जूना श्रीराम मंदिर में संस्कृत भारती की वृहज्जनपद गोष्ठी आयोजित, संस्कृत को पुनः राष्ट्रजीवन की भाषा बनाने पर हुआ मंथन
मंडलेश्वर | स्वराज वाणी | जिला ब्यूरो – गौतम साल्वे
पवित्र नगरी मंडलेश्वर स्थित ऐतिहासिक एवं पेशवा कालीन जूना श्रीराम मंदिर में संस्कृत भारती, खरगोन द्वारा जिला स्तरीय वृहज्जनपद गोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ विधिवत मां सरस्वती के पूजन एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और जन-जन तक इसके प्रचार-प्रसार को लेकर विस्तृत चर्चा की गई।
गोष्ठी में विद्वानों, शिक्षाविदों, इतिहासकारों और संस्कृत प्रेमियों ने संस्कृत भाषा की प्राचीन महत्ता, वर्तमान चुनौतियों तथा भविष्य में इसके पुनर्जागरण की आवश्यकता पर अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्मिक विरासत की आधारशिला है।
सरस्वती पूजन के साथ हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम का प्रारंभ वैदिक मंत्रोच्चार और मां सरस्वती की आराधना से हुआ। उपस्थित अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर ज्ञान, संस्कृति और भारतीय परंपरा के संरक्षण का संकल्प लिया।
गोष्ठी में बड़ी संख्या में शिक्षकों, विद्यार्थियों, संस्कृत भाषा के विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। पूरे आयोजन के दौरान भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के प्रति विशेष उत्साह देखने को मिला।
संस्कृत संवाद की भाषा थी, तब भारत विश्वगुरु था – पं. पंकज मेहता
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पंडित पंकज मेहता ने अपने संबोधन में कहा कि भारत उस समय विश्वगुरु कहलाता था, जब संस्कृत केवल धार्मिक भाषा नहीं बल्कि संवाद, शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान की प्रमुख भाषा थी।
उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में दर्शन, गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, न्याय और साहित्य जैसे अनेक विषयों का विशाल ज्ञान संस्कृत में उपलब्ध था। यही कारण था कि दुनिया के अनेक देशों से लोग भारत में शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
उन्होंने कहा कि यदि भारत को पुनः ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनना है तो संस्कृत भाषा के अध्ययन और उसके व्यावहारिक उपयोग को बढ़ावा देना होगा।
भारतीय संस्कृति को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया
अपने संबोधन में पंडित पंकज मेहता ने कहा कि औपनिवेशिक काल में कई विदेशी विद्वानों ने भारतीय संस्कृति और धर्मग्रंथों की अपनी व्याख्याओं के माध्यम से भारतीय समाज को अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने के लिए मूल ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है। उनके अनुसार भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा और विद्या का उद्देश्य समाज के सर्वांगीण विकास से जुड़ा रहा है।
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव से बढ़ा अंग्रेजी का प्रभाव
पंडित मेहता ने कहा कि समय के साथ शिक्षा व्यवस्था में आए परिवर्तनों के कारण अंग्रेजी भाषा का महत्व तेजी से बढ़ा, जबकि संस्कृत और भारतीय भाषाओं का उपयोग सीमित होता चला गया।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय भाषाओं और संस्कृत को भी समान महत्व दिया जाए, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहे।
संस्कृत किसी एक क्षेत्र की नहीं, पूरे ब्रह्मांड की भाषा है

संस्कृत भारती के मालवा प्रांत सह मंत्री महेंद्र मिश्र ने कहा कि संस्कृत किसी विशेष प्रदेश, जाति या समुदाय की भाषा नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति की भाषा है।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में संस्कृत को देववाणी कहा गया है और हजारों वर्षों से यह भाषा धार्मिक, दार्शनिक और साहित्यिक परंपराओं का आधार रही है।
महेंद्र मिश्र ने कहा कि संस्कृत भारती का उद्देश्य संस्कृत को केवल पुस्तकों तक सीमित रखना नहीं, बल्कि इसे बोलचाल की भाषा के रूप में विकसित करना है।
संस्कृत सीखना कठिन नहीं
महेंद्र मिश्र ने कहा कि समाज में यह धारणा बनी हुई है कि संस्कृत सीखना अत्यंत कठिन है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
