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सम्यग्दर्शन ही मोक्षमार्ग का कुशल कर्णधार है: आचार्यश्री उदारसागर

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Published On: 5 October 2026

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सम्यग्दर्शन ही मोक्षमार्ग का कुशल कर्णधार है: आचार्यश्री उदारसागर

मनोज जैन नायक, मुरैना

मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज एवं मुनिश्री 108 उपशान्तसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण, मोक्षमार्ग और धार्मिक मर्यादाओं का महत्व समझाया। संतों ने कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण करते हुए मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ना है। इसके लिए धार्मिक क्रियाओं के साथ सही दृष्टि, ज्ञान और आचरण को जीवन में अपनाना आवश्यक है।

धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने सम्यग्दर्शन की भूमिका स्पष्ट की। वहीं मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने जिनेन्द्र भगवान के दर्शन की सार्थकता, बच्चों में धार्मिक संस्कारों के निर्माण और मंदिर में अन्य श्रद्धालुओं की एकाग्रता का सम्मान करने का संदेश दिया।

मोक्षमार्ग के तीन प्रमुख आधार

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र मोक्षमार्ग के तीन प्रमुख आधार हैं। इनमें सम्यग्दर्शन कुशल कर्णधार की भूमिका निभाता है, क्योंकि वही ज्ञान और चरित्र को सही दिशा प्रदान करता है। सही दृष्टि के बिना ज्ञान और आचरण अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक सकते हैं।

उन्होंने समझाया कि सम्यग्दर्शन दिशा निर्धारित करता है, सम्यग्ज्ञान उस मार्ग का बोध कराता है और सम्यक्चरित्र उस पर चलने की प्रेरणा देता है। आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इन तीनों का महत्व समझना और उन्हें व्यवहार में अपनाना चाहिए।

कुशल नाविक की तरह दिशा देता है सम्यग्दर्शन

आचार्यश्री ने नाविक का उदाहरण देते हुए कहा कि कुशल नाविक नाव को सुरक्षित नदी के दूसरे किनारे तक पहुंचाता है। इसके विपरीत अकुशल नाविक के कारण नाव अपने रास्ते से भटक सकती है। इसी प्रकार सम्यग्दर्शन आत्मकल्याण के मार्ग में मनुष्य को सही दिशा देता है।

उन्होंने कहा कि ज्ञान और आचरण की सार्थकता सही दृष्टि से जुड़ी है। यदि दृष्टि सही नहीं होगी, तो व्यक्ति अपने प्रयासों के वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझ पाएगा। इसलिए मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया है।

राज्य संचालन के उदाहरण से समझाया समन्वय

आचार्यश्री ने कहा कि जिस प्रकार राज्य संचालन के लिए राजा, मंत्री और सेनापति आवश्यक होते हैं, उसी प्रकार मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र अनिवार्य हैं। तीनों की भूमिका अलग होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़ी है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म को केवल सुनने या धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं रखने का आह्वान किया। सही दृष्टि से धर्म को समझना, ज्ञान प्राप्त करना और उसके अनुरूप आचरण करना आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण है।

उत्तम बीज से विकसित होता है स्वस्थ वृक्ष

सम्यग्दर्शन की तुलना बीज से करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि उत्तम बीज से स्वस्थ वृक्ष विकसित होता है। उसी प्रकार सम्यग्दर्शन से ज्ञान और आचरण में वास्तविक सम्यकता आती है। जीवन में सही दृष्टि अपनाने से धार्मिक अभ्यास को उचित दिशा मिलती है।

उन्होंने कहा कि धर्म के संदेश को व्यवहार में उतारना आवश्यक है। श्रद्धालुओं को अपने विचार और आचरण में धार्मिक मूल्यों को स्थान देना चाहिए, जिससे आत्मकल्याण का उद्देश्य जीवन की दिशा बन सके।

भगवान के गुण अपनाने से सार्थक होते हैं दर्शन

मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने कहा कि जिनेन्द्र भगवान के जिनबिम्ब का श्रद्धापूर्वक दर्शन पुण्यकारी है। उन्होंने धार्मिक मान्यता के संदर्भ में दर्शन से पापों के नाश का महत्व बताया। दर्शन करते समय भगवान के गुणों का चिंतन और आत्मशुद्धि का भाव होना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि केवल आंखों से भगवान को देखना ही दर्शन नहीं है। उनके गुणों को जीवन में उतारने का प्रयास सच्चे दर्शन को सार्थक बनाता है। दर्शन के समय मन शांत, भाव निर्मल और चित्त एकाग्र होना चाहिए।

आचरण से अगली पीढ़ी तक पहुंचते हैं संस्कार

मुनिश्री ने कहा कि बच्चे बड़ों के आचरण का अनुकरण करते हैं। माता-पिता श्रद्धापूर्वक भगवान को नमस्कार करेंगे और धार्मिक मर्यादाएं निभाएंगे, तो बच्चों में भी संस्कार विकसित होंगे।

मंदिर की मर्यादा समझाते हुए उन्होंने कहा कि अभिषेक या पूजन कर रहे श्रद्धालु के बीच से नहीं निकलना चाहिए। उसकी भावना और एकाग्रता का सम्मान करना प्रत्येक श्रद्धालु का कर्तव्य है।

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