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हमें चिंतामणि रत्न के समान अनमोल जिन शासन प्राप्त हुआ है : साध्वी अमृत रसा श्री जी महाराज

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Published On: 31 July 2026
Sadhvi Amrit Rasa Shri Ji Maharaj delivering a spiritual discourse during the Chaturmas program at Shri Rajendra Suri Gyan Mandir in Mahidpur Road, with devotees attending the religious assembly on the importance of Jin Shasan and Jinvani
— Sadhvi Amrit Rasa Shri Ji Maharaj delivering a spiritual discourse during the Chaturmas program at Shri Rajendra Suri Gyan Mandir in Mahidpur Road, with devotees attending the religious assembly on the importance of Jin Shasan and Jinvani

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हमें चिंतामणि रत्न के समान अनमोल जिन शासन प्राप्त हुआ है : साध्वी अमृत रसा श्री जी महाराज

महिदपुर रोड के श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास प्रवचन, धर्म में निवेश और जिनवाणी के प्रति अटूट श्रद्धा का दिया संदेश

महिदपुर रोड। महिदपुर रोड स्थित श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के पावन अवसर पर विराजित परम पूज्य साध्वी अमृत रसा श्री जी महाराज साहब ने शुक्रवार को आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को जिनवाणी का अमृतपान कराते हुए कहा कि प्रत्येक जीव को परमात्मा का अनमोल जिन शासन प्राप्त होना अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार चिंतामणि रत्न को संसार का अत्यंत दुर्लभ और अनमोल रत्न माना जाता है, उसी प्रकार भगवान महावीर स्वामी का जिन शासन भी अनमोल है। इसे प्राप्त करने के बाद यदि मनुष्य धर्म साधना नहीं करता, तो उसका मानव जीवन व्यर्थ हो जाता है।

धर्मसभा में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर जिनवाणी का श्रवण किया तथा धर्म लाभ प्राप्त किया। पूरे मंदिर परिसर में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण का विशेष अनुभव देखने को मिला।

दुर्लभ मानव जीवन को व्यर्थ न गंवाएं

अपने प्रवचन में साध्वी अमृत रसा श्री जी महाराज ने कहा कि मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है। शास्त्रों में वर्णित है कि जीव 84 लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात मानव जीवन प्राप्त करता है। यह जीवन केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा के कल्याण, धर्म साधना और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होने के लिए मिला है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अधिकांश लोग अपने जीवन का बड़ा हिस्सा धन, प्रतिष्ठा और भौतिक उपलब्धियों के पीछे व्यतीत कर देते हैं, जबकि धर्म और आत्मकल्याण की ओर बहुत कम ध्यान देते हैं। यही कारण है कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

“मनुष्य भव को वेस्ट नहीं, धर्म में इन्वेस्ट करना है”

धर्मसभा में साध्वी श्रीजी ने अत्यंत सरल शब्दों में जीवन का सार समझाते हुए कहा—

“मनुष्य भव को वेस्ट नहीं, धर्म में इन्वेस्ट करना है।”

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार लोग भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए धन का निवेश करते हैं, उसी प्रकार आत्मा के उज्ज्वल भविष्य के लिए धर्म में निवेश करना आवश्यक है।

धर्म में किया गया प्रत्येक पुण्य कर्म आत्मा के साथ चलता है। सांसारिक संपत्ति यहीं रह जाती है, लेकिन धर्म, दया, संयम और सेवा से अर्जित पुण्य ही जीव का वास्तविक धन होता है।

उत्तम कुल, उत्तम धर्म और जिन शासन मिलना महान सौभाग्य

साध्वी अमृत रसा श्री जी महाराज ने कहा कि प्रत्येक जीव को श्रेष्ठ कुल, श्रेष्ठ संस्कार और श्रेष्ठ धर्म प्राप्त नहीं होता। यह सब अनेक जन्मों के पुण्य का परिणाम होता है।

उन्होंने कहा कि हमें उत्कृष्ट मानव जन्म, उत्तम जाति, उत्तम कुल, उत्तम धर्म और उत्तम योनि प्राप्त हुई है। इतना ही नहीं, हमें भगवान महावीर स्वामी का दुर्लभ जिन शासन भी मिला है। यदि इतना सब कुछ प्राप्त होने के बाद भी मनुष्य धर्म से दूर रहता है, तो यह उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे जिन शासन की महिमा को समझें और अपने जीवन को धर्ममय बनाएं।

जिन शासन चिंतामणि रत्न से भी अधिक मूल्यवान

साध्वी श्रीजी ने कहा कि चिंतामणि रत्न की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है, लेकिन जिन शासन उससे भी अधिक मूल्यवान है क्योंकि यह आत्मा को मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है।

उन्होंने कहा कि भगवान महावीर द्वारा बताए गए अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, क्षमा और संयम के सिद्धांत केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए जीवन जीने की श्रेष्ठ कला हैं।

यदि व्यक्ति इन सिद्धांतों को अपने दैनिक जीवन में अपनाता है तो उसका जीवन सुख, शांति और आध्यात्मिक संतुलन से भर जाता है।

