*जहां प्रकट हुए थे हनुमान आषाढ़ माह का मंगलवार है खास*
*दूर दूर से आते है श्रद्धालु भक्त*
*प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी गढ़पहरा किला, यहां स्थित बजरंग बली का मंदिर 400 वर्ष पूर्व मंदिर का निर्माण कराया गया था*
संवाददाता : महेंद्र राज
Sagar / बुंदेलखंड के संभागीय मुख्यालय सागर में स्थित गढ़पहरा किले की बात करें तो इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा प्राप्त है। इस किले में लगभग 900 वर्षों का इतिहास समाहित है। विशेष रूप से यह स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। किले का अधिकांश भाग जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, लेकिन किले में स्थित 400 वर्ष पुराना हनुमान मंदिर आज भी सुस्थापित है, जो न केवल बुंदेलखंड बल्कि पड़ोसी राज्यों के लोगों के लिए भी आस्था का केंद्र है। इस हनुमान मंदिर में आषाढ़ के प्रत्येक मंगलवार को विशेष मेला लगता है और हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
गढ़पहरा किला कहाँ स्थित है: गढ़पहरा किला सागर शहर से लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर सागर-झांसी मार्ग पर स्थित है। भारत के पुरातत्व विभाग द्वारा इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है, वहीं भारत सरकार का पर्यटन मंत्रालय भी इसकी देखरेख करता है। सागर से झांसी जाते समय सड़क के बाईं ओर स्थित यह किला एक विशाल पहाड़ी पर बना है। कहा जाता है कि किले के दो द्वार थे, पहला समुद्र की ओर था जहाँ से मंदिर और किले में प्रवेश किया जा सकता था। दूसरा द्वार झांसी की ओर था जो अब लगभग खंडहर हो चुका है। खास बात यह है कि किला जर्जर अवस्था में होने के बावजूद, प्रवेश द्वार के दाईं ओर अभी भी हनुमान जी का मंदिर है। कहा जाता है कि यहाँ हनुमान जी की स्वयंभू प्रतिमा है, जिसके लिए डांगी राजाओं ने 400 वर्ष पूर्व मंदिर का निर्माण कराया था।

किले का ऐतिहासिक महत्व: किले के निर्माण के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, यह किला गौर राजा संग्राम सिंह के शासन के अधीन था और गौर राजाओं के 52 किलों में गढ़फरा का एक महत्वपूर्ण स्थान था। इसके अधीन 360 मौंज थे। बाद में इस किले पर डांगी राजाओं का कब्जा हो गया। इतिहासकार डॉ. भरत शुक्ला बताते हैं कि “शीशमहल किला और हनुमान जी का मंदिर लगभग 1620 ईस्वी में यहाँ निर्मित हुए थे, जो लगभग 400 वर्ष पुराने हैं। आषाढ़ के मंगलवार को यहाँ प्रतिवर्ष एक विशाल मेला लगता है। ऐसा माना जाता है कि यह एक बहुत ही पवित्र स्थान है और यहाँ आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। 1689 में यह किला मुगल शासन के अधीन आ गया और फिर मराठों ने इस पर कब्जा कर लिया।”
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित किले का महत्व: डॉ. भरत शुक्ला बताते हैं कि “1857 की क्रांति में, गढ़पहरा किले के तत्कालीन राजा मर्दन सिंह थे, जिन्होंने इसी किले से विद्रोह का नेतृत्व किया था। उन्होंने शाहगढ़ के राजा बख्तबली शाह के साथ मिलकर झांसी पर आक्रमण किया था। उन्होंने रानी की बहुत मदद की और अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी। हालांकि इन दोनों राजाओं को ब्रिटिश सेना ने पराजित कर आत्मसमर्पण करना पड़ा, लेकिन दोनों राजाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ जमकर संघर्ष किया।”
आषाढ़ के मंगलवार का विशेष महत्व: बुंदेलखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक गढ़पहरा हनुमान मंदिर में आषाढ़ के मंगलवार को एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड के अलावा, किले के पास स्थित सैन्य छावनी के कारण यह मंदिर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि यह भगवान हनुमान का सिद्ध क्षेत्र है और आषाढ़ के मंगलवार को विशेष पूजा करके सच्चे मन से की गई कोई भी मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
