन होगा। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन के अनुसार, इस अवसर पर पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और दान के साथ शनिदेव की उपासना का धार्मिक महत्व माना गया है। उन्होंने श्रद्धापूर्वक पूजन, जरूरतमंदों की सेवा और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अनुष्ठान करने की बात कही।
अमावस्या तिथि और पितृपक्ष का समापन
डॉ. जैन ने बताया कि अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात लगभग 9:35 बजे प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर की रात लगभग 9:19 बजे तक रहेगी। शनिवार को अमावस्या पड़ने के कारण इसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाएगा। वहीं, पितृपक्ष की अंतिम अमावस्या होने से यह सर्वपितृ अमावस्या भी होगी। दोनों अवसर एक साथ आने पर पितरों के स्मरण और शनि आराधना से जुड़ी धार्मिक गतिविधियां की जाएंगी।
सभी पितरों के स्मरण का अवसर
सर्वपितृ अमावस्या का महत्व बताते हुए डॉ. जैन ने कहा कि यह दिन सभी पूर्वजों के सामूहिक स्मरण और श्रद्धापूर्वक विदाई का अवसर माना जाता है। जिन पूर्वजों की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं है, जिनका श्राद्ध किसी कारण छूट गया है अथवा जिनका विधिवत श्राद्ध नहीं हो पाया, उनके निमित्त इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। परिवार अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं।
तर्पण, श्राद्ध और भोजन की परंपरा
डॉ. जैन के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या पर प्रातः स्नान के बाद पितरों का स्मरण किया जाता है। काले तिल मिश्रित जल से तर्पण करने की परंपरा है। जिन पितरों की तिथि ज्ञात नहीं है, उनके लिए सर्वपितृ श्राद्ध किया जा सकता है। अपनी पारिवारिक और धार्मिक परंपरा के अनुसार श्राद्ध तथा भोजन कराने का विधान अपनाया जाता है। इस अवसर पर कौए, गाय और जरूरतमंद व्यक्तियों को भोजन कराने की भी परंपरा है।
अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान
पितरों के निमित्त किए जाने वाले कार्यों में दान का भी स्थान है। डॉ. जैन ने बताया कि इस दिन अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान किया जाता है। श्रद्धा के साथ जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना तथा उनकी सहायता करना धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। उन्होंने तर्पण और श्राद्ध के साथ सेवा को प्रमुख बताया। परिवार अपनी परंपरा के अनुसार इन कार्यों में भाग लेकर पूर्वजों को याद कर सकते हैं।
शनिश्चरी अमावस्या पर शनिदेव की आराधना
शनिश्चरी अमावस्या के संबंध में डॉ. जैन ने बताया कि धार्मिक परंपरा में यह दिन शनिदेव की आराधना, दान, सेवा और आत्मसंयम के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शाम को पीपल के समीप सरसों के तेल का दीपक जलाने, शनि मंदिर में दर्शन करने तथा काले तिल, उड़द और तेल का दान करने की परंपरा है। ये गतिविधियां धार्मिक आस्था के अनुसार की जाती हैं।
मंत्र जाप के साथ जरूरतमंदों की सेवा
डॉ. जैन के अनुसार, शनिदेव की उपासना में ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का जाप किया जा सकता है। इसके साथ वृद्ध, गरीब, श्रमिक और जरूरतमंद लोगों की सेवा का भी महत्व बताया गया है। उन्होंने कहा कि श्रद्धापूर्वक आराधना के साथ सेवा और दान को स्थान देना चाहिए। सर्वपितृ और शनिश्चरी अमावस्या के संयोग में पितरों के प्रति श्रद्धा तथा जरूरतमंदों के प्रति सहयोग की भावना प्रमुख मानी गई है।
महंगे अनुष्ठानों को आवश्यक न मानें
डॉ. जैन ने स्पष्ट किया कि इस संयोग को पितृदोष दूर करने का कोई चमत्कारी अवसर मानकर महंगे अनुष्ठान कराने की आवश्यकता नहीं है। धार्मिक मान्यता में श्रद्धापूर्वक तर्पण, श्राद्ध, दान और सेवा को प्रमुख माना गया है। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में पितृदोष अथवा शनि से संबंधित विशेष योग बताए गए हों, तो उपाय का निर्धारण कुंडली के विश्लेषण के बाद ही किया जाना चाहिए।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार विशेष महत्व
डॉ. जैन ने बताया कि शनि की साढ़ेसाती, ढैया, महादशा या अंतर्दशा वाले जातक भी इस दिन श्रद्धापूर्वक उपासना, तर्पण और दान कर सकते हैं। उनके अनुसार, वर्तमान ज्योतिषीय मान्यताओं में कुंभ, मीन और मेष पर साढ़ेसाती तथा सिंह और धनु पर ढैया का प्रभाव बताया जा रहा है। उन्होंने धार्मिक कार्यों में श्रद्धा, आत्मसंयम और सेवा को महत्व देने की बात कही।