उन्होंने बताया कि संस्कृत भारती देशभर में सरल एवं व्यवहारिक पद्धति के माध्यम से बोलचाल की संस्कृत सिखा रही है। छोटे-छोटे संवाद, दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले शब्द और व्यावहारिक अभ्यास के जरिए कोई भी व्यक्ति आसानी से संस्कृत बोलना सीख सकता है।
उन्होंने सभी नागरिकों से संस्कृत सीखने और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने का आह्वान किया।
संस्कृत सभी भाषाओं की जननी – पवन जैन
कार्यक्रम में उपस्थित अग्रवाल समाज अध्यक्ष एवं एल्डरमेन पवन जैन ने कहा कि संस्कृत को सभी भारतीय भाषाओं की जननी माना जाता है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ संस्कृत का अध्ययन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और नैतिक मूल्यों से जुड़ने का माध्यम है।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे आधुनिक तकनीक के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी समझें।
संस्कृत के विकास में समाज की भागीदारी जरूरी
प्रख्यात लेखक एवं इतिहासकार दुर्गेश राजदीप ने कहा कि संस्कृत भाषा के संरक्षण और विकास के लिए केवल संस्थाओं के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि यदि परिवारों में संस्कृत के छोटे-छोटे शब्दों का प्रयोग शुरू किया जाए और विद्यालयों में इसके अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाए, तो आने वाले समय में संस्कृत का व्यापक विस्तार संभव है।
शिक्षा और संस्कार दोनों की भाषा है संस्कृत
शिक्षाविद जय सिंह चौहान ने अपने विचार रखते हुए कहा कि संस्कृत केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित भाषा नहीं है, बल्कि यह जीवन मूल्यों, नैतिक शिक्षा और भारतीय चिंतन की भाषा भी है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत का अध्ययन विद्यार्थियों में तार्किक सोच, उच्चारण की शुद्धता और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति सम्मान विकसित करता है।
अतिथियों का हुआ सम्मान
कार्यक्रम के दौरान जिला मंत्री राजेश जोशी ने सभी अतिथियों का परिचय कराया।
वहीं आशुतोष मेहता ने संस्कृत भारती की गतिविधियों, उद्देश्यों और विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि संस्था देशभर में संस्कृत संभाषण वर्ग, कार्यशालाएं, प्रतियोगिताएं और प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर रही है, जिससे बड़ी संख्या में लोग संस्कृत सीख रहे हैं।
बड़ी संख्या में पहुंचे संस्कृत प्रेमी
गोष्ठी में संस्कृत भारती के विभाग संयोजक चेतन गोयल, बीरबल पटेल, विशाल जोशी, मुकेश गीते, विजय जोशी, रश्मि गुप्ता, किरण साध सहित अनेक विद्वान, शिक्षक, विद्यार्थी एवं संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे।
सभी ने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए सामूहिक प्रयास करने का संकल्प लिया।
संस्कृत के संरक्षण पर दिया गया विशेष जोर
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल युग में भी संस्कृत की प्रासंगिकता बनी हुई है। योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, ज्योतिष, वेद, उपनिषद और अनेक वैज्ञानिक विषयों का मूल साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है।
उन्होंने सुझाव दिया कि विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संस्कृत अध्ययन को और अधिक प्रोत्साहित किया जाए तथा युवाओं को आधुनिक तकनीक के माध्यम से संस्कृत से जोड़ा जाए।
निष्कर्ष
मंडलेश्वर के ऐतिहासिक जूना श्रीराम मंदिर में आयोजित संस्कृत भारती की वृहज्जनपद गोष्ठी भारतीय संस्कृति, भाषा और ज्ञान परंपरा के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने संस्कृत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए समाज से इसके प्रचार-प्रसार में सक्रिय भागीदारी की अपील की।
गोष्ठी ने यह संदेश दिया कि संस्कृत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी है। यदि समाज, शिक्षण संस्थान और युवा मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो संस्कृत का पुनर्जागरण संभव है और भारत अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुंचा सकता है।
