RTI को ठेंगा दिखा रहीं पोड़ी कन्या स्कूल की प्राचार्या? शासकीय राशि के आय-व्यय पर उठे गंभीर सवाल
पारदर्शिता पर सवालों के घेरे में सरकारी स्कूल प्रशासन
अनूपपुर जिले के शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पोड़ी से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराने और विभागीय नोटिस की अनदेखी करने के आरोपों ने विद्यालय प्रशासन को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। मामला सरकारी फंड के आय-व्यय और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़ा होने के कारण गंभीर माना जा रहा है।
सूचना के अधिकार अधिनियम को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया गया था, ताकि आम नागरिक सार्वजनिक धन के उपयोग की जानकारी प्राप्त कर सकें। लेकिन पोड़ी कन्या स्कूल से सामने आए घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी संस्थानों में आरटीआई कानून का पालन सही तरीके से हो रहा है।
विद्यालय के वित्तीय रिकॉर्ड को लेकर मांगी गई थी जानकारी
जानकारी के अनुसार आवेदक अभिषेक द्विवेदी द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(1) के तहत विद्यालय में विभिन्न मदों में प्राप्त शासकीय राशि, विकास निधि, छात्रवृत्ति, संधारण मद और अन्य खर्चों से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।
आवेदन में कथित रूप से विद्यालय के आय-व्यय का पूरा विवरण, खर्च संबंधी रिकॉर्ड तथा शासकीय राशि के उपयोग से जुड़े दस्तावेज मांगे गए थे। आरोप है कि निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
यही नहीं, आवेदक का दावा है कि विद्यालय प्रशासन ने आवेदन पर कोई स्पष्ट जवाब भी नहीं दिया, जिसके बाद मामला प्रथम अपील तक पहुंचा।
मामला पहुंचा प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास
जब समय सीमा के भीतर जानकारी उपलब्ध नहीं हुई, तब मामला कार्यालय कलेक्टर (जनजातीय कार्य विभाग) अनूपपुर के प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं सहायक आयुक्त के समक्ष पहुंचा।
बताया जा रहा है कि सहायक आयुक्त कार्यालय द्वारा विद्यालय की प्राचार्या को आधिकारिक नोटिस जारी कर 20 मई 2026 को दोपहर 1:30 बजे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए गए थे। नोटिस में संबंधित दस्तावेज, कृत कार्रवाई प्रतिवेदन तथा आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत करने को भी कहा गया था।
हालांकि आरोप है कि निर्धारित तिथि पर न तो प्राचार्या उपस्थित हुईं और न ही नोटिस का कोई लिखित जवाब प्रस्तुत किया गया।
विभागीय आदेशों की अनदेखी पर उठे सवाल
एक जिम्मेदार प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी द्वारा विभागीय नोटिस की अनदेखी को लेकर अब कई सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि यदि वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन नहीं किया जाता, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीरता पर भी असर पड़ता है।
सूत्रों के अनुसार, मामले में अब विभागीय स्तर पर आगे की कार्रवाई की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
वित्तीय अनियमितताओं की आशंका ने बढ़ाई चिंता
मामला केवल आरटीआई जवाब तक सीमित नहीं है, बल्कि अब सरकारी धन के उपयोग को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकारी स्कूलों को विकास कार्यों, छात्र हित योजनाओं, भवन संधारण, छात्रवृत्ति और अन्य योजनाओं के लिए समय-समय पर शासकीय राशि उपलब्ध कराई जाती है।
ऐसे में जब आय-व्यय से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने में अनिच्छा दिखाई जाती है, तो स्वाभाविक रूप से वित्तीय अनियमितताओं की आशंका गहराने लगती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सभी वित्तीय प्रक्रियाएं नियमों के अनुसार हुई हैं, तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर, सूचना उपलब्ध नहीं कराए जाने से संदेह और बढ़ गया है।
RTI कानून क्या कहता है?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत किसी भी सरकारी विभाग या संस्था को निर्धारित समय सीमा में मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है।
यदि कोई अधिकारी बिना उचित कारण के जानकारी देने से इनकार करता है या जानबूझकर देरी करता है, तो संबंधित अधिकारी पर जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान भी कानून में मौजूद है।
साथ ही प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष पेश न होने और निर्देशों का पालन नहीं करने की स्थिति में विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।
जनता के पैसे का हिसाब मांगना नागरिक अधिकार
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी संस्थानों में खर्च होने वाला पैसा जनता के टैक्स से आता है। इसलिए नागरिकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सरकारी योजनाओं और फंड का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है।
शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता बनाए रखना और वित्तीय रिकॉर्ड सार्वजनिक रखना प्रशासनिक जिम्मेदारी का अहम हिस्सा माना जाता है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय होना जरूरी है, ताकि आम लोगों का विश्वास बना रहे।
नीय स्तर पर बढ़ रही चर्चा
इस पूरे मामले ने अनूपपुर जिले में प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा तेज कर दी है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि आरटीआई जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, तो पारदर्शिता और जवाबदेही कमजोर पड़ जाएगी।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि शिक्षा संस्थानों में वित्तीय मामलों की नियमित ऑडिट और निगरानी की व्यवस्था को और मजबूत किया जाना चाहिए।
क्या होगी विभागीय कार्रवाई?
अब सभी की नजर जिला प्रशासन और जनजातीय कार्य विभाग पर टिकी हुई है। यह देखा जाना बाकी है कि विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब किया जाएगा।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित प्रावधानों के तहत विभागीय जांच, अनुशासनात्मक कार्रवाई और आर्थिक रिकॉर्ड की विस्तृत समीक्षा भी संभव मानी जा रही है।
पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि सुशासन की आधारशिला है। आरटीआई कानून का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि जनता को सरकारी कार्यों की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो सके।
ऐसे मामलों में यदि समय पर जवाब नहीं दिया जाता, तो इससे शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसलिए जरूरी है कि संबंधित विभाग निष्पक्ष जांच कर पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे।
निष्कर्ष
पोड़ी कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से जुड़ा यह मामला अब केवल एक आरटीआई आवेदन तक सीमित नहीं रह गया है। यह सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक अनुशासन से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या सरकारी फंड के उपयोग तथा आरटीआई अनुपालन को लेकर कोई ठोस कार्रवाई सामने आती है।