साधु दर्शन मात्र से मिलता है अनंत पुण्य

धर्मसभा में साध्वी अमृत रसा श्री जी महाराज ने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा—

“साधु नाम दर्शनम् पुण्यम्।”

अर्थात साधु-साध्वियों के दर्शन मात्र से भी अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।

उन्होंने कहा कि संतों का जीवन त्याग, तपस्या, संयम और आत्मशुद्धि का प्रतीक होता है। उनके दर्शन और उनके वचनों का श्रवण मनुष्य के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाता है।

इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को संतों के प्रति श्रद्धा रखते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए।

जिनवाणी के प्रति सच्ची श्रद्धा ही आत्मकल्याण का आधार

साध्वी श्रीजी ने कहा कि जिनवाणी केवल धार्मिक ग्रंथों का संग्रह नहीं, बल्कि भगवान जिनेश्वर परमात्मा के दिव्य उपदेश हैं।

उन्होंने कहा कि जिनवाणी के प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का भाव रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में धर्म, सदाचार और आत्मानुशासन को सहज रूप से अपनाता है।

उन्होंने कहा कि सच्ची श्रद्धा केवल सुनने या पढ़ने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे जीवन में व्यवहार के रूप में उतारना ही वास्तविक धर्म है।

“जहां श्रद्धा है, वहीं साक्षात परमात्मा हैं”

धर्मसभा में साध्वी श्रीजी ने कहा कि श्रद्धा ही धर्म का मूल आधार है।

उन्होंने कहा,

“श्रद्धा है, वहीं साक्षात परमात्मा हैं।”

जब मनुष्य पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ धर्म का पालन करता है, तब उसके भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं।

ज्ञान पूजा एवं आरती का हुआ आयोजन


प्रवचन के पश्चात श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में ज्ञान पूजा, आरती तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुए।

श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर स्वामी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की और चातुर्मास के धार्मिक वातावरण का लाभ प्राप्त किया।

पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंजता रहा।

प्रभावना एवं साधार्मिक भक्ति का मिला लाभ

जैन समाज के मीडिया प्रभारी सचिन भंडारी ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार के संपूर्ण दिवस की प्रभावना एवं साधार्मिक भक्ति का लाभ सुरेशचंद, संदीप कुमार एवं प्रणय कुमार चत्तर परिवार द्वारा लिया गया।

इसके अतिरिक्त जैन श्रीसंघ पारा, जोबट द्वारा प्रभावना की गई।

उन्होंने बताया कि पारसमल, निलेश कुमार, रितेश कुमार, अक्षय कुमार भंडारी तथा समरथमल, शुभम कुमार एवं संकेश कुमार चोरड़िया परिवार द्वारा साध्वी श्रीजी को वाचन हेतु शास्त्र वोहराने का पुण्य लाभ प्राप्त किया गया।

क्षेत्रीय विधायक दिनेश जैन बौस रहे उपस्थित

इस धार्मिक आयोजन में क्षेत्रीय विधायक एवं जैन समाज गौरव दिनेश जैन बौस भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने साध्वी श्रीजी के प्रवचन का श्रवण किया तथा धर्मसभा में उपस्थित समाजजनों के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता निभाई।

उनकी उपस्थिति से श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।

श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में लिया धर्म लाभ

धर्मसभा में महिदपुर रोड सहित आसपास के अनेक क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। सभी ने अनुशासित वातावरण में जिनवाणी का श्रवण किया तथा साध्वी अमृत रसा श्री जी महाराज के प्रेरणादायी संदेशों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम के अंत में सभी समाजजनों ने सामूहिक रूप से धर्म लाभ प्राप्त किया तथा चातुर्मास के दौरान नियमित रूप से धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने का संकल्प दोहराया।

चातुर्मास बना आध्यात्मिक जागरण का माध्यम

महिदपुर रोड में आयोजित चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में नैतिक मूल्यों, आत्मसंयम, सेवा, त्याग और आध्यात्मिक जागरूकता का संदेश भी प्रसारित कर रहा है।

साध्वी अमृत रसा श्री जी महाराज के प्रवचन श्रद्धालुओं को यह प्रेरणा दे रहे हैं कि जीवन की वास्तविक सफलता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि धर्म, सदाचार और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने में निहित है।

जैन समाज का मानना है कि ऐसे आध्यात्मिक आयोजन समाज में सकारात्मक सोच, संस्कार और धार्मिक चेतना को मजबूत करते हैं। नई पीढ़ी को भी जैन दर्शन, जिनवाणी और भगवान महावीर स्वामी के आदर्शों से जोड़ने में चातुर्मास की महत्वपूर्ण भूमिका है। श्रद्धालुओं ने विश्वास व्यक्त किया कि साध्वी श्रीजी के प्रेरणादायी प्रवचन उनके जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन का आधार बनेंगे और उन्हें धर्ममय जीवन जीने की नई प्रेरणा प्रदान करेंगे।

 

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